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== सनातन धर्म संस्कृति खतरे में ढोंगी बाबाओं के कारण ==

कथा वाचक 'श्री उपेंद्र पराशर जी' के पूर्वोक्त कथन के आलोक में आम ग्रामीण लोगों के द्वारा पूछे गये महती प्रश्न और अपेक्षित उतर के प्रतीक्षा में ग्रामवासी और आम जनगण ----
*प्रश्न निम्नलिखित हैं°°°°* 
प्रश्न सं०1. साधू संतों का जीवन सर्वदा विलासिता से दूर समान्य जीवन होना चाहिए परन्तु आपकी प्रतिदिन की दिनचर्या एवं आपका जीवन-शैली किसी भी रूप में समान्य नहीं है। आप लग्जरियस वाहन तथा महँगे होटलों में ठहरते हैं, ये कहा तक उचित है। आपके हीं उपदेशों के मद्देनजर यह कहाँ तक धर्मसंगत है? यह पूरे जनमानस के लिए विचारणीय विषय वस्तु है, क्या आपके प्रवचन श्रोता गण को प्रभावित कर सकते हैं? मनुष्यों को कैसे   इन कथा-प्रवचनों से पुरुषार्थी बनाइयेगा?  
प्रश्न सं० 2. आपके द्वारा सन् 2007 में हकाम के इसी पावन पवित्र भूमि पर अपने प्रवचन में आपने कई निजी अनाथालय एवं वृद्धाश्रम के होने का नाम जिक्र किया था। आपके कथनानुसार उन सभी संस्थानों को आपके द्वारा संचालित किया जाता है। अतएव उनके लिए ग्रामीणों के द्वारा दान भी दिया गया जो सर्वविदित है। यह पंजीकृत अनाथालय एवं वृद्धाश्रम कहाँ पर अवस्थित है बताने का कष्ट करें?
प्रश्न सं० 3.आपका अंतरराष्ट्रीय ट्रस्ट संस्कार सुधा का निबंधन कहा हुआ है? निबंधन संख्या क्या है? और यह ट्रस्ट किन-किन देशों में संचालित/कार्यरत हैं बताने का कष्ट करें ? 
प्रश्न सं० 4. सन् 2007 में इसी हकाम ग्राम के राम जानकी मंदिर के प्राँगण में नवनिर्मित मंच से 06 फरवरी 2007 को 'रात्रि कथा' के दौरान आपने  वर्ष 2007 से सदा के लिये; कथा से सन्यास लेने की बात कही थी। किंतु आज तक यह असत्य है। इसे स्पष्ट करने की कृपा करें?
प्रश्न सं० 5. विगत वर्ष बगल के हरदिया मोड़ के समीप जो कथा हो रही थी उस कथा में आपके द्वारा कहा गया था कि- "जिस प्रकार स्वामी विवेकानंद जी को शिकागो शहर में हो रहे धर्म संसद में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा गया था ठीक उसी प्रकार मुझे भी 12 जुलाई 2017  को शिकागो के धर्म संसद में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया है।" जो कि सफेद झूठ साबित हुआ। इस सफेद झूठ को देखते हुए मैं और मेरे गाँव के लोग यह जानना चाहते हैं कि- पूर्व में कई कथाओं में आपके द्वारा विदेशों में जाकर कथा वाचन करने की बात कही गई है, जिस पर शंका होना लाजमी है। शंका निवारण वास्ते, आप सनातनी मर्यादारक्षण के रूप में अपना पासपोर्ट हमलोगों को दिखला सकते हैं क्या ?
प्रश्न सं० 6.आप महामंडलेश्वर, जगद्गुरु, ब्रह्माण्ड गुरु व अश्वमेघ पीठाधीश्वर की  उपाधियां किन मापदण्डों के आधार पर दी जाती हैं स्पष्ट  करे? राधे माँ को महामंडलेश्वर की उपाधि वितरण करने के संदर्भ में आपकी राय क्या है?
प्रश्न सं० 7.आपके द्वारा कई कथाओं में कहा गया है कि आप 26 भाषाओं के जानकार भी हैं। फलतः आपके इस कथन पर भी शंशय बरकरार है। क्या आप इस शंशय का समाधान करने की कृपा कर सकते हैं?
प्रश्न सं० 8. वर्तमान दौर के माहौलों में कई संतो के कुकृत्य टीवी चैनल वाले प्रसारण करते-करते थक गए हैं। इनकी धोखाधड़ी, अनार्य कृत्यों एवं विलासिता पूर्ण जीवनशैली की   अद्भुत कहानियों को देख-सुन कर शर्म से सिर झुक जाता है। क्या आप इन( पूर्व के विचित्र संतों) संदिग्ध संतों के प्रति अपने विचार प्रकट करने की कृपा करेंगें ?

प्रश्नों की संख्या तो अनगिनत है, परन्तु फिलहाल इन प्रश्नों के उत्तर ही दे देवें तो कृपा होगी ।।

"वैसे तो मैं आपके उम्र,योग्यता एवम शारीरिक बनावट के हिसाब से दूध मुहा बच्चा भी कहने में हिचकिचा रहा हूँ या यूं कहु कि मेरा जन्म आज ही हुआ है"

मैं आपसे अपील करता हूँ कि मेरे इन बुनियादी एवं धर्महितकारी प्रश्नों के उत्तर इस  आयोजित यज्ञ में यज्ञांतरानुकूल समय में ही उपस्थित जनमानस के समक्ष बिंदुवार देने की कृपा करें ।

धर्म के प्रति मेरे विचार के सारांश--

मैं मनिष ऋषी यह समझता हूँ कि मुझमें अनेक दोष होते हुए भी धर्मोचित साहस है। मैं अपने गाँव से दूसरे गाँव ,दोस्तों, साथियों और बड़े बुजुर्गों से निर्भीकता पूर्वक इन सभी बातों को प्रस्तुत किया। इसके अलावा मैं आपको बता दूँ की- कुछ दिनों से मेरे चारों ओर कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं। परिणामस्वरूप ये मेरे कार्य-लक्ष्य के प्रशस्ती में विशेष रूप से विघ्न डालने की चेष्टा कर रही हैं। यहाँ तक कि यदि इन सबों से सम्भव हो सके तो वे मुझे रौंदते हुए मेरा अस्तित्व ही नष्ट कर डाले। पर ईश्वर को कोटिशः धन्यवाद की उनके कृपा मात्र से ही शैतानों के सारे षड्यंत्र विफल हो जाते हैं। मैं स्पष्टीकरण के रूप में इन समस्त शब्दों को कहना चाहता हूँ। चूँकि मैं भगवत कर्मों के प्रति निष्ठावान हूँ इसलिए सजग और चेतन रहता हूँ। इन शब्दों का क्या फल होगा या ये शब्द आप लोगों के हृदय में कैसे उद्रेक होंगे, ये मैं नहीं जानता हूँ।
लेकिन हमसभी को सोचना तो पड़ेगा ही। और हम समझते हैं कि इन धर्म गुरुओं(?) से हमें क्यों डरना! वैसे भी हमलोग सुधार में यकीन नहीं करते हैं, हमलोग विश्वास करते हैं- स्वभाविक उन्नति में, सदय सहजीवन में, पाखंड से दूर औरों के लिए जीने में।
मैं अपने को ईश्वरपदाश्रित कर अपने समाज के लोगों के सिर पर आदेश-उपदेश मढ़ने का दुःसाहस नहीं कर सकता मसलन कि- तुम्हें इस तरह चलना होगा ,उस तरह नहीं। मैं तो सिर्फ उस गिलहरी की भांति होना चाहता हूँ जो रामजी के सेतु बाँधने के समय  योगदान स्वरूप थोड़ी बालू ला-ला कर लगनशीलता में रमी हुई थी। बस सीसे की तरह पारदर्शी रहूँ, यही मेरा भाव है जो पुरुषार्थी और आर्यकुल के कृत्यों के अनुरूप गतिशील रहना चाहता है ।।
                   
सादर समर्पित  
                    सर्वात्मनाभिमुखी
    मनीष ऋषि              
पूर्व अध्यक्ष राम जानकी मंदिर, हकाम
मोo 9525090999 [[सदस्य:मनीष ऋषी बैकुण्ठपुर|मनीष ऋषी बैकुण्ठपुर]] ([[सदस्य वार्ता:मनीष ऋषी बैकुण्ठपुर|वार्ता]]) 01:03, 10 अप्रैल 2018 (UTC)