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[http://www.argalaa.org][अरगला] इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका है। 

== अरगला पत्रिका के स्तंभों के बारे में ==

=== शिखर ===

(contracted; show full) और विनाश की तमाम सूरतें साफ़ दिखाई देने लगती हैं . इस स्तंभ का मक्सद है कि युवा और पुरानी पीढ़ी के बीच एक स्वस्थ संवाद पैदा किया जा सके. ताकि विश्व संस्कृति के निर्माण में इन विचारों से मानवीय मूल्य, परंपरा, संस्कार परिशोधन कर उसे नयी ज़मीन पर पुनर्स्थापित किया जा सके. आज के युग में पुराने पड़ चुके मूल्यों को दरकिनार किया जा चुका है। अभी जबकि नये मूल्य संपूर्णता के साथ सक्षम हुए परिपक्व ज़मीन में नहीं आए जिससे युग की परख़ करना बेहद मुश्किल है कि इस नवीनता में यथार्थ चेतना, किस अंश तक मानवीय और याँत्रिक है
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इस स्तंभ में पुरानी पीढ़ी के विचारों का द्वंद्व और तनाव हमेशा नए के साथ साथ है लेकिन एक जगह ऐसी है जहाँ दोनों अपने अपने विचारों का मिला जुला रूप रखने को समर्थ हैं, वह है 'हस्तक्षेप'. आज जबकि पुराने मूल्य दरकिनार कर दिये जा चुके हैं जबकि नए मूल्य अभी परिपक्व और सक्षम नहीं हुए हैं कि युग बदलाव और उसमें मानवीय यथार्थवादी चेतना कितनी मानवीय है कितनी याँत्रिक. इसकी परख़ कर सकें इसीलिए पुरानी पीढ़ी के विचारों के बिना यह संभव नहीं. युवा पीढ़ी युग निर्माण को शाश्वत धरातल पर सही सलामत ले जा सके. यह स्तंभ(contracted; show full)त सृजन को बनाए रखने की ख़ातिर हर हालात से लोहा लिया है और पराजय की ओर नहीं मुड़े. ऐसे सृजक आज भी पूरे समर्पण से सृजनात्मक क्षणों के बदले हुए परिवेश में जी रहे हैं। भले ही अनगिनत बाधाएँ हों उन्हें किसी नतीज़े का डर नहीं, कुछ होने की पीड़ा नहीं, कुछ पाने का दंभ नहीं. ये ऐसे सपनों का जीता जागता संसार हैं जिनके भीतर जो दुनिया पल रही है उसे बाहर प्रतिबंधित दायरों में लाने से क़तई परहेज़ नहीं संकोच नहीं, बल्कि बेहद सलीके से उसे हमारे समक्ष जो दुनिया है उसकी ओर एक चुनौती व अनुभव से भरा संकेत है जिसे हमें समझना है
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=== विरासत ===

आधुनिक हिन्दी साहित्य की प्रवृत्तियों में कई ऐसी विभूतियाँ हैं जिनकी चर्चा किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती. उनके समक्ष एक चुनौती थी - एक खण्डित, भयग्रस्त और नए युग की खोज से हतप्रभ समाज को दृष्टिबोध प्रदान करने की. विरासत के तौर पर उनके पास पुराणों की कपोलकल्पित कहानियाँ, भारतीय दर्शन की गवेषणा और परंपरागत विद्रोही भारतीय मन भी था, जो स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न खड़े करता है। इन पुरोधाओं ने न केवल नीर क्षीर विवेक से एक नींव का निर्माण किया बल्कि ऐसी दीवारें खड़ी कीं जिसमें अनुचित प्रवृत्तिय(contracted; show full)

दरसल पुस्तकें इंसान की रूह, मन, बौद्धिक चेतना, काल्पनिकता, मायावी जगत की प्रतिकृति है। शब्द डगर हैं और भाव तयशुदा फ़ासलों को पूरा करने के जज़्बों का तहख़ाना. एक एक वाक्य नई रचना संसार की अनंत परवाज़. अत: ऐसी कृतियाँ जिन्होंने भौतिकवादी संरचना और कुदरती क़ायनात को अपने अंदाज़ में ढाला, साथ ही साथ मक्सद को नज़रंदाज़ नहीं किया। इन पुस्तकों की समीक्षा करना सामाजिक गर्वोक्ति, सांस्कृतिक पहचान और राजनैतिक परिवेश का पुख़्ता बयान है
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[[श्रेणी:पत्रिकाएँ]]