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== '''जनम और बाल्यकाल''' ==

सिन्धु नदी के तट पर स्थित सिंध प्रदेश (पाकिस्तान) के हैदराबाद जिल्हे के महराब चन्दाइ नामक गांव में ब्रह्म क्षत्रिय कुल में श्री टोपनदास गंगाराम जी का जनम हुवा था.वे गांव के सरपंच थे. साधू संतो के लिए उनके दिल में सन्मान था. उनकी दो पुत्रियाँ थी पर उनको पुत्र नही था. एक बार पुत्र इच्छा से प्रेरित होकर श्री टोपनदास अपने कुलगुरु श्री रतन भगत के दर्शन के लिए पास के गा(contracted; show full)
फ़िर श्री लीलाशाह जी टंडो मुहम्मद खान छोड़कर टंडो जान मुहम्मद खान मे आ गए. वहां पर उन्हें सदगुरु श्री केशवानंद जी मिले. इस प्रकार श्री केशवानंद जी के आश्रम मे रहकर श्री लीलाशाह जी ने वेदांत के ग्रंथो का अभ्यास किया, आश्रम और गुरु की सेवा भी साथ साथ करते रहे. कभी कभी अत्यधिक सेवा के कारन श्री लीलाशाह जी को शास्त्र कंठस्थ करने का समय न मिलता तो गुरुदेव कान पकड़कर इतने जोर से थप्पड़ मारते कि गाल पर दो तीन घंटे तक उँगलियों के निशान मोजूद रहते थे. 
श्री लीलाशाह जी का
 तप और वैराग्य परिपक्व हुवा, उनकी गुरु भक्ति फली, उन्हें बीस वर्ष के उमर मे ही आत्म साक्षात्कार हो गया. 
 


== '''सेवा कार्य और रहन सहन''' ==

सर्व प्रथम तलहार (सिंध) में जाकर श्री लीलाशाह जी ने संत रतन भगत के आश्रम में एक कुवां खुदवाया. वहां दुसरे साधकों के साथ वे भी एक मजदूर की भांति कार्य करते थे. वहीं उन्होंने एक गुफा बनवाई थी. लंबे समय तक वे उसकी गुफा में रहते, प्रात: काल गुफा में से निकलकर शुद्ध हवा लेने के लिए जंगल की ओर जाते. रोज प्रेमी भक्तो, श्रधालुओं, को सत्संग देते. दिन में एक ही बार भोजन लेते. मौज आ जाती तो अलग अलग गांवों और शहरों में जाकर भी लोक सेवा करते और सुबह शाम (contracted; show full)

पूज्य श्री लीलाशाह महाराज ने अपने कार्यक्षेत्र में कभी भी भौगोलिक सीमाओं की ओर नहीं देखा. उन्होंने तो जातिभेद से पार होकर, मानव जीवन का मूल्य समझाने, स्वास्थ्य को संतुलित करने के लिए योग का प्रचार, आध्यात्मिक ज्ञान देने के लिए सत्संग का प्रचार किया. 
९३ वर्ष की उम्र में भी वे कर्मशील बने रहे. इस उम्र में भी वे अपने सभी काम स्वयं करते. योग के सभी आसन और क्रियाएं भी करते. 
४ नवम्बर १९७३ को सुबह ७:२० पर स्वामी जी ने अपने देह को त्याग कर परम लोक की ओर प्रस्थान किया

[[श्रेणी:हिन्दू आध्यात्मिक नेता]]