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[[चित्र:|thumb|right|200px|]]

                                                                                                   
                                                               योग दर्शन 
                                 "  यम  "                                                                                                                                                        (1)   अहिंसा -जो मुझे अपने लिए पसंद नहीं वह में अपनी तरफ से किसी जीव को नहीं दूंगा, अहिंसा पुष्ट व्यक्ति से हिंसक पशु बैर त्याग देता है  |                                   
(2)सत्य - जो कभी नष्ट नहीं होता ,मानव जीवन तो वर्षा की बूंदों के सामान है |
(3)अस्तेय -चोरी का अभाव पुष्ट होने पर पृथ्वी गर्भ के दृश्य प्रकट कर देती है |
(4)अपरिग्रह -अपनी जरूरतों को न्यून करना |
(5)ब्रह्मचर्य -प्रकृति के अनुशासन का दृड़ता से पालन करना  |            
                                "  नियम "
(1)शौच -शरीर जल से ,मन सत्य से ,बुद्धि ज्ञान से तथा आत्मा धर्म से पवित्र होती है |
(2)संतोष-आत्म प्रिय कर्म करना ,भाग्य मानकर स्वीकार करना तो मज़बूरी है |
(3)तप -की गयी भूलो का प्रायश्चित करना ,गल्तिया मानव स्वभाव है , उन्हें दोहराना पशुता है |
(4)स्वाध्याय -चिंतन करना की मै कोन हु ?कहा से आया हु ?कहा मुझे जाना है ?
(5)इश्वर प्राणिधान-सौप दो सब प्रभु को सब सरल हो जायेगा |
         यम -नियम का पालन करने पर आसनों की भूमि उर्वरा हो उठती है 
                                    सिद्ध आसन प्राणायाम के लिए मार्ग प्रशस्त करता है 
                                                 प्राणायाम प्रत्याहार की भूमि पर ले जाता है 
प्रत्याहार की भूमि पर चलते ही धारणा ,ध्यान  तथा समाधि प्रकट होने लगते है, तब जीव को अहसास होता है की प्रकृति ने उसे किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए भेजा है ,संसार में किसी भी जीव का आगमन अकारथ नहीं है, एसे मै वह जान जाता है सब जीवो मै उसी की उपस्थिति है तब उसका बैर भाव ख़त्म हो जाता है  |