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जाट ईतिहास By Bhupender choudhary

My self Bhupender choudhary S/o Shri Rattan singh sehrawat  I want to describe about my village and Jaat Orgin
Village Bahej is a very famous village in Rajesthan  Basicaly that is village of jaat Peoples bcz they are come first here and work there .People of this village is very honest and honerable.
That plaece is very religious plaece also their is many temples  which is placecd the plaece on earth for people for leave......

कौन हैं जाट
आर्य सभ्याता में जाट पंजाब के इलाकों में रहने वाले कबाइली लोग होते थे। 1969 में मुगल शासन के खिलाफ आंदोलन के बाद जाटों का सामाजिक रुतबा बढ़ा। 18वीं सदी तक कई रजवाड़े जाटों के कब्जेफ में थे। 1858 के बाद, ब्रिटिश राज में जाटों को सेना में सेवा के लिए जाना गया। अंग्रेजों ने बाकायदा जाट रेजिमेंट नाम से सेना की अलग ईकाई बनाई थी। पंजाब और सिख रेजिमेंट में भी जाटों की बहुलता थी। 1931 में आखिरी बार हुई जाति आधारित जनगणना के मुताबिक जाट पूरे उत्त र भारत में फैले हुए थे। तब इनकी संख्याा करीब एक करो(contracted; show full)ned territories. Because of their martial traditions, the Jat, together with certain other communities, were classified by British administrators of imperial India as a "martial race," and this term had certain long-lasting effects. One was their large-scale recruitment into the British-Indian army, and to this day a very large number of Jat are soldiers in the Indian army. Many Sikh Jat in the Indian part of Punjab are involved in the current movement for the creation of an autonomous Khalistan.



जाटों का इतिहास
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गणराज्य 

मुग़ल सल्तनत के आखरी समय में जो शक्तियाँ उभरी; जिन्होंने ब्रजमंडल के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, उन जाट सरदारों के नाम इतिहास में बहुत मशहूर हैं । जाटों का इतिहास पुराना है । जाट मुख्यतः खेती करने वाली जाति है; लेकिन औरंगजेब के अत्याचारों और निरंकुश प्रवृति ने उन्हें एक बड़ी सैन्य शक्ति का रूप दे दिया । मुग़लिया सल्तनत के अन्त से अंग्रेज़ों के शासन तक ब्रज मंड़ल में जाटों का प्रभुत्व रहा । इन्होंने ब्रज के राजनीतिक और सामाजिक जीवन को बहुत प्रभावित किया । यह समय ब्रज के इतिहास में 'जाट काल' के नाम से जाना जाता है । इस काल का विशेष महत्त्व है ।
राजनीति में जाटों का प्रभाव
विषय सूची
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    1 राजनीति में जाटों का प्रभाव
    2 जाटों के क्रियाकलाप
    3 औरंगज़ेब और सूरजमल के पूर्वज
    4 इतिहास में जाट
    5 टीका टिप्पणी और संदर्भ
    6 संबंधित लेख

ब्रज की समकालीन राजनीति में जाट शक्तिशाली बन कर उभरे । जाट नेताओं ने इस समय में ब्रज में अनेक जगहों पर, जैसे सिनसिनी, डीग, भरतपुर, मुरसान और हाथरस जैसे कई राज्यों को स्थापित किया । इन राजाओं में डीग−भरतपुर के राजा महत्त्वपूर्ण हैं । इन राजाओं ने ब्रज का गौरव बढ़ाया, इन्हें 'ब्रजेन्द्र' अथवा 'ब्रजराज' भी कहा गया । ब्रज के इतिहास में कृष्ण ( अलबेरूनी ने कृष्ण को जाट ही बताया है)[1] के पश्चात जिन कुछ हिन्दू राजाओं ने शासन किया , उनमें डीग और भरतपुर के राजा विशेष थे । इन राजाओं ने लगभग सौ सालों तक ब्रजमंडल के एक बड़े भाग पर राज्य किया । इन जाट शासकों में महाराजा सूरजमल (शासनकाल सन् 1755 से सन् 1763 तक )और उनके पुत्र जवाहर सिंह (शासन काल सन् 1763 से सन् 1768 तक )ब्रज के इतिहास में बहुत प्रसिद्ध हैं ।
जाटों के क्रियाकलाप

इन जाट राजाओं ने ब्रज में हिन्दू शासन को स्थापित किया । इनकी राजधानी पहले डीग थी, फिर भरतपुर बनायी गयी । महाराजा सूरजमल और उनके बेटे जवाहर सिंह के समय में जाट राज्य बहुत फैला, लेकिन धीरे धीरे वह घटता गया । भरतपुर, मथुरा और उसके आसपास अंग्रेज़ों के शासन से पहले जाट बहुत प्रभावशाली थे और अपने राज्य के सम्पन्न स्वामी थे । वे कर और लगान वसूलते थे और अपने सिक्के चलाते थे । उनकी टकसाल डीग, भरतपुर, मथुरा और वृन्दावन के अतिरिक्त आगरा और इटावा में भी थीं । जाट राजाओं के सिक्के अंग्रेज़ों के शासन काल में भी भरतपुर राज्य के अलावा मथुरा मंडल में प्रचलित थे ।
औरंगज़ेब और सूरजमल के पूर्वज

कुछ विद्वान जाटों को विदेशी वंश-परम्परा का मानते हैं, तो कुछ दैवी वंश-परम्परा का । कुछ अपना जन्म किसी पौराणिक वंशज से हुआ बताते हैं।

    सर जदुनाथ सरकार ने जाटों का वर्णन करते हुए उन्हें "उस विस्तृत विस्तृत भू-भाग का, जो सिन्धु नदी के तट से लेकर पंजाब, राजपूताना के उत्तरी राज्यों और ऊपरी यमुना घाटी में होता हुआ चम्बल नदी के पार ग्वालियर तक फैला है, सबसे महत्त्वपूर्ण जातीय तत्त्व बताया है[2]
    सभी विद्वान एकमत हैं कि जाट आर्य-वंशी हैं । जाट अपने साथ कुछ संस्थाएँ लेकर आए, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है - 'पंचायत' - 'पाँच श्रेष्ठ व्यक्तियों की ग्राम-सभा, जो न्यायाधीशों और ज्ञानी पुरुषों के रूप में कार्य करते थे ।'
    हर जाट गाँव सम गोत्रीय वंश के लोगों का छोटा-सा गणराज्य होता था, जो एक-दूसरे के बिल्कुल समान लेकिन अन्य जातियों के लोगों से स्वयं को ऊँचा मानते थे । जाट गाँव का राज्य के साथ सम्बन्ध निर्धारित राजस्व राशि देने वाली एक अर्ध-स्वायत्त इकाई के रूप में होता था । कोई राजकीय सत्ता उन पर अपना अधिकार जताने का प्रयास नहीं करती थी, जो कोशिश करती थीं, उन्हें शीध्र ही ज्ञान हो जाता था, कि क़िले रूपी गाँवों के विरुद्ध सशस्त्र सेना भेजना लाभप्रद नहीं है ।
    स्वतन्त्रता तथा समानता की जाट-भावना ने ब्राह्मण-प्रधान हिन्दू धर्म के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया, इस भावना के कारण उन्हें गंगा के मैदानी भागों के विशेषाधिकार प्राप्त ब्राह्मणों की अवमानना और अपमान झेलना पड़ा । जाटों ने 'ब्राह्मणों' ( जिसे वह ज्योतिषी या भिक्षुक मानता था) और 'क्षत्रिय' ( जो ईमानदारी से जीविका कमाना पसंद नहीं करता था और किराये का सैनिक बनना पसंद करता था ) के लिए एक दयावान संरक्षक बन गये । जाट जन्मजात श्रमिक और योद्धा थे । वे कमर में तलवार बाँधकर खेतों में हल चलाते थे और अपने परिवार की रक्षा के लिए वे क्षत्रियों से अधिक युद्ध करते थे, क्योंकि आक्रमणकारियों द्वारा आक्रमण करने पर जाट अपने गाँव को छोड़कर नहीं भागते थे । अगर कोई विजेता जाटों के साथ दुर्व्यवहार करता, या उसकी स्त्रियों से छेड़छाड़ की जाती थी, तो वह आक्रमणकारी के काफ़िलों को लूटकर उसका बदला लेता था । उसकी अपनी ख़ास ढंग की देश-भक्ति विदेशियों के प्रति शत्रुतापूर्ण और साथ ही अपने उन देशवासियों के प्रति दयापूर्ण, यहाँ तक कि तिरस्कारपूर्ण थी जिनका भाग्य बहुत-कुछ उसके साहस और धैर्य पर अवलम्बित था ।[3]
    प्रोफ़ेसर क़ानून गों ने जाटों की सहज लोकतन्त्रीय प्रवृत्ति का उल्लेख किया है । 'ऐतिहासिक काल में जाट-समाज उन लोगों के लिए महान शरणस्थल बना रहा है, जो हिन्दुओं के सामाजिक अत्याचार के शिकार होते थे; यह दलित तथा अछूत लोगों को अपेक्षाकृत अधिक सम्मानपूर्ण स्थिति तक उठाता और शरण में आने वाले लोगों को एक सजातीय आर्य ढाँचें में ढालता रहा है। शारीरिक लक्षणों, भाषा, चरित्र, भावनाओं, शासन तथा सामाजिक संस्था-विषयक विचारों की दृष्टि से आज का जाट निर्विवाद रूप से हिन्दुओं के अन्य वर्णों के किसी भी सदस्य की अपेक्षा प्राचीन वैदिक आर्यों का अधिक अच्छा प्रतिनिधि है ।'[4]
    औरंगज़ेब के शासक बनने के कुछ ही समय के अन्दर जाट आँख का काँटा बन गए । उनका निवास मुख्यतः शाही परगना था, जो 'मोटे तौर पर एक चौकोर प्रदेश था, जो उत्तर से दक्षिण की ओर लगभग 250 मील लम्बा और 100 मील चौड़ा था ।'[5] यमुना नदी इसकी विभाजक रेखा थी, दिल्ली और आगरा इसके दो मुख्य नगर थे । इसमें वृन्दावन, गोकुल, गोवर्धन और मथुरा में हिन्दुओं के धार्मिक तीर्थस्थान तथा मन्दिर भी थे । पूर्व में यह गंगा की ओर फैला था और दक्षिण में चम्बल तक, अम्बाला के उत्तर में पहाड़ों और पश्चिम में मरूस्थल तक । " इनके राज्य की कोई वास्तविक सीमाएँ नहीं थीं । यह इलाक़ा कहने को सम्राट के सीधे शासन के अधीन था, परन्तु व्यवहार में यह कुछ सरदारों में बँटा हुआ था । यह ज़मीनें उन्हें, उनके सैनिकों के भरण-पोषण के लिए दी गई हैं । जाट-लोग 'दबंग' देहाती थे, जो साधारणतया शान्त होने पर भी, उससे अधिक राजस्व देने वाले नहीं थे, जितना कि उनसे जबरदस्ती ऐंठा जा सकता था; और उन्होंने मिट्टी की दीवारें बनाकर अपने गाँवों को ऐसे क़िलों का रूप दे दिया था, जिन्हें केवल तोपखाने द्वारा जीता जा सकता था ।"[6] 

इतिहास में जाट

इतिहासकारों ने जाटों के विषय में नहीं लिखा ।

    जवाहरलाल नेहरू, के.एम पणिक्कर ने जाटों के मुख्य नायक सूरजमल के नाम का उल्लेख भी नहीं किया ।
    टॉड ने अस्पष्ट लिखा है । जाटों में इतिहास–बुद्धि लगभग नहीं है । जाट इतिहास में कुछ देरी से आते हैं और जवाहरसिंह की मृत्यु (सन 1768) के बाद से सन् 1805 में भरतपुर को जीतने में लॉर्ड लेक की हार तक उनका वैभव कम होता जाता है ।
    मुस्लिम इतिहासकारों ने जाटों की प्रशंसा नहीं की । ब्राह्मण और कायस्थ लेखक भी लिखने से कतराते रहे । दोष जाटों का ही है । उनका इतिहास अतुलनीय है, पर जाटों का कोई इतिहासकार नहीं हुआ । देशभक्ति, साहस और वीरता में उनका स्थान किसी से कम नहीं है ।
    फ़ादर वैंदेल लिखते हैं, - 'जाटों ने भारत में कुछ वर्षों से इतना तहलका मचाया हुआ है और उनके राज्य-क्षेत्र का विस्तार इतना अधिक है तथा उनका वैभव इतने थोड़े समय में बढ़ गया है कि मुग़ल साम्राज्य की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए इन लोगों के विषय में जान लेना आवश्यक है, जिन्होंने इतनी ख्याति प्राप्त कर ली है । यदि कोई उन विप्लवों पर विचार करे जिन्होंने इस शताब्दी में साम्राज्य को इतने प्रचंड रूप से झकझोर दिया है, तो वह अवश्य ही इस निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि जाट, यदि वे इनके एकमात्र कारण न भी हों, तो भी कम-से-कम सबसे महत्त्वपूर्ण कारण अवश्य हैं ।'[7]
    आगरा और दिल्ली में जब तक शक्तिशाली शासन रहा, जाट शान्तिपूर्वक रहे । वे अपनी ज़मीन जोतते, मालग़ुज़ारी देते और सेना में सैनिक के रूप में अपने आदमियों को भेजते। इसी उदासीनता के कारण इतिहासकार भी उनको उपेक्षित करते रहे ।
    दक्षिण क्षेत्र में युद्ध में होने के कारण औरंगज़ेब सन् 1681-1707 तक दिल्ली ना आ सका । औरंगज़ेब के पुत्र, वरिष्ठ सेनानायक और सलाहकार औरंगज़ेब के साथ ही गए थे । द्वितीय श्रेणी के नायकों को दिल्ली का शासन कार्य करने के लिए दिल्ली में रखा गया था । तत्कालीन शासन दूर से किया जाता रहा । दक्षिण के युद्ध से राजकोष ख़ाली हो गया । सम्राट के सैनिक मालगुजारी के लिए किसानों को तंग करते थे, जो किसान मालगुज़ारी नहीं देते थे, उनसे मालगुजारी वसूल करने की शक्ति शासन में नहीं थी । औरंगज़ेब की ऐसी परिस्थति से शाही परगने में जाटों को विद्रोह पनपा । कहावत कही जाती है कि " जाट और घाव, बँधा हुआ ही भला ।"[8]
    अधिकारी स्वेच्छाचारी हो गए थे । मथुरा और आगरा जनपद के जाट अत्याचार और अव्यवस्था को झेलते रहे । स्थानीय फ़ौजदार, मुर्शिदकुलीख़ाँ तुर्कमान नीच, और व्यभिचारी था । उसके शासनकाल में कोई सुन्दर महिला सुरक्षित नहीं थी । कृष्ण जन्माष्टमी पर गोवर्धन में बहुत बड़ा मेला लगता था । मुर्शिदकुलीख़ाँ हिन्दुओं का वेश धारण करके ,माथे पर तिलक लगाकर मेले में भीड़ में मिल जाता था और जैसे ही कोई सुन्दर स्त्री दिखाई देती थी उसे वह "भेड़ो के रेवड़ पर भेड़िये की तरह झपटकर ले भागता और उसे नाव में, जिसे उसके आदमी नदी के किनारे तैयार रखते थे, डालकर तेज़ी से आगरे की ओर चल पड़ता । हिन्दू बेचारा (शर्म के मारे) किसी को न बताता कि उसकी बेटी का क्या हुआ ।"[9]इस प्रकार के व्यभिचार से जनता में शासन के प्रति आक्रोश उबलने लगा ।
    औरंगज़ेब को जब इस का पता चला तो उसने एक धर्मनिष्ठ मुस्लिम अब्दुन्नबी ख़ाँ को मथुरा ज़िले का फ़ौजदार बनाया जिससे शान्ति स्थापित हो सके । अब्दुन्नबी ख़ाँ को आदेश दिया गया कि वह मूर्ति-पूजा को बन्द कर दे । वह सन् 1660 से 1669 तक, लगभग दस वर्ष इस पद पर बना रहा । अब्दुन्नबीख़ाँ हिन्दुओं के लिए बहुत ही कठोर था, उसने मथुरा के मध्य में केशवदेव मन्दिर के जीर्ण भाग पर मस्जिद बनवाने का निर्णय किया । अत्याचार लगातार होते रहे । 


जाट
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जाट भारत और पाकिस्तान में रहने वाला एक क्षत्रिय समुदाय है। भारत में मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात में वसते हैं। पंजाब में यह जट कहलाते हैं तथा शेष प्रदेशों में जाट कहलाते है। यह अति प्राचीन क्षत्रिय समुदाय है।
Contents
जाट शब्द की व्युत्पत्ति

जाट शब्द का निर्माण संस्कृत के 'ज्ञात' शब्द से हुआ है। अथवा यों कहिये की यह 'ज्ञात' शब्द का अपभ्रंश है। लगभग १४५० वर्ष ई० पूर्व में अथवा महाभारत काल में भारत में अराजकता का व्यापक प्रभाव था। यह चर्म सीमा को लाँघ चुका था। उत्तरी भारत में साम्राज्यवादी शासकों ने प्रजा को असह्य विपदा में डाल रखा था। इस स्थिति को देखकर कृष्ण ने अग्रज बलराम की सहायता से कंस को समाप्त कर उग्रसेन को मथुरा का शासक नियुक्त किया। कृष्ण ने साम्राज्यवादी शासकों से संघर्ष करने हेतु एक संघ का निर्माण किया। उस समय यादवों के अनेक कुल थे किंतु सर्व प्रथम उन्होंने अन्धक और वृष्नी कुलों का ही संघ बनाया। संघ के सदस्य आपस में सम्बन्धी होते थे इसी कारण उस संघ का नाम 'ज्ञाति-संघ' रखा गया। [1][2] । [3]

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि महाभारत युद्ध के पश्चात् राजनैतिक संघर्ष हुआ जिसके कारण पांडवों को हस्तिनापुर तथा यादवों को द्वारिका छोड़ना पड़ा। ये लोग भारत से बाहर ईरान, अफगानिस्तान, अरब, और तुर्किस्तान देशों में फ़ैल गए। चंद्रवंशी क्षत्रिय जो यादव नाम से अधिक प्रसिद्ध थे वे ईरान से लेकर सिंध, पंजाब, सौराष्ट्र, मध्य भारत और राजस्थान में फ़ैल गए। पूर्व-उत्तर में ये लोग कश्मीर, नेपाल, बिहार तक फैले। यही नहीं मंगोल देश में भी जा पहुंचे। कहा जाता है कि पांडव साइबेरिया में पहुंचे और वहां वज्रपुर आबाद किया। यूनान वाले हरक्यूलीज की संतान मानते हैं और इस भांति अपने को कृष्ण तथा बलदेव की संतान बताते हैं। चीन के निवासी भी अपने को भारतीय आर्यों की संतान मानते हैं। इससे आर्यों को महाभारत के बाद विदेशों में जाना अवश्य पाया जाता है। ये वही लोग थे जो पीछे से शक, पल्लव, कुषाण, यूची, हूण, गूजर आदि नामों से भारत में आते समय पुकारे जाते हैं। [4]

यह 'ज्ञाति-संघ' व्यक्ति प्रधान नहीं था। इसमें शामिल होते ही किसी राजकुल का पूर्व नाम आदि सब समाप्त हो जाते थे। वह केवल ज्ञाति के नाम से ही जाना जाता था।[2] प्राचीन ग्रंथो के अध्ययन से यह बात साफ हो जाती है की परिस्थिति और भाषा के बदलते रूप के कारण 'ज्ञात' शब्द ने 'जाट' शब्द का रूप धारण कर लिया। महाभारत काल में शिक्षित लोगों की भाषा संस्कृत थी। इसी में साहित्य सर्जन होता था। कुछ समय पश्चात जब संस्कृत का स्थान प्राकृत भाषा ने ग्रहण कर लिया तब भाषा भेद के कारण 'ज्ञात' शब्द का उच्चारण 'जाट' हो गया। आज से दो हजार वर्ष पूर्व की प्राकृत भाषा की पुस्तकों में संस्कृत 'ज्ञ' का स्थान 'ज' एवं 'त' का स्थान 'ट' हुआ मिलता है। इसकी पुष्टि व्याकरण के पंडित बेचारदास जी ने भी की है। उन्होंने कई प्राचीन प्राकृत भाषा के व्याकरणों के आधार पर नविन प्राकृत व्याकरण बनाया है जिसमे नियम लिखा है कि संस्कृत 'ज्ञ' का 'ज' प्राकृत में विकल्प से हो जाता है और इसी भांति 'त' के स्थान पर 'ट' हो जाता है। [5] इसके इस तथ्य कि पुष्टि सम्राट अशोक के शिला लेखों से भी होती है जो उन्होंने २६४-२२७ इस पूर्व में धर्मव्लियों के स्तंभों पर खुदवाई थी। उसमें भी कृत के सतह पर कट और मृत के स्थान पर मत हुआ मिलाता है। अतः उपरोक्त प्रमाणों के आधार पर सिद्ध होता है कि 'जाट' शब्द संस्कृत के 'ज्ञात' शब्द का ही रूपांतर है।अतः जैसे ज्ञात शब्द संघ का बोध करता है उसी प्रकार जाट शब्द भी संघ का वाचक है। [6]

इसी आधार पर पाणिनि ने अष्टाध्यायी व्याकरण में 'जट' धातु का प्रयोग कर 'जट झट संघाते' सूत्र बना दिया। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि जाट शब्द का निर्माण ईशा पूर्व आठवीं शदी में हो चुका था। पाणिनि रचित अष्टाध्यायी व्याकरण का अध्याय ३ पाद ३ सूत्र १९ देखें:

३। ३। १९ अकर्तरि च कारके संज्ञायां ।

अकर्तरि च कारके संज्ञायां से जट् धातु से संज्ञा में घ ञ् प्रत्यय होता है। जट् + घ ञ् और घ ञ प्रत्यय के घ् और ञ् की इति संज्ञा होकर लोप हो जाता है। अ रह जाता है अर्थार्त जट् + अ ऐसा रूप होता है। फ़िर अष्टाध्यायी के अध्याय ७ पाद २ सूत्र ११६ - ७। २। ११६ अतः उपधायाः से उपधा अर्थार्त जट में के ज अक्षर के अ के स्थान पर वृद्धि अथवा दीर्घ हो जाता है। जाट् + अ = जाट[7]

व्याकरण भाष्कर महर्षि पाणिनि के धातु पाठ में जाट व जाट शब्दों की विद्यमानता उनकी प्राचीनता का एक अकाट्य प्रमाण है। इसके बाद ईसा पूर्व पाँचवीं शदी के चन्द्र के व्याकरण में भी इस शब्द का प्रयोग हुआ है।[8]

द्वारिका के पतन के बाद जो ज्ञाति-वंशी पश्चिमी देशों में चले गए वह भाषा भेद के कारण गाथ कहलाने लगे तथा 'जाट' जेटी गेटी कहलाने लगे।[9] के नाम से उन देशों में चिन्हित हुए। मइल
जाट संघ में शामिल वंश

श्री कृष्ण के वंश का नाम भी जाट था। इस जाट संघ का समर्थन पांडव वंशीय सम्राट युधिस्ठिर तथा उनके भाइयों ने भी किया। आज की जाट जाति में पांडव वंश पंजाब के शहर गुजरांवाला में पाया जाता है। समकालीन राजवंश गांधार, यादव, सिंधु, नाग, लावा, कुशमा, बन्दर, नर्देय आदि वंश ने कृष्ण के प्रस्ताव को स्वीकार किया तथा जाट संघ में शामिल हो गए। गांधार गोत्र के जाट रघुनाथपुर जिला बदायूँ में तथा अलीगढ़ में और यादव वंश के जाट क्षत्रिय धर्मपुर जिला बदायूं में अब भी हैं। सिंधु गोत्र तो प्रसिद्ध गोत्र है। इसी के नाम पर सिंधु नदी तथा प्रान्त का नाम सिंध पड़ा। पंजाब की कलसिया रियासत इसी गोत्र की थी। नाग गोत्र के जाट खुदागंज तथा रमपुरिया ग्राम जिला बदायूं में हैं। इसी प्रकार वानर/बन्दर गोत्र जिसके हनुमान थे वे पंजाब और हरयाणा के जाटों में पाये जाते हैं। नर्देय गोत्र भी कांट जिला मुरादाबाद के जाट क्षेत्र में है। [3]

पुरातन काल में नाग क्षत्रिय समस्त भारत में शासक थे। नाग शासकों में सबसे महत्वपूर्ण और संघर्षमय इतिहास तक्षकों का और फ़िर शेषनागों का है। एक समय समस्त कश्मीर और पश्चिमी पंचनद नाग लोगों से आच्छादित था। इसमें कश्मीर के कर्कोटक और अनंत नागों का बड़ा दबदबा था। पंचनद (पंजाब) में तक्षक लोग अधिक प्रसिद्ध थे। कर्कोटक नागों का समूह विन्ध्य की और बढ़ गया और यहीं से सारे मध्य भारत में छा गया। यह स्मरणीय है कि मध्य भारत के समस्त नाग एक लंबे समय के पश्चात बौद्ध काल के अंत में पनपने वाले ब्रह्मण धर्म में दीक्षित हो गए। बाद में ये भारशिव और नए नागों के रूप में प्रकट हुए। इन्हीं लोगों के वंशज खैरागढ़, ग्वालियर आदि के नरेश थे। ये अब राजपूत और मराठे कहलाने लगे। तक्षक लोगों का समूह तीन चौथाई भाग से भी ज्यादा जाट संघ में सामिल हो गए थे। वे आज टोकस और तक्षक जाटों के रूप में जाने जाते हैं। शेष नाग वंश पूर्ण रूप से जाट संघ में सामिल हो गया जो आज शेषमा कहलाते हैं। वासुकि नाग भी मारवाड़ में पहुंचे। इनके अतिरिक्त नागों के कई वंश मारवाड़ में विद्यमान हैं। जो सब जाट जाति में सामिल हैं।[10]
जाट संघ से अन्य संगठनों की उत्पति

जाट संघ में भारत वर्ष के अधिकाधिक क्षत्रिय शामिल हो गए थे। जाट का अर्थ भी यही है कि जिस जाति में बहुत सी ताकतें एकजाई हों यानि शामिल हों, एक चित हों, ऐसे ही समूह को जाट कहते हैं। जाट संघ के पश्चात् अन्य अलग-अलग संगठन बने। जैसे अहीर, गूजर, मराठा तथा राजपूत। ये सभी इसी प्रकार के संघ थे जैसा जाट संघ था। राजपूत जाति का संगठन बौद्ध धर्म के प्रभाव को कम करने के लिए ही पौराणिक ब्राहमणों ने तैयार किया था। बौद्धधर्म से पहले राजपूत नामका कोई वर्ग या समाज न था। ।[11]
जाट जनसंख्या

वर्ष 1931 के बाद भारत में जाति आधारित जनगणना नहीं की गयी है, परन्तु जाट इतिहासकार कानूनगो के अनुसार वर्ष १९२५ में जाट जनसंख्या ९० लाख थी जो वर्त्तमान में करीब 3 करोड़ है तथा धर्मवार विवरण इसप्रकार है:[12]
धर्म 
हिन्दू 
इस्लाम 
सिख 
प्राचीन समुदाय

इसका उल्लेख महाभारत के शल्यपर्व में किया गया है कि जब ब्रह्माजी ने स्वामी कार्तिकेय को समस्त प्राणियों का सेनापति नियुक्त किया गया तब अभिषेक के समय उपस्तित यौद्धावों में एक जट नामक सम्पूर्ण सेनाध्यक्षों का अधिपति भी था:

    अक्षः सन्तर्जनो राजन् कुन्दीकश्च तमोन्नकृत।

    एकाक्षो द्वादशक्षश्च तथैवैक जटः प्रभु ।। [13]

देवसंहिता में पार्वतीजी जाटों की उत्पति और कर्म के बारे में शिवजी से पूछती हैं तो वे इस तरह बताते हैं:

    महाबला महावीर्या, महासत्य पराक्रमाः

    सर्वाग्रे क्षत्रिया जट्‌टा देवकल्‍पा दृढ़-व्रता:

अर्थात:-जाट महाबली महावीर्यवान और बड़ेप्राक्रमी हैं। क्षत्रियों में सबसे पहले ये दृढप्रतिज्ञा वाले राजे महाराजे रहे हैं।

    गर्व खर्चोत्र विप्राणां देवानां च महेश्वरी

    विचित्रं विस्‍मयं सत्‍वं पौराण कै साङ्गीपितं

अर्थात:-जाट जाति का इतिहास अत्यन्त आश्चर्यमय है। इस इतिहास में विप्र जाति का गर्व खर्च होता है इस कारण इसे प्रकाश नहीं किया। हम इस इतिहास को यथार्थ रूप से वर्णन करते हैं।
शिव और जाट

जाट इतिहासकार जाट की उत्पति शिव की जटा से मानते हैं. ठाकुर देशराज [14] लिखते हैं कि जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक मनोरंजक कथा कही जाती है. महादेवजी के श्वसुर राजा दक्ष ने यज्ञ रचा और अन्य प्रायः सभी देवताओं को तो यज्ञ में बुलाया पर न तो महादेवजी को ही बुलाया और न ही अपनी पुत्री सती को ही निमंत्रित किया. पिता का यज्ञ समझ कर सती बिना बुलाए ही पहुँच गयी, किंतु जब उसने वहां देखा कि न तो उनके पति का भाग ही निकाला गया है और न उसका ही सत्कार किया गया इसलिए उसने वहीं प्राणांत कर दिए. महादेवजी को जब यह समाचार मिला, तो उन्होंने दक्ष और उसके सलाहकारों को दंड देने के लिए अपनी जटा से 'वीरभद्र' नामक गण उत्पन्न किया. वीरभद्र ने अपने अन्य साथी गणों के साथ आकर दक्ष का सर काट लिया और उसके साथियों को भी पूरा दंड दिया. यह केवल किंवदंती ही नहीं बल्कि संस्कृत श्लोकों में इसकी पूरी रचना की गयी है जो देवसंहिता के नाम से जानी जाती है. इसमें लिखा है कि विष्णु ने आकर शिवाजी को प्रसन्न करके उनके वरदान से दक्ष को जीवित किया और दक्ष और शिवाजी में समझोता कराने के बाद शिवाजी से प्रार्थना की कि महाराज आप अपने मतानुयाई 'जाटों' का यज्ञोपवीत संस्कार क्यों नहीं करवा लेते? ताकि हमारे भक्त वैष्णव और आपके भक्तों में कोई झगड़ा न रहे. लेकिन शिवाजी ने विष्णु की इस प्रार्थना पर यह उत्तर दिया कि मेरे अनुयाई भी प्रधान हैं.

देवसंहिता के कुछ श्लोक जो जाटों के सम्बन्ध में प्रकाश डालते हैं वे निम्न प्रकार हैं-
पार्वत्युवाचः

    भगवन सर्व भूतेश सर्व धर्म विदाम्बरः
    कृपया कथ्यतां नाथ जाटानां जन्म कर्मजम् ।।12।।

अर्थ- हे भगवन! हे भूतेश! हे सर्व धर्म विशारदों में श्रेष्ठ! हे स्वामिन! आप कृपा करके मेरे तईं जाट जाति का जन्म एवं कर्म कथन कीजिये ।।12।।

    का च माता पिता ह्वेषां का जाति बद किकुलं ।
    कस्तिन काले शुभे जाता प्रश्नानेतान बद प्रभो ।।13।।

अर्थ- हे शंकरजी ! इनकी माता कौन है, पिता कौन है, जाति कौन है, किस काल में इनका जन्म हुआ है ? ।।13।।
श्री महादेव उवाच:

    श्रृणु देवि जगद्वन्दे सत्यं सत्यं वदामिते ।
    जटानां जन्मकर्माणि यन्न पूर्व प्रकाशितं ।।14।।

अर्थ- महादेवजी पार्वती का अभिप्राय जानकर बोले कि जगन्माता भगवती ! जाट जाति का जन्म कर्म मैं तुम्हारी ताईं सत्य-सत्य कथन करता हूँ कि जो आज पर्यंत किसी ने न श्रवण किया है और न कथन किया है ।।14।।

    महाबला महावीर्या, महासत्य पराक्रमाः ।
    सर्वाग्रे क्षत्रिया जट्‌टा देवकल्‍पा दृढ़-व्रता: || 15 ||

अर्थ- शिवजी बोले कि जाट महाबली हैं, महा वीर्यवान और बड़े पराक्रमी हैं क्षत्रिय प्रभृति क्षितिपालों के पूर्व काल में यह जाति ही पृथ्वी पर राजे-महाराजे रहीं । जाट जाति देव-जाति से श्रेष्ठ है, और दृढ़-प्रतिज्ञा वाले हैं || 15 ||

    श्रृष्टेरादौ महामाये वीर भद्रस्य शक्तित: ।
    कन्यानां दक्षस्य गर्भे जाता जट्टा महेश्वरी || 16 ||

अर्थ- शंकरजी बोले हे भगवती ! सृष्टि के आदि में वीरभद्रजी की योगमाया के प्रभाव से उत्पन्न जो पुरूष उनके द्वारा और ब्रह्मपुत्र दक्ष महाराज की कन्या गणी से जाट जाति उत्पन्न होती भई, सो आगे स्पष्ट होवेगा || 16 ||

    गर्व खर्चोत्र विग्राणां देवानां च महेश्वरी ।
    विचित्रं विस्‍मयं सत्‍वं पौराण कै साङ्गीपितं || 17 ||

अर्थ- शंकरजी बोले हे देवि  ! जाट जाति की उत्पत्ति का जो इतिहास है सो अत्यन्त आश्चर्यमय है । इस इतिहास में विप्र जाति एवं देव जाति का गर्व खर्च होता है । इस कारण इतिहास वर्णनकर्ता कविगणों ने जाट जाति के इतिहास को प्रकाश नहीं किया है || 17 ||




जाट ईतिहास

    श्रुणु देवि जगद्वन्दे सत्यं सत्यं वदामिते।

    जटानां जन्म कर्माणि यन्न पूर्व प्रकाशितं॥

    महाबला महावीर्या महासत्व पराक्रमतमा।

    सर्वाग्रे क्षौत्रिया जट्टा देव कल्पा दृढ़वृता:॥

    सृष्टेरादौ महामाये वीर भद्रस्य शक्तित:।

    कन्यानांहि दक्षस्य गर्भे जाता जट्टा महेश्वरी।

    गर्व खर्मोन्न विप्राणां देवानां च महेश्वरी।

    विचित्र विस्मयं सत्यं पौराणिकै: संगोपितं॥

    अर्थ कृमहादेव ने पार्वती से कहा कि हे जगजननी भगवती! जाट जाति के जन्म कर्म के विषय में उस सच्चाई का कथन करता हूँ जो अभी तक किसी ने भी प्रकाशित नहीं किया। ये जट्ट बलशाली, अत्यन्त वीर्यवान प्रचंड पराक्रमी हैं सम्पूर्ण क्षत्रियों में यही जाति सर्वप्रथम शासक हुई। ये देवताओं के समान दृढ़ संकल्प वाले हैं। सृष्टि के आदि में वीरभद्र की योगमाया के प्रभाव से दक्ष की कन्याओं से जाटों की उत्पत्तिा हुई। इस जाति का इतिहास अत्यन्त विचित्र एवं विस्मयजनक है। इनके उज्ज्वल अतीत से ब्राह्मणों और देवताओं के मित्याभिमान का विनाश होता है इसीलिए इस जाति के सच्चे इतिहास को पौराणिकों ने अभी तक छिपाये रखा था।

     जाट शब्द का प्रयोग आदिकाल से होता आया है। आदि सृष्टि में देवाधिदेव भगवान आदि शासक सम्राट हुये। भगवान शंकर की जटा से उत्पन्न होने के कारण ही इस समुदाय का नाम जाट पड़ा है। भगवान शिव के गुणों की साद्रश्यता जाटों में आज तक विद्यमान है। भगवान महादेव शंकर की जटाओं से निसृत ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना, सरस्वती, सतलज, ब्यास, रवि, चिनाब, झेलम, गोदावरी, नर्मदा इत्यादि से उर्वरित भूमि जाटों की मातृभूमि विशेषतया रही है।

    पर्यावरण की पवित्रता तथा स्वास्थ्य रक्षा के लिये इस जाति के लोग परमयाज्ञीक हैं, देव पूजा, संगती करण, दान करना उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति हे। भगवान शिवजी से जाटों की उत्पत्ति का युक्ति प्रमाण से विस्तार पूर्वक वर्णन है। रघुवंशी राजाओं, चंद्रवंशी राजाओं के वैवाहिक सम्बन्ध, राज्य प्रबन्धों, सुरक्षित वैभव सम्पन्न प्रजाओं का विशद आख्यान, पूर्वकथित जाटों जैसे गुण मिथिलाधिपीत जनक विदेह और दिलीप, भगवान श्री रामचंद्र, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न में थे। जाट समाज मर्यादा पुरुषोत्ताम भगवान श्री रामचंद्र को अपना पूर्वज और पूजनीय मानकर उनके गुणों की स्तुति करते हैं। महाभारत काल की रीति-नीति, चाल-चलन, वैवाहिक प(ति तथा जाट संघटन अपने वंशज पांडवों की परम्परा से चले आ रहे हैं। तथा उस समय के गणतंत्र निर्माता योगेश्वर श्री कृष्ण चन्द्र की गणतंत्र रूप पंचायतों के न्याय की मान्यता जाटों में है।

    महाभारत काल तक जाट शब्द समुदाय वाचक था। इसके पश्चात अन्य जातियों की भाँति इसका प्रयोग जन्मगत जाति के रूप में प्रचलित हो गया। जाटों ने अपनी वैभवशाली परम्परा एवं वीरोचित कार्यों से इतिहास के कुछ पृष्ठों पर साधिकार आधिपत्य किया है। जाट सदैव शौर्य एवं वीरता के प्रतीक रहे हैं।

    कुछ लेखक जाटों को आर्यों की संतान मानते हैं, कुछ हैहय क्षत्रियों की स्त्रियों के गर्भ से ब्राह्मणों द्वारा उत्पन्न घोषित करते हैं, कुछ इन्डोसिथियन जातियों के साथ इनका सम्बन्ध स्थापित करते हैं। कुछ शिव की जटा से उत्पन्न मानते हैं। कुछ युधिष्ठर की पदवी जेष्ठ से जाट उत्पन्न हुआ मानते हैं कुछ जटित्का को जाट जाति का आदि श्रोत ठहराते हैं। कुछ इन्हें विदेशों से आया हुआ जिट, जेटा ऐक गात ;जाटध्द मानते हैं। कुछ इनको ययाति पुत्र यदु से सम्बन्धित मानते हैं और कुछ इनका अस्तित्व पाणिनी युग पूर्व मानते हैं तथा आर्यों के साथ इनका अभिन्न सम्बन्ध स्थापित करते हैं।

    जाटों की शारीरिक संरचना, भाषा तथा बोली उन्हें आर्य प्रमाणित करती है। ऐसा डॉ0 ट्रम्प एवं वीम्स ने माना है। यह तय है कि जाट आर्य हैं और प्रचण्ड वीर हैं। संसार में विभिन्न देशों में जाट प्राचीन काल से आज तक निवास व शासन करते आये हैं भारत में बहुत प्राचीन काल से रहते आये हैं। जाटों ने तिब्बत, यूनान, अरब, ईरान, तुक्रिस्तान, चीन, ब्रिटेन, जर्मनी, साइबेरिया, स्कोण्डिनेलिया, इंग्लैण्ड, रोम व मिश्र आदि में कुशलता, दृढ़ता और साहस के साथ राज्य किया था और वहाँ की भूमि को विकास-वादी उत्पादन के योग्य बनाया था।

    मालवा, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा तथा गंगा-यमुना का किनारा उनका मूल निवास स्थल है। विदेशी आक्रमणकारियों से उन्होंने देश को बचाया है, हूणों को परास्त किया है, देश और समाज की प्रगतिशील संस्कृति के निर्माण में उन्होंने महान योगदान दिया है, राजा एवं पुरोहित के गठबन्धन को तोड़ा है, इस संघर्ष में वे स्वयं टूटे हैं लेकिन मिटे नहीं, उनकी रुचि इतिहास के निर्माण करने में रही, इतिहास लिखने का काम उन्होंने दूसरों के लिए छोड़ दिया, जिन्होंने अपना उत्तारदायित्व ईमानदारी से नहीं निभाया और जाटों की विशेषताओं से जनसाधारण को दूर ही रखा।




From -----Bhupender choudhary
जाट के आगे भुत भी नाचे सै
March 15th, 2009 . Posted in मखौल - Makhaul1 Comment »
Tags: जाट, बाजरा, भुत, शमशानघाट

एक बारी, एक जाट नें शमशानघाट में हल जोड़ दिया 
भूत किते बाहर जा रह्या था.
भूतनी जाट न डरावन खातर कांव कांव करण लागी. पर जाट ने कोई परवाह कोणी करी.
आख़िर भूतनी बोली “तू यो के करह सै” 
जाट बोल्या “में उरे बाजरा बोवुंगा” 
भूतनी बोली “हम कित रहंगे” 
जाट बोल्या “मनें ठेका नि ले राख्या.
भूतनी बोली “तू म्हारे घर का नास मत करै, हाम तेरे घर में 100 मण बाजरा भिजवा दयांगे”.
जाट बोल्या “ठीक सै लेकिन तड़की पूंचना चाहिए नि तो में आके फेर हल जोड़ द्यूंगा” 
शाम नै भुत घर आया तो भूतनी बोली आज तो नास होग्या था.
न्यूं न्यूं बणी अर जाट 100 मण बाजरे में मसाए मान्या.
भुत ने भोत गुस्सा आया और बोल्या तने क्यों ओट्टी, मन्ने इसे जाट भोत देखे सै.
मन्ने उसका घर बता में उसने इब सीधा कर दयुन्गा. 
अर भुत जाट कै घर चल्या गया.
जाट कै घर में एक बिल्ली हील री थी. वा रोज आके दूध पी जाया करदी.
जाट नै खिड़की में एक सिकंजा लगा लिया और रस्सी पकड़ के बैठ ग्या अक आज बिल्ली आवेगी और मैं उसने पकडूँगा.
भुत नै सोची तू खिड़की मैं बड़के जाट ने डरा दे.
वो भीतर नै सीर करके खुर्र-खुर्र करण लाग्या आर जाट नै सोची – बिल्ली आगी.
उसने फट रस्सी खिंची आर भुत की नाड़ सिकंजा मैं फस गी आर वो चिर्र्र – चिर्र्र करण लाग ग्या.
जाट बोल्या रै तू कोण सै ?
वो बोल्या मैं भुत सूं.
जाट बोल्या उरै के करे सै ?
भुत बोल्या “मैं तो न्यू बुझंन आया था एके तू 100 मण बाजरे मैं मान ज्यागा अके पूली भी साथै भिजवानी सै?
ठीक कही सै – जाट के आगे भुत भी नाचे सै .
One Response to “जाट के आगे भुत भी नाचे सै”



गाम के छोरे स्कूल जावै थे
रास्ते मै एक बणिए और जाट के छोरे का झगडा हो गया ।
दोनु गुथ्थ्म गुथ्था हो लिये । बणिए के छोरे का दावं कुछ इस्सा बैठया कै
वो जाट आले छोरे नै नीचे पटक के और उसके उपर बैठ गया
और उसने कूटता भी जावै और रोता भी जावै था....
तभी उधर सै ताउ फत्ते निकल्या...
ताउ : रे छोरे बणिए के ! तु इस जाट के छोरे नै छेत्तन भी लागरया सै ।
और फिर तै रोता भी जावै सै ? क्यूं कर ?
बणिए का बोल्या : ताउ जब यो उठेगा तब के होवैगा ?



गाम के छोरे स्कूल जावै थे
रास्ते मै एक बणिए और जाट के छोरे का झगडा हो गया ।
दोनु गुथ्थ्म गुथ्था हो लिये । बणिए के छोरे का दावं कुछ इस्सा बैठया कै
वो जाट आले छोरे नै नीचे पटक के और उसके उपर बैठ गया
और उसने कूटता भी जावै और रोता भी जावै था....
तभी उधर सै ताउ फत्ते निकल्या...
ताउ : रे छोरे बणिए के ! तु इस जाट के छोरे नै छेत्तन भी लागरया सै ।
और फिर तै रोता भी जावै सै ? क्यूं कर ?
बणिए का बोल्या : ताउ जब यो उठेगा तब के होवैगा ?





Alliance with Maharaja Suraj Mal

Maharaja Bhim Singh Rana played an important role in keeping a power balance in Malwa. The Delhi Mughal ruler sent Jai Singh of Jaipur as satrap of Malwa in 1729. Malharrao Holkar, Udaji Panwar and Kanthaji Panwar encountered Jay Singh at the Mandavgarh fort. Jay Singh succeeded in defeating the Marathas, with the help of Maharaja Suraj Mal of Bharatpur state.

Maharaja Bhim Singh Rana helped Suraj Mal in this mission. This alliance made them the enemies of the Marathas.
Captures Gwalior fort

Bhim Singh Rana increased his powers and was planning to expand his territories. He marched to Malwa in 1736 but came back and targeted the Gwalior Fort. Marathas were also in race to win the Gwalior Fort. The weak and easy-going Mughal satrap Alikhan, looking to the power of Jats, surrendered the fort to Bhim Singh Rana. Meanwhile there was a severe fight between Marathas and Jats to win the Gwalior Fort but Jats won and the Gwalior fort came under Jats.

Bhim Singh Rana occupied the Gwalior fort from 1740-1756.[3]
Chhatri near Bhimtal in memory of Maharaja Bhim Singh Rana on the Gwalior Fort.
Death

In 1756 Marathas attacked the Gwalior Fort under the leadership of Great Warrior Mahadji Rao Sahev Shinde, Yammaji Rahalkar and Motiram Bani with a huge army. There was a severe war between the Jat Army and the Maratha Army down below the fort. At one time Bhim Singh Rana was not riding horse at that time Maratha Atrao attacked Rana with sword. Bhim Singh Rana was wounded and carried out of the war site by his soldiers. He died after three days on Chaitra sudi navami (Ram navami) in 1756. His queen Roshani committed jauhar. The fort came in occupation of Marathas.[4]
Constructed historical monuments

Maharaja Bhim Singh had constructed a historical monument Bhimtal in 1754 on the Gwalior fort. His successor Maharaja Chhatra Singh Rana constructed a grand Chhatri near Bhimtal in memory of Maharaja Bhim Singh on the Gwalior Fort. Jat Samaj Kalyan Parishad Gwalior organizes a fair on Gwalior fort on Ram Navami every year in honour of Maharaja Bhim Singh Rana.[5]
Assessment by Maratha historian

The Maratha Historian Srimant Balwantrao Bhaiya Saheb Sindhia,[6] appreciated the bravery of Rana Bhim Singh and has written about Bhim Singh Rana in his book “History of Gwalior fort” as under:

    “They (Kishwar Ali Khan and his people) decided to surrender the fort to Rana Bhim singh. Accordingly some 300 men of Rana were allowed to enter the fortress by the way of Kabootar Khana. They were soon followed by Rana Bhim Singh himself, who accompanied with soldiers on foot and on horse back and took up a position at the village of Goorganwan.

    The Rana being armless in the midst of the field of battle performed prodigies of valour and receiving wounds retired to Citedal, where he expired and three days after was cremated near the great Tank built by him in accordance with Hindu rites.”[7]

His successor

Rana Bhim Singh had no son. Girdhar Pratap Singh became his successor in 1755. Girdhar Pratap Singh was son of Samant Rao Balju, a family friend of Rana Bhim Singh. Girdhar Pratap Singh could not rule Gohad for long as he died in 1757. His successor was Rana Chhatar Singh (1757–1785).[8]