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== तिथ्यानुसार रामकथा ==
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क्वार सुदी दशमी को नहीं मारा गया रावण!
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‘‘विजया दशमी यानी क्वार सुदी दशहरा को रावण मारा गया।’’ यह महापर्व सदियों से मनाया जाता है। हम और आप सभी पीढ़ी दर पीढ़ी विजय दशहरा का पर्व मना रहे हैं। बाल्मीकि रामायण तथा राम चरित मानस में भगवान राम का ऋष्यमूक पर्वत पर चातुर्मास प्रवास का उल्लेख मिलता है। ‘‘वर्षा और शरद ऋतु में जब राम-लक्ष्मण एक स्थान पर रहे तो क्वार में युद्ध हुआ ही नहीं होगा तो क्वार सुदी दशमी को रावण का संहार नहीं हुआ होगा।’’ इस जिज्ञासा को लेकर मैंने कई ग्रन्थ खंगाले, कहीं रावण बध की तिथि का प्रमाण नहीं मिला। पदम पुराण के पातालखंड में मेरी शंका का समाधान हुआ। ‘‘युद्धकाल पौष शुक्ल द्वितीया से चैत्र कृष्ण चैदस तक (87 दिन)’’ 15 दिन अलग अलग युद्धबंदी 72 दिन चले महासंग्राम में लंकाधिराज रावण का संहार क्वार सुदी दशमी को नहीं चैत्र वदी चतुर्दशी को हुआ। तिथ्यंतर भ्रम नहीं है। आज हम पूर्णिमा को पूर्णमासी मानते हैं जबकि पूर्णिमा मध्यमास है जिसका संकेत 15 लिखा जाता है। अमावस्या से मास परिवर्तित होता है जिसका संकेतांक 30 लिखते हैं इस आधार पर शुक्लपक्ष पहला पखवाडा और कृष्णपक्ष दूसरा पखवाडा है। यहां हिन्दी में मैंने आज के हिसाब से महीनों के नाम लिखें है जबकि मूल ष्लोकों में अन्तर दिखाई देगा। 
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रामचरित मानस हो बाल्मीकि रामायण अथवा ‘रामायण शत कोटि अपारा’ हर जगह ऋष्यमूक पर्वत पर चातुर्मास प्रवास के प्रमाण मिलते हैं। पद्मपुराण के पाताल खंड में श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के प्रसंग में अश्व रक्षा के लिए जा रहे शत्रुध्न ऋषि आरण्यक के आश्रम में पहुंचते हैं। परिचय देकर प्रणाम करतेे है।
शत्रुघ्न को गले से लगाकर प्रफुल्लित आरण्यक ऋषि बोले- गुरु का वचन सत्य हुआ। सारूप्य मोक्ष का समय आ गया। उन्होंने गुरू लोमश द्वारा पूर्णावतार राम के महात्म्य का उपदेश देते हुए कहा था कि जब श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा काश्रम में आयेगा, रामानुज शत्रुघ्न से भंेट होगी। वे तुम्हें राम के पास पहुंचा देंगे।
इसी के साथ ऋषि आरण्यक रामनाम की महिमा के साथ नर रूप में राम के जीवन वृत्त को तिथिवार उद्घाटित करते है- जनक पुरी में धनुषयज्ञ में राम लक्ष्मण कें साथ विश्वामित्र द्वारा पहुचना और राम द्वारा धनुषभंग कर राम- सीता विवाह का प्रसंग सुनाते हुए आरण्यक ने बताया तब विवाह राम 15 वर्ष के और सीता 06 वर्ष की थी।
ईश्वरस्य धनुर्भग्नं जनकस्य गृहे स्थितम्।
रामः पंचदशे वर्षे षड्वर्षामथ मैथिलीम्।।
विवाहोपरांत वे 12 वर्ष अयोध्या में रहे 27 वर्ष की आयु में राम के अभिषेक की तैयारी हुई मगर रानी कैकेई के वर मांगने पर सीता व लक्ष्मण के साथ श्रीराम को चैदह वर्ष के वनवास में जाना पड़ा।
उपयेमे विवाहेन रम्यां सीतामयोनिजाम्।
कृतकृत्यस्तदा जातः सीतां संप्राप्य राघवः।।
ततो द्वादश वर्षाणि रेमे रामस्तया सह।
सप्तविंशतिमे वर्षे यौवराज्यमकल्पयत्।।
वनवास में राम प्रारंभिक 3 दिन जल पीकर रहे चैथे दिन से फलाहार लेना शुरू किया। पांचवें दिन वे चित्रकूट पहुंचे, वहां पूरे 12 वर्ष रहे। 
जानकी लक्ष्मणसखं रामं प्राव्राजयन्नृपः।
त्रिरात्रमुदकाहारश्चतुर्थेऽह्नि फलाशनः।।
पंचमे चित्रकूटे तु रामस्थानमकल्पयत्।
13वें वर्ष के प्रारंभ में राम लक्ष्मण और सीता के साथ पंचवटी पहुचे। जहां सुर्पनखा को कुरूप किया।
अथ त्रयोदशे वर्षे पंचवट्यां महामुने।
रामो विरूपयामास शूर्पणखां निशाचरीम्।
वने विचरतस्तस्य जानक्या सहितस्य च।। २२
माघ कृष्ण अष्टमी को वृन्द मुहूर्त में लंकाधिराज दशानन ने साधुवेश में सीता का हरण किया। 
आगतो राक्षसस्तां तु हर्तुं पापविपाकतः।
ततो माघासिताष्टम्यां मुहूर्ते वृंदसंज्ञिते।।२३
श्रीराम व्याकुल होकर सीता की खोज में लगे रहे। जटायु का उद्धार व शबरी मिलन के बाद ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे, सुग्रीव से मित्रता कर बालि का बध किया।
रामरामेति मां रक्ष रक्ष मां रक्षसा हृताम्।
यथा श्येनः क्षुधाक्रांतः क्रंदंतीं वर्तिकां नयेत्।।२५
तथा कामवशं प्राप्तो रावणो जनकात्मजाम्
नयत्येवं जनकजां जटायुः पक्षिराट्तदा।। २६
आषाढ़ सुदी एकादशी से चातुर्मास प्रारंभ हुआ। शरद ऋतु के उत्तरार्द्ध यानी कार्तिक शुक्लपक्ष में वानरों ने सीता की खोज शुरू की समुद्र तट पर कार्तिक शुक्ल नवमी को संपाती नामक गिद्ध ने बताया सीता लंका की अशोक वाटिका में हैं। तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थानी) को हनुमान ने लगाई छलांग लगाई , रात में लंका प्रवेश कर खेजवीन करने लगे। कार्तिक शुक्ल द्वादशी को अशोक वाटिका में शिंशुपा वृक्ष पर छिप गये और माता सीता को रामकथा सुनाई। कार्तिक शुक्ल तेरस को वाटिका विध्वंश किया, उसी दिन अक्षय कुमार का बध किया। कार्तिक शुक्ल चैदस को मेघनाद ब्रह्मपाश में बांधकर दरवार में ले गये और लंकादहन किया। हनुमानजी कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को वापसी में समुद्र पार किया। प्रफुल्लित सभी वानरों ने नाचते गाते 5 दिन मार्ग में लगाये और अगहन कृष्ण षष्ठी को मधुवन में आकर वन ध्वंस किया
युयुधे राक्षसेंद्रेण स रावणहतोऽपतत्
मार्गशुक्लनवम्यां तु वसंतीं रावणालये।।२७
संपातिर्दशमे मास आचख्यौ वानरेषु ताम्।
एकादश्यां महेंद्राद्रे पुःप्लुवे शतयोजनम्।।
हनूमान्निशि तस्यां तु लंकायां पर्यकालयत्।
तद्रात्रिशेषे सीताया दर्शनं हि हनूमतः।।२९
द्वादश्यां शिंशपावृक्षे हनूमान्पर्यवस्थितः।
तस्यां निशायां जानक्या विश्वासाय च संकथा।।
अक्षादिभिस्त्रयोदश्यां ततो युद्धमवर्तत।
ब्रह्मास्त्रेण चतुर्दश्यां बद्धः शक्रजिता कपिः।।
वह्निना पुच्छयुक्तेन लंकाया दहनं कृतम्।
पूर्णिमायां महेंद्राद्रौ पुनरागमनं कपेः ।।२
मार्गासितप्रतिपदः पंचभिः पथिवासरैः।
पुनरागत्य षष्ठेऽह्नि ध्वस्तं मधुवनं किल।।३३
हनुमान की अगवाई में सभी वानर अगहन कृष्ण सप्तमी को श्रीराम के समक्ष पहुचे। हालचाल दिये।
सप्तम्यां प्रत्यभिज्ञानदानं सर्वनिवेदनं।
अष्टम्युत्तरफल्गुन्यां मुहूर्ते विजयाभिधे।।३४
मध्यं प्राप्ते सहस्रांशौ प्रस्थानं राघवस्य च।
रामः कृत्वा प्रतिज्ञां तु प्रयातो दक्षिणां दिशम्।। ३
अगहन कृष्ण अष्टमी उ. फाल्गुनी नक्षत्र विजय मुहूर्त में श्रीराम ने वानरों के साथ दक्षिण दिशा को कूच किया और 7 दिन में किष्किंधा से समुद्र तट पहुचे। अगहन शुक्ल प्रतिपदा से तृतीया तक विश्राम किया।
तीर्त्वाहं सागरमपि हनिष्ये राक्षसेश्वरम्।
दक्षिणाशां प्रयातस्य सुग्रीवोऽप्यभवत्सखा।। ३६
वासरैः सप्तभिः सिंधोः स्कंधावारनिवेशनम्।
पौषशुक्लप्रतिपदस्तृतीयायावदंबुधेः।।
अगहन शुक्ल चतुर्थ को रावणानुज श्रीरामभक्त विभीषण की शरणागत हुआ। अगहन शुक्ल पंचमी को समुद्र पार जाने के उपायों पर परिचर्चा हुई। सागर से मार्ग याचना में श्रीराम ने अगहन शुक्ल षष्ठी से नवमी तक 4 दिन अनशन किया। सत्तमी को अग्निवाण का संधान हुआ तो रत्नाकर प्रकट हुए और सेतुबंध का उपाय सुझाया। अगहन शुक्ल दशमी से तेरस तक 4 दिन में श्रीराम सेतु बनकर तैयार हुआ।
उपस्थानं ससैन्यस्य राघवस्य बभूव ह।
बिभीषणश्चतुर्थ्यां तु रामेण सह संगतः।।
समुद्रतरणार्थाय पंचम्यां मंत्र उद्यतः।
प्रायोपवेशनं चक्रे रामो दिनचतुष्टयम्।।३९
समुद्रवरलाभश्च सहोपायप्रदर्शनं।
ततो दशम्यामारंभस्त्रयोदश्यां समापनम्।।
अगहन शुक्ल चैदस को श्रीराम ने समुद्रपार सुवेल पर्वत पर प्रवास किया, अगहन शुक्ल पूर्णिमा से पौष कृष्ण द्वितीया तक 3 दिन में वानरसेना सेतुमार्ग से समुद्र पार कर पाई। पौष कृष्ण तृतीया से दशमी तक एक सप्ताह लंका का घेराबंदी चली। पौष कृष्ण एकादशी को सुक सारन वानर सेना में घुस आये। पौष कृष्ण द्वादशी को वानरों की गणना हुई और पहचान करके उन्हें अभयदान दिया।
चतुर्दश्यां सुवेलाद्रौ रामः सैन्यं न्यवेशयत्।
पौर्णमास्यां द्वितीयां तं त्रिदिनैः सैन्यतारणम्।।
तीर्त्वा तोयनिधिं रामो वानरेश्वरसैन्यवान्।
रुरोध च पुरीं लंकां सीतार्थं सह लक्ष्मणः।। ४२
तृतीयादि दशम्यंतं निवेशश्च दिनाष्टकं।
शुकसारणयोस्तत्र प्राप्तिरेकादशे दिने।।। ४३
पौषासिताख्यद्वादश्यां सैन्यसंख्यानमेव च।
शार्दूलेन कपींद्राणां सहसारोपवर्णनम्।।४
पौष कृष्ण तेरस से अमावस्या तक रावण ने गोपनीय ढंग से सैन्याभ्यास किया। 
त्रयोदश्या अमावास्यां लंकायां दिवसैस्त्रिभिः।
रावणः सैन्यसंख्यानं रणोत्साहं तदाकरोत।।
पौष शुक्ल प्रतिपदा को अंगद को दूत बनाकर भेजा गया। 
प्रययावंगदो दौत्यं माघशुक्लाद्यवासरे।
सीतायाश्च ततो भर्तुर्मायामूर्द्धादिदर्शनम्।।
इसके बाद पौष शुक्ल द्वितीया से अष्टमी तक वानरों व राक्षसों में घमासान युद्ध हुआ।
माघद्वितीयादि दिनैः सप्तभिर्यावदष्टमी।
रक्षसां वानराणां च युद्धमासीच्च संकुलम्।।
पौष शुक्ल नवमी को मेघनाद द्वारा राम लक्ष्मण को नागपाश में बांध दिया गया। श्रीराम के कान में कपीश द्वारा पौष शुक्ल दशमी को गरुड़ मंत्र का जप किया गया, पौष शुक्ल एकादशी को गरुड़ का प्राकट्य हुआ और उन्होंने नागपाश काटा और राम लक्ष्मण को मुक्त किया।
माघशुक्लनवम्यां तु रात्राविंद्रजिता रणे।
रामलक्ष्मणयोर्नागपाशबंधः कृतः किल।।
आकुलेषु कपीशेषु निरुत्साहेषु सर्वशः।
नागपाशविमोक्षार्थं दशम्यां पवनोऽजपत्।।४९
कर्णे स्वरूपं रामस्य गरुडागमनं ततः।
एकादश्यां च द्वादश्यां धूम्राक्षस्य वधः कृतः।।
पौष शुक्ल द्वादशी को ध्रूमाक्ष्य बध, पौष शुक्ल तेरस को कंपन बध, पौष शुक्ल चैदस से माघ कृष्ण प्रतिपदा तक 3 दिनों में कपीश नील द्वारा प्रहस्तादि का बध, माघ कृष्ण द्वितीया से चतुर्थी तक राम रावण में तुमुल युद्ध हुआ और रावण को भागना पड़ा।
त्रयोदश्यां तु तेनैव निहतः कंपनो रणे।
माघशुक्लचतुर्दश्या यावत्कृष्णादिवासरम्।।
त्रिदिनेन प्रहस्तस्य नीलेन विहितो वधः।
माघकृष्णद्वितीयायाश्चतुर्थ्यं तं त्रिभिर्दिनैः।। ५२
रामेण तुमुले युद्धे रावणो द्रावितो रणात्।।
रावण ने माघ कृष्ण पंचमी से अष्टमी तक 4 दिन में कुंभकरण को जगाया। माघ कृष्ण नवमी से शुरू हुए युद्ध में छठे दिन चैदस को कुंभकरण को श्रीराम ने मार गिराया।
पंचम्या अष्टमीयावद्रावणेन प्रबोधितः। ५३
कुंभकर्णस्तदा चक्रेऽभ्यवहारं चतुर्दिनं।
कुंभकर्णो दिनैः षड्भिर्नवम्यास्तु चतुर्दशीम्।। ५४
कुंभकरण बध पर माघ कृष्ण अमावस्या को शोक में रावण द्वारा युद्ध विराम किया गया। 
रामेण निहतो युद्धे बहुवानरभक्षकः।
अमावास्यादिने शोकादवहारो बभूव ह।।
माघ शुक्ल प्रतिपदा से चतुर्थी तक युद्ध में विसतंतु आदि 5 राक्षसीें का बध हुआ। 
फाल्गुनादिप्रतिपदश्चतुर्थ्यंतं चतुर्दिनैः।
बिसतंतुप्रभृतयो निहताः पंचराक्षसाः।।५६
माघ शुक्ल पंचमी से सप्तमी तक युद्ध में अतिकाय मारा गया। माघ शुक्ल अष्टमी से द्वादशी तक युद्ध में निकुम्भ-कुम्भ बध, माघ शुक्ल तेरस से फागुन कृष्ण प्रतिपदा तक युद्ध में मकराक्ष बध हुआ।
पंचम्याः सप्तमी यावदतिकायवधस्तथा।
अष्टम्याद्वादशी यावन्निहतौ दिनपंचकात्। 
निकुंभकुंभावूध्र्वं तु मकराक्षस्त्रिभिर्दिनैः।
फागुन कृष्ण द्वितीया को लक्ष्मण मेघनाद युद्ध प्रारंभ सप्तमी को लक्ष्मण मूच्र्छित हुए उपचार हुआ। इस घटना के कारण फागुन कृष्ण तृतीया से सप्तमी तक 5 दिन युद्ध विराम रहा।
फाल्गुनासितद्वितीयायां दिने शक्रजिता जितम्।
तृतीयादिसप्तम्यंतं दिनपंचकमेव च।।
फागुन कृष्ण अष्टमी को वानरों ने यज्ञ विध्वंस किया, फागुन कृष्ण नवमी से तेरस तक चले युद्ध में लक्ष्मण ने मेघनाद को मार गिराया।
ओषध्यानयनव्यग्रादवहारो बभूव ह।५९
ततस्त्रयोदशीयावद्दिनैः पंचभिरिंद्रजित्।
लक्ष्मणेन हतो युद्धे विख्यातबलपौरुषः।।
इसके बाद फागुन कृष्ण चैदस को रावण की यज्ञ दीक्षा ली और फागुन कृष्ण अमावस्या को युद्ध के लिए प्रस्थान किया। फागुन शुक्ल प्रतिपदा से पंचमी तक भयंकर युद्ध में अनगिनत राक्षसों का संहार हुआ।
चतुर्दश्यां दशग्रीवो दीक्षां प्रापावहारतः।
अमावास्यादिने प्रायाद्युद्धाय दशकंधरः।।
चैत्रशुक्लप्रतिपदः पंचमीदिनपंचकैः।
रावणे युद्धमाने तु प्रचुरो रक्षसां वधः।।
फागुन शुक्ल षष्टी से अष्टमी तक युद्ध में महापाश्र्व आदि का राक्षसों का बध हुआ। फागुन शुक्ल नवमी को पुनः लक्ष्मण मूच्र्छित हुए, सुखेन बैद्य के परामर्श पर हनुमान द्रोणागिरि लाये और लक्ष्मण पुनः चेतन्य हुए।
चैत्रषष्ठ्याष्टमी यावन्महापाश्र्वादि मारणं।
चैत्रशुक्लनवम्यां तु सौमित्रेः शक्तिभेदनम्।।६३
कोपाविष्टेन रामेण द्रावितो दशकंधरः।
द्रोणाद्रिरांजनेयेन लक्ष्मणार्थमुपाहृतः।। ६४
राम-रावण युद्ध फागुन शुक्ल दशमी को पुनः प्रारंभ हुआ। फागुन शुक्ल एकादशी को मातलि द्वारा श्रीराम को विजयरथ दान किया।
दशम्यामवहारोभूद्रात्रौ युद्धे तु रक्षसां।
एकादश्यां तु रामाय रथं मातलिसारथिः।।
फागुन शुक्ल द्वादशी से रथारूढ़ राम का रावण से तक 18 दिन युद्ध चला। चैत्र कृष्ण चैदस को दशानन रावण को मौत के घाट उतारा गया।६५
प्रेरितो वासवेनाजावर्पयामास भक्तितः।
कोपवानथ द्वादश्या यावत्कृष्णचतुर्दशी।। ६६
अष्टादशदिनै रामो रावणं द्वैरथेऽवधीत्।
संग्रामे तुमुले जाते रामो जयमवाप्तवान्।।
युद्धकाल पौष शुक्ल द्वितीया से चैत्र कृष्ण चैदस तक (87 दिन) 15 दिन अलग अलग युद्धबंदी रही 72 दिन महाचला संग्राम और श्रीराम विजयी हुए, चैत्र कृष्ण अमावस्या को विभीषण द्वारा रावण का दाह संस्कार किया गया।
माघशुक्लद्वितीयायाश्चैत्रकृष्ण चतुर्दशीम्।
सप्ताशीतिदिनेष्वेव मध्यं पंचदशाहकम्।।
युद्धावहारः संग्रामो द्वासप्तति दिनान्यभूत्।
संस्कारो रावणादीनाममावस्या दिनेऽभवत्।।६९
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (नव संवत्सर) से लंका में नये युग का प्रारंभ हुआ। चैत्र शुक्ल द्वितीया को विभीषण का राज्याभिषेक किया गया।
वैशाखादि तिथौ राम उवास रणभूमिषु।
अभिषिक्तो द्वितीयायां लंकाराज्ये विभीषणः।।
अगले दिन चैत्र शुक्ल तृतीया का सीता की अग्निपरीक्षा ली गई और चैत्र शुक्ल चतुर्थी को पुष्पक विमान से राम, लक्ष्मण, सीता उत्तर दिशा में उड़े। 
सीताशुद्धिस्तृतीयायां देवेभ्यो वरलंभनम्।
हत्वा चिरेण लंकेशं लक्ष्मणाग्रज एव सः।।
गृहीत्वा जानकीं पुण्यां दुःखितां राक्षसेन तु।
आदाय परया प्रीत्या जानकीं स न्यवर्तत।। ७२
वैशाखस्य चतुथ्र्यां तु रामः पुष्पकमाश्रितः।
विहायसा निवृत्तस्तु भूयोऽयोध्यां पुरीं प्रति ।।
चैत्र शुक्ल पंचमी को भरद्वाज के आश्रम में पहंचे। चैत्र शुक्ल षष्ठी को नंदीग्राम में राम-भरत मिलन हुआ।
पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पंचम्यां माधवस्य तु।
भरद्वाजाश्रमे रामः सगणः समुपाविशत्।।७४
नंदिग्रामे तु षष्ठ्यां स भरतेन समागतः।।
चैत्र शुक्ल सप्तमी को अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक किया गया। 
सप्तम्यामभिषिक्तोऽसावयोध्यायां रघूद्वहः। ७५
दशैकाधिकमासांस्तुचतुर्दशाहानि मैथिली।।
उवास राम रहिता रावणस्य निवेशने।७६
द्विचत्वारिंशक वर्षे रामो राज्यमकारयत्।।
यह पूरा आख्यान ऋषि आरण्यक ने शत्रुघ्न को सुनाया फिर शत्रुघ्न ने आरण्यक को अयोघ्या पहुंचाया जहां अपने आराध्य पूर्णावतार श्रीराम के सान्निध्य में ब्रह्मरंध्र द्वारा सारूप्य मोक्ष पाया।
।। सत्यमेव जयते।।
सप्रमाण स्वाध्याय-शोध: देवेश शास्त्री

== जिन्दगी ==
जिन्दगी मुझको लगी, महबूब का ज्यों प्यार हो। 
जिन्दगी ऐसी खली, ज्यों नफरतों का हार हो।।

 रंगीनियत कुछ पल समेटे आ गयी जब सामने, 
हूरे-जन्नत जिन्दगी, उस पर किये सिंगार हो।
 
जब खुशी में हो गया, पागल बताऊँ क्या तुम्हें, 
(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है।