Revision 9798 of "अन्तर्दृष्टि" on hiwikibooks

== जिन्दगी ==
जिन्दगी मुझको लगी, महबूब का ज्यों प्यार हो। 
जिन्दगी ऐसी खली, ज्यों नफरतों का हार हो।।

 रंगीनियत कुछ पल समेटे आ गयी जब सामने, 
हूरे-जन्नत जिन्दगी, उस पर किये सिंगार हो।
 
जब खुशी में हो गया, पागल बताऊँ क्या तुम्हें, 
जिन्दगी मीठी लगी खट्टी लगी ज्यों जार हो।
 
कष्ट का जब सिलसिला आया, चला, चलता रहा, 
जिन्दगी यो लग रही थी, खड्ग की ज्यों धार हो।
 
पल खुशी के हमने हँसते, काटे न मालूम ही पड़ा, 
जिन्दगी का अर्थ लगता था, गुले गुलजार हो।
 
जिल्लतों का समय, काटे से भी कटता है नहीं, 
जिन्दगी है बन गया अश्कों का लम्बा हार हो।
 
जहर का प्याला नहीं, अमृत की भी बूँदें नहीं, 
जिन्दगी के जाम में, अंगूर का ज्यों क्षार हो।

-देवेश शास्त्री

== आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण ==
आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प्रतिकूलता दुःख । अनासक्त भाव को इस तरह देखें - आसक्ति व विरक्ति दोनों से श्रेष्ठ है अनासक्ति, जिससे परमानंद की अनुभूति होती है। आत्मदृष्टा जब अंतर्मुखी हो जाता है परमात्मरूप ( videh) प्रतीत होता है , उसकी हर गतिविधि रहस्य प्रतीत होती है ।

== हरतालिका-गणपति-सप्तर्षि त्रिवेणी में ‘दश-लाक्षणी’ धर्म का विज्ञानपरक रहस्य ==
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देवशयनी एकादशी से देवोत्थानी एकादशी तक चातुर्मास्य ‘‘आत्मशोधन का कालखंड’’ माना जाता है। सावन में काम (सेक्स) मर्दन शिवत्व की साधना, भाद्रपद के पूर्वार्द्ध में परमेश्वर के परिपूर्णावतार लीलापुरुषोत्तम का प्राकट्योत्सव, व अत्तरार्द्ध में शिवत्व के लिए पार्वती के तप व लक्ष्यवेध की प्रतीक हरतालिका तीज, विघ्नविनाशक गणपति की साधना पर्व गणेशचैथ तथा तपबल से सौरमंडल में रहकर अपनी वेब्स से सज्ज्योति देने वाले सप्तर्षियों की आराधना पर्व ऋषि पंचमी की त्रिवेणी में दशलाक्षणी धर्म का ‘‘आत्म-मंथनीय’’ दश धर्मकलशों से क्रमशः 1. क्षमा, 2. मार्दव, 3. आर्जव, 4. शौच, 5. सत्य, 6. संयम, 7. तपस्या, 8. त्याग, 9. असंचय व 10. ब्रह्मचर्य रूपी ‘अमृत’ द्वारा स्वयं वाह्याभ्यान्तर शुद्धि हेतु अभिषेक प्रक्रिया विज्ञानपरक रहस्य को समेटे हुए है। इसी को सद्धर्म कहा गया है। क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तपस्या, त्याग, असंचय व ब्रह्मचर्य का मन-वाणी और कर्म में समावेश अजस्र ऊर्जा शक्ति को जाग्रत करता है, जो क्रमशः ऋषित्व, शिवत्व और सत्व के सोपान पर चढ़ते हुए सारूप्य मोक्ष यानी कैवल्य तक पहुंचाता है। 
				-देवेश शास्त्री

== मृत्युलोक का सत्य! ==
वास्तव में मृत्युलोक का सत्य सिर्फ मृत्यु है। यहां ईश्वर भी यदि किसी अवतार के रूप में आये तो उन्हें भी जाना पड़ा। कविवर शिशु जी लिखते है- ‘‘पता नहीं जाने वाले को आना भी पड़ता है, किन्तु यहां आने वाले को जाना ही पड़ता है। 
पौराणिक आख्यानों में ऐसे तमाम राक्षसी वृत्ति के लोगों के प्रसंग देखने को मिलते हैं जिन्होंने मौत पर विजय पाने के लिए तपबल से ईश्वरीय क्षमता हासिल कर ली हो मगर उन्हें भी मृत्यु से पराजित होना पड़ा। हिरण्यकश्यप ने वर पाया-‘‘ न दिन में, न रात में, न घर में, न बाहर, न नर से, न पशु से, न आधि से और व्याधि से मरूं’’ यानी मृत्युलोक के सत्य ‘‘मृत्यु’’ पर विजय का भ्रम पाला। स्वयं ईश्वर को ‘नृसिंह’ रूप धारण करके आना पड़ा। संध्या काल (न दिन, न रात) देहरी पर (न घर, न बाहर) आदि वर की गरिमा का पालन हुआ और मृत्युलोक के सत्य का वरण भी करना पड़ा।
आज हम 21 वी सदीं के आई टी के क्रांति दौर से गुजर रहे हैं और अनीति, अन्याय, अधर्म और असत् से धनार्जन कर रहे हैं। निरंतर सम्पदा के विस्तार की प्रवृत्ति इस मनो-दशा को परिभाषित करती है कि ‘‘हम कभी मरेंगे नहीं, और युग युगांतर भोगते रहेंगे।’’ जन्म-जन्मान्तर के संचित कर्म फल (प्रारब्ध को) भुलाना ही मृत्यु है। जो सन्मार्ग पर चलते हुए प्रारब्ध को स्वीकार कर जीवन यापन करते हुए मृत्यु को सहर्ष स्वीकार करता है, वह मरकर भी नहीं मरता। मृत्यु से तात्पर्य देहान्तरण है, हमारी कृत्य संचित कर्मफल में जुड़कर अगले परिवेश रूपी देह का चयन कर लेते हैं। इसी आधार पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- ‘‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि..’’ मृत्युलोक सिर्फ देहान्तरण की सत्यता को सिद्ध करता है जिसे मृत्यु कहा गया है, यह भी एक विभ्रम है। -देवेश शास्त्री

== मानव बनकर निःश्रेयस वन में कल्पवृक्ष की छााया में खुख पायें ==

गर्ग संहिता के विश्वजित खंड में प्रसंग आता है कि जब कृष्णकुमार प्रद्युम्न यादवसेना के साथ ब्रह्मांड विजय को निकलते हैं तो ‘रम्यकवर्ष’ में दैत्यराज कालनेमि (जिसका संहार हनुमानजी ने संजीवनी लेने जाते समय तब कर दिया था जब उसने साधु बनकर रास्ता रोका था) के पुत्र ‘‘कलंक’’ ने यादव सेना से भीषण युद्ध किया। साक्षात् कामदेव स्वरूप प्रद्युम्न ने कलंक पर ‘मारुत्यास्त्र’ का संधान किया। ‘मारुत्यास्त्र’ से बजरंगबली ने प्रकट होकर कालनेमि सुत कलंक का अंत कर दिया। रम्यकवर्ष में ‘‘मानवीय गिरि’’ है, जिसकी उपत्यिका में ‘‘निःश्रेयस वन’’ है, जो पारिजात (कल्पवृक्षों) का है। जिनकी छाया में कामधेनु गायें विचरण करती हैं।
भाव लोक में इस प्रसंग को समझें- रम्यकवर्ष यानी रमने योग्य राष्ट्र में प्रवेश संभव नहीं है, क्योंकि कलंक ही अवरोधक है जो जीव को भृंगीवृत्ति से सारूप्य यानी कलंकित कर देता है। मारुत्यास्त्र रूपी ब्रह्मचर्य बल से कलंक को नष्ट किया जाता है तब मानवीयगिरि की दुर्गम चढ़ाई पर आगे बढ़ सकते हैं। मानवीयगिरि से तात्पर्य मानवीयता से है, जो अति दुर्गम है मानवीयगिरि का आरोहण में स्वार्थ और महत्वाकांक्षा रूपी असंख्य रासायनिक-फिसलन है, मानवीयगिरि पर आरोहित विजेता ‘‘मानव’’ होता है। जो निःश्रेयसवन पहंुचता है यानी श्रेयात्मक महत्वाकांक्षा से परे हो जाता है वह ब्रह्मनिष्ठ परमहंस ही ‘‘सत्य’’ का सामीप्य योग पाकर कल्पवृक्ष का सुख भोगता है और कामधेनु का पयपान करते हुए सारूप्य मोक्ष पाता है।


== सत्कर्मों का प्रताप ==
http://hi.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8B_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A5%8D
‘‘सत्कर्मों का प्रताप’’ अपने आप में करोड़ों सूर्याें की ‘‘अनंत ऊर्जा यानी महत्तेज’’ जिससे दैहिक, दैविक व भौतिकताप स्वतः आने से पहले ही अस्तित्वहीन हो जाते हैं तथा अथाह ‘ब्रह्मद्रव का ऐसा प्रवाह जिसके आगे खड़ी चट्टानों के परखच्चे उड़ जाते हैं। आयें, पहले ‘सत्कर्म’ और ‘प्रताप’ शब्दों को समझें- सत् ही परमसत्ता है, प्रत्येक विचारक ‘‘कर्मसिद्धांत’’ को सर्वोपरि मानते हैं, संचित कर्मों के फल को ‘प्रारब्ध’ कहा गया है। गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कर्मयोग का उपदेश दिया। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा- ‘‘जो जस करहि, सो तस फल चाखा।’’ कर्मगति ही जब प्रारब्ध है तो उसे भोगना ही है। ऐसे सर्वाधार ‘कर्म’ को परमसत्ता ‘सत’ को सौपना यानी कर्मों को सत् से संबद्ध करना ही सत्कर्म है। जो क्रमशः बुद्धिगत चिंतन, आहार, व्यवहार आदि सोपान से आगे बढ़ता है इन्हें भी सत् से जोड़ना होगा- सद्बुद्धि होने पर सद्विचार आयेंगे सात्विक आहार होगा, तब सदाचरण (सत् आचरण) होगा। इन सोपानों से आगे बढ़कर हम जिस रास्ते पर होंगे वह सत्पथ यानी सन्मार्ग होगा। इस रास्ते से ही हमारा कर्म, अकर्म व विकर्म सभी कुछ सत्कर्म हो जायेंगे।

== .. अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये! ==
��जलाओ दिये, पर रहे ध्यान इतना। अंधेरा धरा पर, कहीं रह न जाये।�� पद्मश्री गोपालदास �नीरज� की इन पंक्तियों के गूढ़ार्थ को समझना ही जीवन को दिव्य बनाना है। जीवन ही समाज है, समाज ही देश और विश्व है। दीपोत्सव से तात्पर्य विश्व को ��दिव्य-आलोक�� से प्रकाशित करना। अंधेरा मिटाने के लिए दीप प्रज्ज्वलित करना, महज वार्षिक अनुष्ठान न होकर नियमित प्रक्रिया होनी चाहिए। अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म का गहन अंधकार हम सबकी स्वार्थाच्छादित कलुषित मानसिकता से बढ़ता ही जा रहा हैं। वर्ष में एक दिन विशेष को प्रकाश-पर्व इस उद्घोष के साथ मनाया जाता है- अंधेरा धरा पर, कहीं रह न जाये। प्रगाढ़ अंधकार को भला कृत्रिम दीपमालिकाओं से कैसे मिटाया जा सकता है? अध्यात्म-विज्ञान करोड़ों सूर्यों के प्रकाशपुंज �आत्म-तत्व� को ज्ञान रूपी नीराजना से प्रकाशित करने का संदेश देता है ताकि अंतःचतुष्टय (मन, चित्त, बुद्धि व अहंकार) पर छाये अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म का गहन अंधकार को दूर हो सके। जब जन-जन में आत्म-तत्व प्रकाशपुंज के रूप में दीप जलेंगे। तो ज्ञान स्वरूप प्रकाश से अज्ञान-तिमिर छंट जायेगा। सत् रूप प्रकाश से असत् स्वरूप अंधेरा मिटेगा। नैतिकता का प्रकाश अनैतिकता रूपी तम को उखाड़ देगा। न्याय स्वरूप आलोक अन्याय रूपी काले अंधेरे का भंजन करेगा और धर्म-ज्योति से अधर्म रूपी तिमिरान्धकार मिट जायेगा। अंधेरे का सफर कितना दुस्तर होता है? कहीं कांटों में उलझने का, तो कहीं कुए अथवा गड्ढे में गिरने का भय आगे बढ़ने नहीं देता, ऐसे में कहीं हवा के झोंके में सरसराहट होने लगे तो किसी हिंसक जानवर का शिकार बनने का डर, अपनी ही छाया में प्रेत की अनुभूति प्राणघातक हो जाती है। वही दशा मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार पर छाये अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म के गहन अंधकार के कारण जीवन के पल-पल गड्ढे में गिरने, कांटों में उलझने, भय के भूतों से आहत होते हुए गुजर रहे है। दिये जलाये, जाते हैं फिर भी अंधेरा? वास्तव में दीपोत्सव अब दिखवा है। अंतःकरण में कालिमा समेटे वाह्य अंधकार को मिटाने का दंभ और सर्व जनोपयोगी �तेज� को कृत्रिम प्रसाधनों से हथियाने (हक हरण) की वृत्ति के भ्रम में �तम� की ही परत हम मोटी करते जा रहे है। ��तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय, मृत्युर्मामृतं गमय�� की प्रार्थना के साथ ज्ञान, सत्य, नीति, न्याय, धर्म की दीपमालिका विवेकपूर्ण रंगोली की बुद्धि पर प्रज्ज्वलित करें जिससे ��आत्म-तत्व�� का प्रकाशपुंज अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म का गहन अंधकार को मिटा देगा। -सत्यमेव जयते- तेजोऽसि तेजो मयि देहि। ओजोऽसि ओजो मयि देहि। वीर्याेऽसि वीर्यो मयि देहि।

== सत्याय मितभाषिणाम् ==

आज शोभन सरकार की भविष्यवाणी पर न केवल सरकार बल्कि समूचा विश्व आंखें जमाये उन्नाव जिले के डौंड़िया खेड़ा में स्वर्णभंडार होने की सत्यता पर अनेकानेक भ्रम और संशय के भ्रमर जाल में उलझता हुआ प्रतीत हो रहा है। क्या स्वप्न कोेे प्रतीक बनाकर की गई भविष्यवाणी सच होगी?
जब हम रामायण को पढ़ते हैं, तो लगता है कि महर्षि बाल्मीकि ने वह लिखा जो तब हुआ नहीं था, यानी जो लिखा वहीं क्रमशः होता गया। रामायण महाकाव्य में भविष्यत् काल की क्रियायें देखने को मिली। श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वादश स्कंद में कलिकाल की भविष्यवाणी है। अब तक वही हुआ, जो लिखा है। आगे भी वही होता जायेगा, बुद्धावतार व कल्क्यावतार में से एक (बुद्धावतार) आज से ढाई हजार साल पहले हो चुका है, जबकि दूसरा (कल्कि-अवतार) अपने नियत समय पर होगा। 18 पुराणों में एक ‘‘भविष्य पुराण’’ भी है। जो कहा या लिखा गया वह सच कैसे होता है? इस जिज्ञासा के चलते हमें विज्ञान की दृष्टि से देखना होगा। 
यहां महाभारत का वह प्रसंग दृष्टव्य है, जहां गांधारी के दृष्टि मात्र से दुर्योधन का शरीर बज्र का हो गया मात्र उस स्थान को छोड़कर जिसे लज्जावश दुर्याेधन ने ढांक दिया था। सांख्यशास्त्र के प्रणेता कपिल नेत्र मूंद कर तपश्चर्या में थे, राजा सगर के पुत्रों के उत्पात से आंखें खुलते ही सब जलकर भस्म हो गये। विज्ञान कहता है, ‘‘ऊर्जा संचय करनी चाहिए। मितव्ययता ही संचय का चार्जर यंत्र है।’’
हर प्राणी के मस्तिष्क रूपी हार्डडिस्क की क्षमता अलग-अलग होती है, उसमें ‘सत्य’ भंडार स्मृतिपटल की क्षमता के अनुसार होता है। जो अतिभाषी होता है, वह हमेशा झूठ बोलता है, जबकि मितभाषी जो कहता है, वह सच होता है। सत्य के लिए मितभाषी होना चाहिए। उसी तरह चकाचैंध में अपनी रोशनी रूपी नेत्रों को उलझाने से तेजस्विता संभव नहीं। गांधारी ने आंखों में पट्टी बांध रखी थी, लिहाजा इतनी ऊर्जा संचित हो चुकी थी जिसके दृष्टिपात ने दुर्योधन की देह को बज्र बना दिया। गीता, वेदांत व ब्रह्मसूत्र (प्रस्थान-त्रयी) का सार यह है- ‘‘अनासक्त भावातीत तपश्चर्या से जो सन्तत्व प्रकट होता है वही प्रतापी होता हैं। दीर्घकाल तक एकांतवास, मौन धारण करना और नेत्र बंदकर अन्तर्मुखी होकर आत्मतत्व में लीन रहना ही सत् में समाहित साधक संत होता है।’’
समझा जाता है कि एकांतवासी, मौनी ‘‘शोभन सरकार’’ का कथन सच होगा, क्योंकि वे सही मायने में संत हैं। इसका प्रमाण यही है कि डौंड़िया खेड़ा में चिन्हित स्थानों पर स्वर्ण-भंडार होने की पुष्टि भूगर्भ विज्ञान संयंत्रों द्वारा की गई। 
-देवेश शास्त्री

== संकल्प का अभाव क्यों? ==

आज हम विकल्पों में उलझकर संकल्प-शक्ति से दूर जा चुके हैं, संकल्प वह अजस्र ऊर्जा संपन्न साधना है, जो प्रत्येक ‘कल्पना’ को साकार बना सकता है। संकल्प से दूरी का मुख्य कारण वैकल्पिक जगत रूपी ‘मायाजाल’ में चित्त का उलझाव।
राष्ट्रपिता बापू ने ‘रामराज्य’ की कल्पना की, वे संकल्पित भाव से उस पथ पर आगे बढ़े, कदाचारी ब्रिटिश हुकूमत से आजाद होना, उसी संकल्प शक्ति का परिणाम था। रामराज्य से तात्पर्य सुशासन से है, ‘‘नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लक्षन हीना।। सब नर करहि परस्पर प्रीती। चलहि सुधर्म निरत सब नीती।’’ बैसे तो तुलसीबाबा ने रामराज्य का विस्तार से वर्णन किया मगर ये चैपाई यदि हमारा ‘संकल्प’ बन जायें तो सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना, कहीं भी गरीबी नहीं। गरीबी ही ‘विश्वगुरु भारत’ की सबसे बड़ी कमजोरी है। जिसका कारण है अशिक्षा-‘नहिं कोउ अबुध न लक्षन हीना’ सभी शिक्षित और सद्गुणों से युक्त हों। ये हमें सौहार्द से प्राप्त होगा, वैमनस्यता से शिक्षा व सदगुण नहीं आ सकते-‘सब नर करहि परस्पर प्रीती’ पारस्परिक सौहार्द्र निरन्तर धर्म और नीति से ही संभव हैं-‘चलहि सुधर्म निरत सब नीती।’
धर्म का अर्थ हिन्दू-इस्लाम-ईसाई- जैन-बौद्ध-पारसी आदि से नहीं। नैतिक मर्यादा की लक्ष्मण रेखा में कर्तव्य परायणता अर्थात सदाचार। आचरण ही धर्म है ‘आचारः परमो धर्मः, सत् को श्रेष्ठ धर्म कहा गया है ‘धर्म न दूसर सत्य समाना’ सत् और आचरण रूपी धर्म का संगम (सन्धि) है सदाचार। जिसका उद्गम बताया गया है-परहित। ‘‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई।’’
जनकल्याण की दिशा में संकल्पित होकर ‘सदाचार’ हमें रामराज्य स्थापित करने के बापू की कल्पना को साकार किया जा सकता। बापू का संदेश ‘जो परिवर्तन लाना चाहते हो स्वयं उसका हिस्सा बनो अर्थात् उसे धारण करो’ ऐसा संकल्प है, जिसके बूते पर स्वयं सत्य-अहिंसा को धारण करके बापू ने 90 वर्ष जले ‘‘महाभारत’’ (स्वतंत्रता संग्राम) का परिणाम स्वरूप स्वाधीनता दिलाई। कल्पना थी रामराज्य लाने की। आज उनके अनुयायी ‘रावणराज्य’ कायम किये हंै। 
‘रावणराज्य’ यानी लूटमार, अनाचार अत्याचार, व्यभिचारादि कदाचार का बोलबाला। हम विकल्प के मकड़जाल में उलझे हैं, लगातार सत्ता परिवर्तन करते हुए कदाचार की गिरफ्त में हैं। क्योंकि संकल्प का अभाव है। इस वक्त जो भी क्रियाकलाप सामने दिखाई दे रहे हैं, स्वयं हमारे द्वारा बुना गया वैकल्पिक मकड़जाल है। मकड़ी अपनी लार से जाल पूरती है, और फिर उसी मंे फंसकर जान गवां देती है, लेकिन संकल्प शक्ति के बूते पर कुछेक मकड़ीं अपनी लार से बुने गये जाल को पुनः स्वयं में समाहित कर लेतीं है। यही ईश्वरीय सत्ता का वेदान्तगत संकल्प है। 
वेदवाक्य ‘‘सत्यमेव जयते’’ को ‘दर्शन’ मानकर उसका पहल संकल्प पर आधारित है। कोई भी व्यक्ति किसी पद पर आरूढ़ होता है, तब वह सत्यनिष्ठा की शपथ लेता है। और उसका रत्ती भर भी अनुपालन नहीं करता। 
‘‘शपथ और संकल्प’’ में अंतर है? ‘हां’ है। शपथ और औपचारिकता है, जो वाणी (जुवान) तक सीमित है, जबकि संकल्प अंतरात्मा की वह धारणा है, जो अष्टांगयोग का छटवां अंग है। जिसकी अगली सीढ़ी ‘ध्यान’ है। संकल्प रूपी धारणा हमें कभी घ्यानभंग नहीं देती। 
बैसे व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्षरत करोड़ों लोगों से जब ‘‘संकल्प’’ की बात कही जाये कि ‘‘मैं किसी भी काम के लिए रिश्वत नहीं दूंगा, और न लूंगा। मैं किसी की भी सिफारिश नहीं मानूंगा और न सिफारिश करूंगा। कर्तव्यपरायणता ही धर्म है, लिहाजा ‘‘कामचोरी’’ नहीं करूंगा। किसी के दबाव में गलत काम नहीं करुंगा, और न गलत काम के लिए किसी को विवश करूंगा। अपने संचित कर्मों के फल स्वरूप प्रारब्ध को स्वीकार करते हुए संतुष्ट रहूंगा।’’ तो कितने लोग संकल्प लेंगे? एक भी प्रतिशत नहीं, हां, कहीं लाखों में एकाध ही संकल्प रूपी धारणा पर घ्यान केन्द्रित करेंगे।
आखिर ऐसी क्यों? यदि सवा अरब की आबादी वाला भारतवर्ष दृढ़ संकल्पित हो जाये तो बापू के रामराज्य यानी ‘‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’’ की संकल्पना साकार हो जायेगी। 
‘‘रिश्वत लेना पाप है
पर देना अभिशाप।
लेना-देना बंद हो,
तभी मिटे संताप।।’’
जब हर कोई स्वार्थ और महत्वाकांक्षा त्यागकर सत्यनिष्ठा के संकल्प पर केंद्रित होगा। तो लूटमार करने वाले बाल्मीकि और अंगुलिमाल सरीखे कदाचारी लोग भी ‘‘महर्षि व भिक्षु’’ बन जायेंगे। आयें असीम ऊर्जास्पद संकल्पशक्ति जगायें


== कार्य ही पूजा है! ==
वर्क इज वर्शिप, भरतीय षड्दर्शन, प्रस्थानत्रय (गीता, वेदान्त, ब्रह्मसूत्र) आदि सभी धर्मग्रंथ कर्म सिद्धांत को प्रतिपादित करते हैं। इसी आधार पर कार्य को पूजा की संज्ञा दी गई है। कृ धातु में यत् प्रत्यय के साथ शब्द बना कार्य। कार्य से तात्पर्य है, करने योग्य। यथा पाठ्य-पढ़ने योग्य, पूज्य- पूजा के योग्य, दृश्य- देखने के योग्य। 
करने के योग्य जो है, वही कार्य अर्थात् कर्म है। जो करने योग्य नहीं है, और हो जाये वह अकर्म और विकार (दोष) युक्त विकर्म होता है। जबकि निषिद्ध कर्म कुकर्म की श्रेणी में आते हैं। अकर्म, विकर्म, कुकर्म (दुष्कर्म) आदि पूजा नहीं हैं। कर्म पूजा है किन्तु कर्म की कसौटी बड़ी खरी है, जीव द्वारा किया जाने वाले प्रत्येक कार्य को पूजा मान लेना अनिष्टकारी है। जब सत् ही ईश्वर है तो सत् की सत्ता का गुणगान यानी पूजा सत् से समाहित कर्म हुआ अर्थात् सत्कर्म ही कार्य है यानी करने योग्य है। वही पूजा है।
आदि शंकराचार्य ने परापूजा स्तोत्र में लिखा है- अखंड, सच्चिदानंद, निर्विकल्प अद्वितीयभाव की पूजा कैसे हो? जो पूर्ण है उसका आवाहन? जो सर्वाधार है उसे आसन देना? स्वच्छ को अघ्र्य, शुद्ध को आचमन, निर्मल को स्नान? विश्वोदर यानी जिसके उदर में सारा ब्रह्मांड है उसे वस्त्र? अगोत्र को जनेऊ? निर्लेप को गंध? निर्वासित को पुष्प? निराकार को आभूषण? निरंजन को धूप? सर्वसाक्षी को दीप? स्वयंप्रकाशवान् को आरती? अनंत की परिक्रमा? जिसके रहस्य को वेद भी नहीं बता सके नेति नेति ही कह पाये उसकी स्तुति? अन्तर्बहि सर्वत्र स्थित का अवसान? इस तरह सत् पर केंद्रित प्रत्येक क्रिया कलाप ही परापूजा है। ‘‘आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहे। पूजा ते विविधोपभोग रचना निद्रा समाधिस्थितिः।। संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो। यद्यत्कर्मं करोमि तत्तदखिलं शंभो! तवाराधनम्।।’’ शरीर रूपी मंदिर में परमात्मतत्व तू शिव ही आत्मा, प्रकृति/माया स्वरूपिणी पार्वती बुद्धि, सहयोगीगण प्राण है विभिन्न भोग उपयोग रचना यानी क्रिया ही पूजा तथा समाधि की स्थिति नींद है। पैरो का संचार यानी चलना ही परिक्रमा और हर प्रकार की ध्वनि यानी वाणी स्तुतिगान है। हे प्रभु! इस तरह मैरे द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कर्म आपकी आराधना है। - देवेश शास्त्री

== सकारात्मक दिशा में उठने लगी ‘भाव-चक्र’ सुनामी ==

सामवेद में उल्लेख है कि भाव- प्रवाह उसी तरह अपना सर्किल पूरा करता है, जिस तरह विद्युत- प्रवाह। भाव प्रवाह से उत्पन्न होता है गायन। गायन में है मोम को पिघलाने, पानी में आग लगाने और बादल बुलाकर जलवृष्टि करने की अपरिमित शक्ति। 
विद्युत (ऊर्जा) प्रवाह की भांति एक बार फिर भाव प्रवाह अपना सर्किल पूरा करते हुए ऐसी भावात्मक ‘‘सुनामी’’ ला रहा है, जो जन-मन के ‘व्यवस्था परिवर्तन लक्ष्य’ लक्ष्य पर ले जायेगा। 
आखिर भाव प्रवाह है क्या? भाव यानी वैचारिक तरंग। यहां यह दृष्टांत प्रासंगिक है- एक राजा ने सार्वजनिक आदेश दिया कि समूची प्रजा रात में अमुक तालाब में एक-एक कलश दूध डालेगा, इस तरह पवित्र ‘दुग्ध-सरोवर’ तैयार हो जायेगा। मगर सुबह देखा तो सूखा तालाब लबालब तो था मगर दूध से नहीं, पानी से। ऐसा क्यांे? यही भाव प्रभाव है। एक ने सोचा -‘‘जब सब लोग दूध डालेंगे तो मेरा एक कलश पानी पता ही नही चलेगा।’’ यह विचार (भाव) किसी एक का नहीं, समूची प्रजा का बना। यानी भाव प्रवाह ने अपना सर्किल पूरा किया। पूर्णिमा की उज्ज्वल चांदनी रात में पानी का अर्पण भी सफेदी से पूरित प्र्रतीत हो रहा था, लिहाजा प्रत्येक व्यक्ति को यही लगा कि मेरे अलावा सभी दूध डाल रहे हैं।इस प्रसंग को आज के हालात में भावात्मक संजीदगी के जोड़ और भाव प्रवाह की उठती ‘‘सुनामी’’ की अनुभूति करें!
भ्रष्टाचार से आहत जन मानस आक्रोशित है, लंबे अर्से से व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्षात्मक भाव बनते रहे हैं, भाव प्रवाह शुरू होता रहा मगर अपना सर्किल पूरा न कर सका। एक बार फिर उठा है, आशावादी दृष्टि से यह भाव प्रवाह अपना सर्किल पूरा करेगा। व्यवस्था परिवर्तन की सुनामी के लिए तथाकथित राजनैतिक विकल्प ही इस भाव- प्रवाह का उद्गम बिन्दु होगा।
अरविन्द केजरीवाल ने दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ राजनैतिक विकल्प देने की शुरूआत जन सामान्य में मौजूदा सियासी जमात के गुप्त भावात्मक राज (मनोवृत्ति) को उजागर करना शुरू किया। सत्ताधारी संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रावर्ट वाड्रा की मनोदशा को बेपर्दा किया। जाकिर हुसैन ट्रस्ट को प्रतीक बनाकर ट्रस्टाधीशों की मनोवृत्ति से पर्दा उठाने की शुरूआत की, इसके साथ ही मुख्य विपक्षी भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी के गोरखधंधे को उजागर किया।
इन तीन बिन्दुओं पर विद्युत प्रवाह की तरह भाव-प्रवाह तीब्र गति पकड़ने लगा। प्रथम बिन्दु वाड्रा पर वरिष्ठ सपा नेता आजम खां ने एक कदम आगे बढ़कर कोमनबेल्थ खेल घोटाले में भी वाड्रा को घसीट दिया। ये क्या सहयोगी दल का नेता ही केंद्र सुप्रीमो की पोल खोलने लगा? यही है सर्किल पर गतिशील भाव-प्रवाह। इसी क्रम में दूसरी ओर हरियाणा के कद्दावर नेता चैटाला ने युवराज राहुल के कारनामे का खुलाशा कर दिया। 
दूसरे बिन्दु जाकिर हुसैन ट्रस्ट के बैनर से कानूनमंत्री नवाब खुर्शीद के गोरखधंधे पर समूचा विपक्ष ही नहीं, सहयोगी सपा के लीडर आजम खां भी बोल पड़े। सत्तापक्ष की बोलती बंद देख कानूनमंत्री की अंतरात्मा की आवाज इस रक्तिम अंदाज में प्रस्फुटित हुई। ये सब कुछ सबके सामने है। 
इस तरह जो भाव-प्रवाह अपने सर्किल आगे बढ़ता जायेगा। स्वयं सियासी जमात एक दूसरे को निर्वस्त्र करती जायेगी। प्रभावित जनमानस अपने वोट के तथाकथित दुरुपयोग पर प्रायश्चित करेगी। ‘अरे, लालच में पड़कर मैने लुटेरे को अपना वोट दिया।’’ यह भाव अपना सर्किल पूरा करेगा, पूरा देश भावात्मक साम्यता से ‘‘सुनामी’’ प्रकट होगी- सत्यनिष्ट ईमानदार उम्मीदवार को वोट देने में अपना व जनतंत्र का हित मानेगी। तब भी भाव-प्रवाह ही सक्रिय होगा, फलस्वरूप सभी राजनैतिक दल प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया बदलकर आन्तरिक परिशोधनात्मक सर्किल पर दौड़ेंगे। एक दूसरे के मुकाबले भले, ईमानदार व सच्चरित्र प्रत्याशियों को जनता की अदालत में पेश करेंगे। उनमें से चयन करते हुए अच्छे, ठीक, उत्तम व अत्युत्तम की कोटि निर्धारित कर अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। संसदीय जनतंत्र प्रदूषण मुक्त होगी। 
सवाल उठता है कि क्या यह संभव है? हां, बशर्ते चक्रवात की तरह जो भाव-प्रवाह का तूफान उठ रहा वह शाट-सर्किट की भेंट न चढ़ेे और अपना सर्किल पूरा करते हुए सियासी-समुद्र में भयावह लहरें उठाने वाली ‘सुनामी’ बन जाये।
- देवेश शास्त्री

== हृदय परिवर्तन की अनोखी ‘ज्योति’ का प्रस्फुटन इटावा से ==

एलेन ओक्टेवियन ह्यूम और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस :-------------------- देवेश शास्त्री
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आज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थिति की तुलना यदि अपने मित्र दीपचन्द्र त्रिपाठी ‘निर्बल’ के इस दोहे के आधार पर बहुसंख्यक समुदाय के हालात से करें तो समुचित होगा- ‘‘सहमे सहमे से रहते हैं, हिन्दू हिन्दुस्तान में। ईश्वर जाने कैसे रहते होंगे पाकिस्तान में।।’’ हां, आज जहां एक ओर हिन्दू सहमा हुआ, वहीं दूसरी ओर वह कांग्रेस जिसे खड़ा होने में जितना समय लगा, उतना ही पतन में। जिसकी कभी तूती बोलती थी, आज लोकसभा में प्रतिपक्ष दल होने की भी हैसियत नहीं जुटा पा रही है, निसंदेह यह ‘कर्मगति’ है। उसी तरह तथाकथित हिन्दुत्व की झंडावरदार पार्टी के प्रभुत्व में हिन्दू अपने बिछुड़े साथियों को घर में वापस लाने के प्रयास को भी आपराधिक श्रेणी में गिना जा रहा है। तब लगता है- ईश्वर जाने कैसे रहते होंगे पाकिस्तान में?
आज 28 दिसम्बर है, 129 वर्ष पहले यानी 1885 को आज ही के दिन आतताई ब्रिटिश हुकूमत के एक अफसर ने भारत की आजादी और स्वराज के लिए एक ‘प्लेटफार्म’ दिया, जो है ‘‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस।’’ अंग्रेज अफसर का आखिर हृदय परिवर्तन कैसे हुआ, संस्कृतनिष्ठा और इष्टसाध्य इटावा की अदृश्य ज्योति से! 
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1829 को इंग्लैंड में जन्में एलेन ओक्टेवियन ह्यूम ब्रिटिश कालीन भारत में सिविल सेवा के अधिकारी एवं राजनैतिक सुधारक थे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक थे। इसी पार्टी ने भारत की स्वतंत्रता के लिये मुख्य रूप से संघर्ष किया और अधिकांश संघर्षों का नेतृत्व किया।
 ए. ओ. ह्यूम ने भारत में भिन्न-भिन्न पदों पर काम किया इनमें ‘इटावा का कलक्टर पद’ महत्वपूर्ण है, यही हुए हृदय परिवर्तन ने भारतवर्ष की स्वतंत्रता की नींव रखी। ‘‘ब्रिटिश हुकूमत के प्रति बफादार व समर्पित हिन्दुस्तानियों का संगठन खड़ा करने की मानसिकता ने इंडियन नेशनल कांग्रेस का खाका भले ही ए. ओ. ह्यूम के दिमाग में खिंचा था, मगर उस वक्त राष्ट्रभक्त हिन्दुस्तानियों के विद्रोही तेवर के आगे ए. ओ. ह्यूम को मुंह की खानी पड़ी, और जान बचाकर महिला के लिवास में जिलामुख्यालय इटावा छोड़कर यमुनापार भागना पड़ा। इस घटना ने कलक्टर का हृदय परिवर्तन कर दिया और दिमाग में ‘ब्रिटिश हुकूमत के प्रति बफादार व समर्पित हिन्दुस्तानियों का संगठन खड़ा करने खाका स्वतः बदल गया। यही है  इष्टसाध्य इटावा की अदृश्य ज्योति का कमाल।’’ 
यहां उस अदृश्य ज्योति का भी उल्लेख प्रासंगिक है, जिसे गीताप्रेस गोरखपुर की पुस्तक एक लोटा पानी में पढ़ा जा सकता है। ब्रिटिश हुकूमत के ही भरथना के डिप्टी कलक्टर सर सप्रू अपने सेवक के एक दृष्टान्त से विरक्त होकर सिद्ध सन्त खटखटा बाबा हो गये, बाबा की चमत्कारी सिद्धि से प्रभावित होकर ब्रिटिश हुकूमत के ही जिला जज, मैनपुरी भी नौकरी छोड़कर खटखटा बाबा के शिष्य बन गये।
इटावा में रहते हुए कलक्टर ए. ओ. ह्यूम कालेज, कोतवाली, जिला परिषद भवन सहित कई इमारतें, अनाज मंडी (जिसे ह्यूमगंज नाम दिया गया) व सड़के बनवाई। किन्तु कदाचार से पूरी तरह विरक्त हो चुके ए. ओ. ह्यूम ने 1882 में अवकाश ग्रहण किया। 
वरिष्ठ अधिवक्ता स्व. पं. कृष्ण गोपाल चैधरी द्वारा लिखी गई पुस्तक से तमाम रहस्योद्घाटन होते हंै जो मूलतः कलक्टर ह्यूम व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर केन्द्रित है। इंग्लैंड में ह्यूम साहब ने अंग्रेजों को यह बताया कि भारतवासी अब इस योग्य हैं कि वे अपने देश का प्रबंध स्वयं कर सकते हैं। उनको अंग्रेजों की भाँति सब प्रकार के अधिकार प्राप्त होने चाहिए और सरकारी नौकरियों में भी समानता होना आवश्यक है। जब तक ऐसा न होगा, वे चैन से न बैठेंगे।
ह्यूम ने सन् 1885 में, ब्रिटिश शासन की अनुमति से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन किया था। कांग्रेस एक राजनैतिक पार्टी थी और इसका उद्देश्य था अंग्रेजी शासन व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी दिलाना। ब्रिटिश पार्लियामेंट में विरोधी पार्टी की हैसियत से काम करना। अब प्रश्न यह उठता है कि ह्यूम साहब, जो कि सिविल सर्विस से अवकाश प्राप्त अफसर थे, को भारतीयों के राजनैतिक हित की चिन्ता क्यों और कैसे जाग गई?
सन् 1885 से पहले अंग्रेज अपनी शासन व्यवस्था में भारतीयों का जरा भी दखलअंदाजी पसंद नहीं करते थे। तो फिर एक बार फिर प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों दी ब्रिटिश शासन ने एक भारतीय राजनैतिक पार्टी बनाने की अनुमति? यदि उपरोक्त दोनों प्रश्नों का उत्तर खोजें तो स्पष्ट हो जाता है कि भारतीयों को अपनी राजनीति में स्थान देना अंग्रेजों की मजबूरी बन गई थी। सन् 1857 की क्रान्ति ने अंग्रेजों की आँखें खोल दी थी। अपने ऊपर आए इतनी बड़ी आफत का विश्लेषण करने पर उन्हें समझ में आया कि यह गुलामी से क्षुब्ध जनता का बढ़ता हुआ आक्रोश ही था जो आफत बन कर उन पर टूटा था। यह ठीक उसी प्रकार था जैसे कि किसी गुब्बारे का अधिक हवा भरे जाने के कारण फूट जाना।
समझ में आ जाने पर अंग्रेजों ने इस आफत से बचाव के लिए तरीका निकाला और वह तरीका था सेफ्टी वाल्व्ह का। जैसे प्रेसर कूकर में प्रेसर बढ़ जाने पर सेफ्टी वाल्व्ह के रास्ते निकल जाता है और कूकर को हानि नहीं होती वैसे ही गुलाम भारतीयों के आक्रोश को सेफ्टी वाल्व्ह के रास्ते बाहर निकालने का सेफ्टी वाल्व्ह बनाया अंग्रेजों ने कांग्रेस के रूप में। अंग्रेजों ने सोचा कि गुलाम भारतीयों के इस आक्रोश को कम करने के लिए उनकी बातों को शासन समक्ष रखने देने में ही भलाई है। 
इसी क्रम में कांग्रेस की स्थापना के ठीक 50वें वर्ष 1935 में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने ‘‘धारा सभा के गठन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की आधार शिला रखनी पड़ी, जिसमें कांग्रेस प्रत्याशी को सीधे ब्रिटिश हुकूमत के प्रतिनिधि प्रत्याशी से चुनाव लड़ना होता था। 1937 के पहले धारासभा चुनाव में इटावा-भरथना सीट से कांग्रेस प्रत्याशी चै. बुद्धू सिंह ने ब्रिटिश प्रतिनिधि उम्मीदवार लखना नरेश नरसिंह रावको पछाड़ा। 
ह्यूम के कांग्रेस गठन के प्रस्ताव पर ब्रिटिश पार्लियामेंट की मुहर लगने के सन्दर्भ में कुछ विचारकों का मत यह भी है - ‘‘सीधी सी बात है कि यदि किसी की बात को कोई सुने ही नहीं तो उसका आक्रोश बढ़ते जाता है किन्तु उसकी बात को सिर्फ यदि सुन लिया जाए तो उसका आधा आक्रोश यूँ ही कम हो जाता है। यही सोचकर ब्रिटिश शासन ने भारतीयों की समस्याओं को शासन तक पहुँचने देने का निश्चय किया। और इसके लिए उन्हें भारतीयों को एक पार्टी बना कर राजनैतिक अधिकार देना जरूरी था। एक ऐसी संस्था का होना जरूरी था जो कि ब्रिटिश पार्लियामेंट में भारतीयों का पक्ष रख सके। याने कि भारतीयों की एक राजनैतिक पार्टी बनाना अंग्रेजों की मजबूरी थी। किसी भारतीय को एक राजनैतिक पार्टी का गठन करने का गौरव भी नहीं देना चाहते थे वे अंग्रेज। और इसीलिए बड़े ही चालाकी के साथ उन्होंने ह्यूम साहब को सिखा पढ़ा कर भेज दिया भारतीयों के पास एक राजनैतिक पार्टी बनाने के लिए। इसका एक बड़ा फायदा उन्हें यह भी मिला कि एक अंग्रेज हम भारतीयों के नजर में महान बन गया, हम भारतीय स्वयं को अंग्रेजों का एहसानमंद भी समझने लगे। ये था अंग्रेजों का एक तीर से दो शिकार!’’ 
ब्रिटिश सरकार के असंतोष जनक कार्यों के फलस्वरूप भारत में अद्भुत जाग्रति उत्पन्न हो गई और वे अपने को संघटित करने लगे। इस कार्य में ह्यूम साहब से भारतीयों बड़ी प्रेरणा मिली। 1884 के अंतिम भाग में सुरेंद्रनाथ बनर्जी तथा व्योमेशचंद्र बनर्जी और ह्यूम साहब के प्रयत्न से इंडियन नेशनल यूनियम का संघटन किया गया।
27 दिसम्बर 1885 को भारत के भिन्न-भिन्न भागों से भारतीय नेता बंबई पहुँचे और दूसरे दिन 28 दिसम्बर 1885 को 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति में बाम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में सम्मेलन आरंभ हुआ। इस सम्मेलन का सारा प्रबंध ह्यूम ने किया था। इस प्रथम सम्मेलन के सभापति व्योमेशचंद्र बनर्जी बनाए गए थे जो बड़े योग्य तथा प्रतिष्ठित बंगाली क्रिश्चियन वकील थे। यह सम्मेलन ‘‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
1907 में काँग्रेस में दो दल बन चुके थे - गरम दल एवं नरम दल। गरम दल का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं बिपिन चंद्र पाल (जिन्हें लाल-बाल-पाल भी कहा जाता है) कर रहे थे। जबकि नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता एवं दादा भाई नौरोजी कर रहे थे। 
गरम दल पूर्ण स्वराज की माँग कर रहा था परन्तु नरम दल ब्रिटिश राज में स्वशासन चाहता था। प्रथम विश्व युद्ध के छिड़ने के बाद सन् 1916 की लखनऊ बैठक में दोनों दल फिर एक हो गये और होम रूल आंदोलन की शुरुआत हुई जिसके तहत ब्रिटिश राज में भारत के लिये अधिराज्य अवस्था (डामिनियन स्टेटस) की माँग की गयी।
परन्तु 1915 में गाँधी जी के भारत आगमन के साथ काँग्रेस में बहुत बड़ा बदलाव आया। चम्पारन एवं खेड़ा में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जन समर्थन से अपनी पहली सफलता मिली। 1919 में जालियाँवाला बाग हत्याकांड के पश्चात गान्धी जी काँग्रेस के महासचिव बने। उनके मार्गदर्शन में काँग्रेस कुलीन वर्गीय संस्था से बदलकर एक जनसमुदाय संस्था बन गयी। तत्पश्चात् राष्ट्रीय नेताओं की एक नयी पीढ़ी आयी जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई एवं सुभाष चंद्र बोस आदि शामिल थे। गान्धीजी के नेतृत्व में प्रदेश काँग्रेस कमेटियों का निर्माण हुआ, काँग्रेस में सभी पदों के लिये चुनाव की शुरुआत हुई, सभी भेदभाव हटाये गये एवं कार्यवाहियों के लिये भारतीय भाषाओं का प्रयोग शुरू हुआ। काँग्रेस ने कई प्रान्तों में सामाजिक समस्याओं को हटाने के प्रयत्न किये जिनमें छुआछूत, पर्दाप्रथा एवं मद्यपान आदि शामिल थे।

== क्या मै संस्कृतनिष्ठ हूं? ==
श्रावणी पूर्णिमा ‘‘संस्कृत दिवस’’ के रूप में मनाई जाती है। आखिर क्यों? इस प्रश्न ने कई बार मुझे झकझोरा, आखिर हम लोग (कथित रूप से संस्कृतनिष्ठ) संस्कृत दिवस क्यों नहीं मनाते? जब हम नहीं मनायेंगे तो कौन मनायेगा? एक प्रश्न के झकझोरने से जब दो प्रश्न खड़े हुए, तो अपने अंदर झांकने का प्रयास किया, तो फिर नया प्रश्न खड़ा हो गया कि क्या वास्तव में हम संस्कृत दिवस मनाने की अर्हता रखते हैं? यानी संस्कृतनिष्ठा ही यदि अर्हता है, तो क्या हम अर्ह है? मतलब ये हुआ कि हम स्वयं के संस्कृतनिष्ठ होने को पहले सिद्ध करें, तब संस्कृत दिवस मनाये। इसी ऊहापोह में जो प्रश्न खड़ा था वह महत्वपूर्ण और निर्णायक है- आखिर संस्कृतनिष्ठ की परिभाषा क्या है?
1. जो अहिर्निश संस्कृत की उपेक्षा से चिन्तित रहे वह संस्कृतनिष्ठ है?
2. जो सदैव लोकव्यवहार में मात्र संस्कृत भाषा का ही प्रयोग करे वह संस्कृतनिष्ठ है?
3. जिसकी क्षेत्रीय बोली संस्कृतनिष्ठ हो, और सुनने वाले को अपनी बात समझाने के लिए अंग्रेजी का सहारा लेना पड़े वह संस्कृतनिष्ठ है?
4. जो पौरोहित्य कर्म करता है वह संस्कृतनिष्ठ है?
5. जो निरंतर संस्कृत वांग्मय का स्वाध्याय करता है वह संस्कृतनिष्ठ है?
6. जो श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करता है और उसे गीता के तमाम अध्याय कंठस्थ है वह संस्कृतनिष्ठ है?
7. जो व्यास पीठ पर आसीन होकर भगवद्कथामृत का पान कराता है वह संस्कृतनिष्ठ है?
8. जो भगवद्भक्ति से संस्कृत में विविध स्तोत्र पाठ करता है वह संस्कृतनिष्ठ है?
9. जिसने संस्कृत माध्यम से ही शिक्षा ग्रहण की है वह संस्कृतनिष्ठ है?
10. जो संस्कृत में स्नातक, परास्नातक, शिक्षाशास्त्री अथवा विद्यावाचस्पति (पीएचडी) है, और प्राथमिक, माध्यमिक, अथवा उच्च शिक्षा संस्थान में संस्कृत शिक्षण करता है वह संस्कृतनिष्ठ है?
11. जो अपनी कर्तव्यपरायणता यानी उत्तरदायित्व के प्रति उदासीन होकर संस्कृत हित में संलग्न है वह संस्कृतनिष्ठ है?
12. जो भावी पीढ़ी को संस्कारित करने के उपक्रम में लगा है वह संस्कृतनिष्ठ है?
13. जो संस्कृतोत्थान के नाम पर दान-अनुदान के फेर में पड़ा रहता है वह संस्कृतनिष्ठ है?
14. जो साधुवेश में रहकर ज्ञान-वैराग्य की प्रतिमूर्ति है, संस्कृत में व्याख्यान देकर धर्मभीरुता जाग्रत कर धनार्जन करता है वह संस्कृतनिष्ठ है?
15. जो संस्कृत में क्षणिक संभाषण कर चमत्कारिक सिद्धि प्रामाणित करता है वह संस्कृतनिष्ठ है? 
आदि तमाम प्रश्न संस्कृतनिष्ठ की परिभाषा में खड़े हो गये, जो पूरी तरह स्वयं के कथित तौर संस्कृतनिष्ठ होने के ‘‘दंभपूर्ण भ्रम’’ को परिभाषित करने के इर्दगिर्द ही अदृश्य चक्र की तरह घूम रहे थे, क्योंकि अब तक उक्त प्रत्येक प्रश्न पर ‘‘हां’’ (यस) करता चला आ रहा था। तभी तो कहता रहा कि ‘‘मेरे जैसा संस्कृतनिष्ठ कोई नहीं है।’’ श्रावणी पूर्णिमा को संस्कृत दिवस मनाने के लिए अन्तर्मुखी होकर अन्तस्थ माहेश्वर-तेज का चिन्तन करता रहा। काफी विचार-मंथन (माथापच्ची) के बाद जो नवनीत (मक्खन) निकला, वह सूत्रवत है- ‘‘संस्कृतनिष्ठा से जाग्रत होती है सत्यनिष्ठा और सत्यनिष्ठा ही ब्रह्मनिष्ठा।’’ अर्थात् असंस्कृतनिष्ठ कभी सत्यनिष्ठ नहीं हो सकता। सत्यनिष्ठ होने के लिए संस्कृतनिष्ठ होना आवश्यक है, वही ब्रह्मनिष्ठ है। 
यहां संस्कृत, सत्य और ब्रह्म तीन शब्दों के साथ जुड़ा है एक मात्र शब्द ‘‘निष्ठा’’। निष्ठा का विज्ञान (तत्वज्ञान) जानना ही अति विशिष्ट है। निष्ठा को श्रद्धाभाव का पर्याय कहा जाता है, जिसे भक्तिभाव का उद्गम नानते है। यानी संस्कृत के प्रति श्रद्धाजन्य प्रेम स्वरूपा भक्ति रखने वाला संस्कृतनिष्ठ, सत्य के प्रति श्रद्धाजन्य भक्तिभाव रखने वाला सत्यनिष्ठ और ब्रह्म (ईश्वर) के प्रति श्रद्धास्पद भक्तिभाव रखने वाला ब्रह्मनिष्ठ हुआ। ये बातें भावार्थ हो सकती हैं किन्तु निष्ठा शब्द का तत्वार्थ नहीं। निष्ठा क्रियात्मक है तो कर्ता हुआ निष्ठुर और विशेषण हुआ नैष्ठुर्य (निष्ठुरता)। निष्ठुर ही निष्ठावान है यानी संस्कृत के प्रति निष्ठुरता ही संस्कृतनिष्ठा हुई और सत्य के प्रति निष्ठुरता सत्यनिष्ठा। निष्ठा के इस तत्वार्थ ने निश्चित रूप से उलट-पुलट कर दिया। नहीं, वास्तव में निष्ठा का तत्वार्थ है ‘‘सिद्धावस्था’’ अर्थात् एकात्म होना यानी मन, वाणी और कर्म से परे संस्कृतात्म (स्वयं यानी आत्मा को संस्कृतमय) होना ही संस्कृतनिष्ठा है। इसी क्रम में स्वयं को संस्कृतमय (संस्कृतात्म) करते ही, स्वयं सत्यात्म यानी सत्यमय हो जाना, स्वाभाविक परिवर्तन अनुभवगम्य है, वही आत्मा-परमात्मा के एकीभाव यानी अद्धैत की ‘‘सिद्धावस्था’’ है।
- देवेश शास्त्री 9456825210

== कोई नहीं जाता खाली हाथ ==
 
सब कुछ समेट के ले जाना पड़ता है

‘‘जो जस करहि सो तस फल चाखा।’’ यानी कर्मगति को ही प्रारब्ध कहा गया है। ‘‘राम कीन्ह चाहइ सोइ होई।’’ यानी परमात्मा जो चाहता है वही होता है। दोनों कथन विरोधाभासी प्रतीत हो रहे हैं लेकिन हैं नहीं। गीता मंे योगेश्वर कृष्ण कहते हैं- ‘‘कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्।’’ स्पष्ट है कि कर्मानुसार फल देना परमात्मा के अधीन है। दर्शनशास्त्र इसी कर्मसिद्धांत को परिभाषित करते है। अर्थात् हम स्वयं अपनी अगली योनि के नियंता हैं, कोई और नहीं। शरीर छोड़कर जीवात्मा अपने साथ वह सब कुछ ले जाता है, जो उसने सजोया है। ‘‘मुट्ठी बांधे आये जग में हाथ पसारे जायेगा।’’ मिथ्या मिथक है। मुट्ठी बांधे यानी सबकुछ अपने साथ ले जाना पड़़ता है।
आपने जो भौतिक वस्तुओं का संग्रह किया है, क्या वह तुम्हारे साथ जायेगा? इस प्रश्न का सहज में जवाब है ‘नहीं।’ लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो कहेंगे- हां, कोई खाली हाथ नहीं नहीं जाता। सब कुछ समेटकर जे जाना पड़ता है। कैसे? विद्वान कहते हैं कि पाप-पुण्य ही साथ जाता है, यानी सद्धर्म जन्य पुण्य और अधर्म जन्य पाप के आधार पर ही जन्म जन्मान्तर के प्रारब्ध का निर्धारण ईश्वर करता है। जब ईश्वर अंश जीव अविनाशी है, तो प्रत्यक्ष रूप से जीव ही अपना प्रारब्ध रच रहा है।
पाप-पुण्य उस ‘क्रेडिट कार्ड’ की तरह है, जो संचित भौतिक संपदा को जन्मान्तर में सहेजकर पहुंचाता है। भौतिक संपदा का उपार्जन धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय, सत्- असत्, नीति-अनीति से होता है, जिनका ‘क्रेडिट’ पुण्य और पाप हुआ। ‘परलोकात् भयम्’ ही युग युगान्तर सन्मार्गगामी काल खंड रहा। अन्याय, अधर्म और अनीति से डरते हुए लोग कह देते थे- हम बाल-बच्चेदार हैं। यानी परलोक का भय था, जो व्यवहार में हमें सन्मार्ग से विचलित नहीं होने देता था। 
पाप-पुण्य ही साथ जाने के सूत्र का रहस्य भौतिक सम्पदा साथ ले जाना है। उदाहरण के रूप में एक अतिविपन्न परिवार में उत्पन्न शिशु अपने पूर्वकृत कर्मों के पुण्य की क्रकडिट पर पढ़-लिखकर उच्चपद पा लेता है। हालात बदलते हंै, विपन्नता दूर हो जाती है। भौतिक संपदा चारों ओर घेर लेती है। यानी वह अपने पूर्वजन्म की ही संपदा को भोगने लगता है। 
दूसरी ओर एक अतिसंपन्न धनाढ्य व्यक्ति मरता है, लगता है वह अपनी भौतिक सम्पदा यहीं छोड़कर गया है, वह सन्तान के अपने पाप की क्रेडिट पर व्यसनागत प्रवृत्ति से नष्ट होती जाती है, और वह भुखमरी की स्थिति में पहंुच जाता है। यही तो संपदा के हस्तान्तरण की प्रक्रिया है। यहां यह सूक्ति प्रासंगिक है-‘‘पूत कपूत तो का धन संचय?’’
ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की दशा और प्रभाव ‘कर्म’ पर केन्द्रित है। अमुक का ‘‘राजयोग’’ है, देखते ही देखते वह पीएम या सीएम अथवा उच्चपदस्थ अधिकारी हो गया। राजवैभव आ गया, वह वैभव पूर्वजन्म के अर्जित पुण्य का प्रभाव था, जो वह अपने साथ लाया था। काफी समय उसने वैभव भोग किया और किसी सामाजिक, आर्थिक अथवा राजनैतिक अपराध में फंस गया, जेल जाना पड़ा। भौतिक संपदा दूर हो गई, जन सामान्य की दृष्टि से पतित हो गया। कहा- अनिष्ट ग्रह की कुदृष्टि का प्रभाव है। वास्तव में संचित पुण्य की पूंजी समाप्त होते ही संचित पाप का प्रभाव ही अनिष्ट ग्रह की कुदृष्टि के रूप में परिभाषित की गई।
यहां एक प्रसंग दृष्टव्य है- एक सेठ ऋणदाता के रूप मंे प्रख्यात थे, याचक जब चाहे अदा करे। यहां तक कि अगले जन्म में अदा करने की शर्त पर भी ऋण मिलता था। एक व्यक्ति आया और उसने दो लाख रुपये की याचना की और अगले जन्म में अदायगी का वायदा किया। धन मिल गया। वह व्यक्ति रकत लेकर रात में अपने मित्र के घर पर रुक गया। वहां रात में उसने दो बैलों के वार्तालाप को सुना- ‘मेरा कर्ज तो अदा हो गया और मैं मुक्त हो गया’ दूसरा बोला- ‘मेरे भी 300 रुपये शेष हैं मै भी जल्दी मुक्त हो जाऊंगा।’ सुबह हुई, पहला बैल फिसलकर गिरा और मर गया। जोड़ी टूट गई मित्र के धर लोग संवेदना व्यक्त करने आने लगे। किसी ने कहा-‘आपका एक बैल किस काम का, बेचोगे? हां, 300 रुपये दूं। लाओ। 300 रुपये देकर बैल लेकर वह चला कुछ दूर जाते ही वह भी गिर गया, मर गया। यह सब कुछ देखकर वह व्यक्ति सोचने लगा। अगले जन्म की अदायगी की शर्त पर लिये कर्ज के भुगतान के लिए मुझे भी कितने जन्मों तक इस दौर से गुजरना पड़ेगा?
पाप और पुण्य के क्रेडिट कार्ड से अपनी भौतिक संपदा के हस्तान्तरण की प्रक्रिया का ही प्रभाव है कि प्रारब्ध वश एक कुत्ता एसी में मेम की गोद में रहता कीमती बिस्किट व अन्य भोज्य खाता वहीं दूसरा भोजन की जुगाड़ में कदम कदम पर डंडे खाता। स्पष्ट है कि आज हम जो भी भौतिक संपदा सजो रहे हैं। वह पाप और पुण्य के क्रेडिट कार्ड के रूप में समेटकर ले जायेंगे। -- देवेश शास्त्री


== अहं भाव का आत्मरूप ही देवत्व ==

अहंकार है‘‘अंतश्चतुष्ट्य’’मन, चित्त, बुद्धि के मध्यस्थ का अवयव जो करता है अंतश्शत्रु का मुकाबला

रामायण काल में दो बलिष्ट पात्र हनुमान और रावण हैं, रावणं अहंकारी है- ‘मेरी इन बड़ी भुजाओं ने कैलाश पहाड़ उठाया है, दानव मय इंद्र कुबेर बरुण इन बाणों से थर्राया है।’ यानी सफलता का हर पक्ष अहं से सराबोर है। दूसरी ओर हनुमान जी प्रत्येक सफलता के पीछे ईश्वरीय कृपा को श्रेय देते हैं-‘लांधि सिंधु हाटक पुर जारा, निशिचर गन वधि विपिन उजारा, सो सब तब कृपालु प्रभुताई, नाथ न कछू मोर प्रभुताई।’ निमित्तमात्र जीव अहंकार में जो सोचता है, बोलता है, जो करता है, यानी मनसा वाचा कर्मणा जो भी है वह स्वयं के अस्तित्व मंे ईश्वरीय सत्ता के महत्व को नहीं समझता। वास्तव में ‘मैं’ यानी देह में देही यानी आत्मा की सत्ता है। अहं (मेैं) को आत्मतत्व में विलीन करना होगा। अध्यात्म विज्ञान के अनुसार अंतश्चतुष्ट्य में क्रमशः मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार आते हैं। ‘अहं’ मन, बुद्धि और चित्त से ऊपर है। फिर उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। जैनदर्शन मन को नियंत्रित कर इंद्रियों को जीतने की बात करता है। यानी मन रूपी अरि का हनन की आध्यात्मिक दृष्टि में अरिहंत कहा गया। बौद्धदर्शन बुद्धि के अस्तित्व को श्रेष्ठता प्रदान कर नित्यानित्य का भेद करने वाले विवेक से काम लेता है, बुद्धि से ही जरा मरण से अलग हो सकते हैं। ये दोनों दर्शन कर्मसिद्धांत के आधार पर क्रमशः मन-बुद्धि पर नियंत्रण को तत्वज्ञान मानते हैं, जबकि योग दर्शन चित्त पर अंकुश लगाता है। ‘‘योगश्चित्तवृत्तिः निरोधः’’ चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण की योग है। यहां भी कर्म सिद्धांत ही है- ‘‘योगः कर्मसु कौशलम्।’’ चैथा निर्गुण तत्व अहंकार है। जिस पर सभी दर्शन मन, बुद्धि और चित्त से अलग सोच न रखकर सिर्फ अहंकार से आच्छादित मन को जीतने में विश्वास रखते हैं, यदि मन से अहं निकल जाये तो समझो हम जिन हो गये यानी जीत गये। इसी तरह बुद्धि और चित्त से अहं को मिटाकर निरहंकार कर्म की कुशलता का पाठ पढ़ाया जाता है। क्या अहंकार मिट सकता है? मन बुद्धि चित्त जितने महत्वपूर्ण हैं। उतना ही महत्वपूर्ण अहं है। अहं यानी मैं जब तक ‘नाम-रूप’ यानी देह है, तब तक अहं के तत्व को नहीं समझा जा सकता। मैं देह नहीं, देही हूं। आत्मतत्व में अहं का एकात्म ही अहंकार का मूलतत्व है। ‘‘सोऽहमस्मि’’ वह आत्मा ही मैं हूं। यानी वह परमात्मा मैं (जीवात्मा) हूं। सहज रूप में देही की प्रेरणा से देह जो कर रहा है, कह रहा है या विचार कर रहा है वह अहं (मैं) कर रहा हूं। यानी ईश्वर कर रहा है अर्थात् ईश्वरीय सत्ता से हो रहा है। ‘‘सोऽहमस्मि’’ जब तक मैं को शरीर तक सीमित माना गया। तब तक अहं रावण की तरह शक्ति को क्षीर्ण करने तत्व रहा। जब वही अहं आत्मतत्व में समाहित हुुआ तो हनुमानजी के लिए शक्ति संबर्द्धक हो गया और अहं ही देवत्व हो गया। -देवेश शास्त्री



== new वर्ण व्यवस्था ==
21वीं सदी में फिर नये स्तर से वर्ण व्यवस्था सामने आ रही है। वह भी कर्मानुसार है। विप्र स्वरूप क्रीमी लिअर वर्ग यानी बड़े राजनेता, प्रथम श्रेणी के प्रशासनिक अफसर, न्याय पालिका के उच्चस्तरीय जज व कुबेरात्मक उद्योगपति। एक हाई-फाई नेता, अफसर या जज अपनी संतान का संबंध क्रीमी लियर वर्ग में ही जायेगा वहां पुरानी वर्णव्यवस्था कोई मायने नहीं रखती। दूसरा वर्ण क्षत्रिय स्वरूप सुरक्षा वर्ग है, यहां सैन्य वर्ग आता है। वह थलसेना वायुसेना व नौसेना हो या फिर अर्द्धसैनिक वर्ग, पीएसी, पुलिस व गार्ड। इनमें भी जनरल, ब्रिगेडियर, कर्नल जवान आदि उपवर्ग है। वे भी पारस्परिक उपवर्ग में ही संबंध चाहेंगे। तीसरा वर्ण वैश्य स्वरूप मध्यम आय वाला वर्ग है- मध्यम वर्गीय नेता, प्रशासनिक कर्मचारी, लघु व मध्यम व्यवसाई, शिक्षक, वकील, चिकित्सक आदि। आमदनी पर क्रेंद्रित। चैथा वर्ण शूद्र स्वरूप होगा कृपाजीबी दरिद्र वर्ग। उक्त तीनों वर्णों की सेवा यानी चाकरी कर कृपापात्र बनकर जीने वाले।


== दरिद्रता ही ब्राह्मण की ‘‘वैभव संपदा’’ ==
‘‘जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्द्विज उच्यते।’’ जन्म से सब एक हैं, किन्तु संस्कारों से दूसरा जन्म पाना ही द्विजाति वर्ग यानी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य होते है। समाज में, व्यवसाय-आधारित चार वर्ण होते हैं। ब्राह्मण (आध्यात्मिकता के लिए उत्तरदायी ), क्षत्रिय (धर्म रक्षक), वैश्य (व्यापारी व कृषक वर्ग) तथा शूद्र (शिल्पी, श्रमिक समाज)। व्यक्ति की विशेषता,आचरण एवं स्वभाव से उसकी जाति निर्धारित होती थी। विप्र, द्विज, द्विजोत्तम, भूसुर आदि नामों से ब्राह्मण जाना जाता है। विद्वान, शिक्षक, पंडित, बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक तथा ज्ञान- अन्वेषी ब्राह्मणों की श्रेणी में आते थे। यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार ‘ब्रह्मं जानाति ब्राह्मणः’ ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म यानी अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान को जानता है। सत्यनिष्ठ-ईश्वर ज्ञाता। आजकल बहुत सारे ब्राह्मण धर्म-निरपेक्ष व्यवसाय करते हैं और उनकी धार्मिक परंपराएं उनके जीवन से लुप्त होती जा रही हैं। यद्यपि भारतीय जनसंख्या में ब्राह्मणों का प्रतिशत कम है, तथापि धर्म, संस्कृति, कला, शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान तथा उद्यम के क्षेत्र में इनका योगदान अपरिमित है। ब्राह्मण का स्वभाव ‘शमोदमस्तपः शौचम् क्षांतिरार्जवमेव च। ज्ञानम् विज्ञानमास्तिक्यम् ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।। चित्त पर नियन्त्रण, इन्द्रियों पर नियन्त्रण, शुचिता, धैर्य, सरलता, एकाग्रता तथा ज्ञान-विज्ञान में विश्वास। वस्तुतः ब्राह्मण को जन्म से शूद्र कहा है । यहाँ ब्राह्मण को क्रिया से बताया है। ब्रह्म का ज्ञान जरुरी है । केवल ब्राह्मण के घर में पैदा होने से ब्राह्मण नहीं होता । ब्राह्मण के छह कर्तव्य इस प्रकार हैं। ‘‘अध्यापनम् अध्ययनम् यज्ञम् यज्ञानम् तथा। दानम् प्रतिग्रहम् चैव ब्राह्मणानामकल्पयात।।’’ शिक्षण, अध्ययन, यज्ञ करना , यज्ञ कराना, दान लेना तथा दान देना ब्राह्मण के छह कर्तव्य हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि दरिद्रता ही ब्राह्मण की वैभव संपदा है। यही संकेत सुदामा चरित्र में स्पष्ट मिलते है। भागवत महापुराण गर्ग संहिता आदि ग्रंथों में इस प्रसंग को लेकर दरिद्रता की अलग अलग परिभाषा की गई है। द्वासुपर्णा नामक पुस्तक का कथानक सुदामा को प्रतीक मानकर हृदयग्राही है। गुरुमाता द्वारा दिये गये चने सुदामा अकेले खा लेते है। इसका रहस्य गूढ़ है। यह कहना कि मित्र से चोरी ही निरर्धनता का कारण है यहां प्रासंगिक नहीं है। सुदामा नहीं चाहते थे कि मित्र कृष्ण को चने खिलाकर अनर्थ करना उचित नहीं है। क्योंकि परमेश्वर को अर्पित सामग्री के बदले वे बहुत कुछ देते हैं। पूतना ने विषाक्त दूध की कुछ ही बूंदें पिलाई थी, बदले में बैकुंठ मिला। दरिद्रता की रक्षा ही परम धर्म है। मथुरा सम्मेलन में पुरस्कार, शादी में दहेज ठुकराना और पत्नी की जिद पर द्वारिका जाने से इंकार करना मगर जाने पर भी परोक्ष रूप से प्राप्त धन वैभव का अनासक्त भाव से प्रयोग करना यही संकेत देता है कि दरिद्रता की रक्षा आवश्यक है। शिक्षण कार्य में लगे ऋषि कभी शुल्क नहीं लेते बल्कि क्षमतानुकूल गुरुदक्षिणा स्वीकार करते थे। सवाल उठता है कि राजपुत्र भी आवासीय शिक्षण व्यवस्था में भिक्षा मांगते थे ईंधन चयन करते थे। क्या राजा ने कभी अनुदान नहीं देना चाहा? देना चाहा मगर स्वीकार नहीं किये गये। अन्यायोर्जित धन के नियोजन के बहुमंजिला शिक्षालयों में विद्या नहीं प्राप्त हो सकती। अविद्या का ही साम्राज्य है। विद्वता, शिक्षण, पांडित्य, तत्वज्ञान, विज्ञान अन्वेषण में चित्त पर नियन्त्रण(योगश्चित्तवृत्तिः निरोधः), इन्द्रियों पर नियन्त्रण, शुचिता, धैर्य, सरलता, एकाग्रता तथा ज्ञान-विज्ञान में विश्वास आवश्यक तत्वात्मक गुण हैं जिनमें धनाढ्ता बाधक ही नहीं अधम्र्य है। -देवेश शास्त्री

== ऊष्मा जाग्रत करने का वक्त! ==
अजस्र ऊर्जा के स्रोत सूर्य-नारायण के उत्तरायण होने का पर्व 'मकर संक्रांति' जो समचे 'ब्रह्मांड' में अपनी-अपनी तरह से माना जाता है। पंजाबी शैली में 'लोहड़ी', आर्य शैली में 'खिचड़ी' और द्रविड़ शैली में 'पोंगल' अथवा देश-देशान्तर में स्थानीय परम्परागत शैली के विविध उत्सव सूर्योपासना के ही रूपक है,यदि सौर-संक्रमण प्रक्रिया की गहराई में जायें और आत्म-तत्व निहित अनंत ऊष्मा को जाग्रत कर सकते हैं,जो अब अवश्यंभावी है। कर्क से धनु राशि में सूर्य दक्षिणायन रहता है, यानी 14 जुलाई से 14 जनवरी तक की छमाही। 14 जनवरी को धनु से मकर राशि में संक्रमण करते ही सूर्य उत्तरायण हो जाते है। विज्ञान की दृष्टि से भी सूर्य की तपन की क्रमिक अभिवृद्धि सुखद हो जीती है। शादी-विवाह और अन्य शुभकार्य शुरु हो जाते हैं। 'खिचड़ी','लोहड़ी' और 'पोंगल' के रूप में खेत खलिहान में उत्सव मनाना, आग जलाकर खेलना, नदियों के पवित्र जल में स्नान कर 'खिचड़ी' का 'दान' देना जैसी तमाम परंपराओं के विज्ञान परक कारण हैं,न कि मात्र आडंबर। वर्षा-शरद-शिशिर में निस्तेज सूर्य की स्थिति दक्षिणायन का प्रतीक और क्रमशः हेमन्त-बसंत और ग्रीष्म में अपने ऊष्मित तेवर के रूप में उत्तरायण हो जाता है। यह सौर-प्रक्रिया यानी परात्पर परमात्मा के अंशांशावतार सूर्य की गति हमें अपने अंतस्थ परमात्म स्वरूप की ऊष्मा को जाग्रत करने का संदेश देती है। सांख्य दर्शन के अनुसार शरीर की रचना 5 महद्तत्वों से होती है, उनमें तेज (अग्नि-ऊष्मा) प्रमुख है। �ईश्वर अंश जीव अविनाशी� अध्यात्म विज्ञान आत्मा को करोड़ों सूर्यों की ऊष्मा के परात्पर स्रोत परमात्मा ही मानता है,इसीलिए आत्म-साक्षात्कार को तपस्वी मनीषियों ने वेद-वेदांत आदि बांगमय में मोक्ष कहा। �तप-बल� से ही सारा सांसारिक उपक्रम संचालित है। तप,सूर्य की तपन से भी परे है। तपबल से कपिल-मुनि के दृष्टिपात से राजा सगर के 60 हजार पुत्र जल गये,तपबल से ऊष्मित दधीचि की हड्डियों से बज्र बना। क्या हम अपनी ऊष्मा को जाग्रत नहीं कर सकते? अमरीकी मूल के भारतीय वैज्ञानिक एमके त्रिवेदी एक ऐसे उदाहरण हैं,जिन्होने अंतस्थ दिव्य ऊर्जा को जाग्रत किया। श्री त्रिवेदी पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों व मनुष्य पर जो आशीर्वाद स्वरूप प्रयोग कर परहित में लगे हैं, जिनके अंग-प्रत्यंग के प्रत्यंतरित (भिन्न-भिन्न) तापमान और विचार संचरण का रहस्य अन्तरात्मा की ऊष्मा का प्राकट्य और जनहित में प्रयोग की सद्भावना है। वे कहते हैं- जब सूर्य की ऊष्मा ही प्रकृति और प्राणी का आधार है, वह ईश्वरीय कृपा से सुलभ है,महेन्‍द्र कुमार त्रिवेदी इस दिशा में स्वयं को निमित्त-मात्र मानते हैं, जो अध्यात्म और विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता है। आज समस्याग्रस्त समाज को मकर संक्रांति पर अपने अंदर छिपी अतंत ऊष्मा को सत्यनिष्ठा स्वरूप तपबल से जाग्रत करनी होगी,यह देश-काल-परिस्थिति के आधार पर अवंश्यंभावी है।

== युवा-ऊर्जा का पराभव! ==
विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष 'राष्ट्रीय युवा दिवस' के रूप में मनायी जाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् 1985 ई. को 'अर्न्‍तराष्ट्रीय युवा वर्ष' घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की, कि सन 1985 से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिन के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए,और मनाया जाने लगा यानी युवा दिवस के रूप में स्वामी विवेकानंद का चिन्तन अपना प्रभाव छोड़ने की बजाय रस्म अदायगी की भेंट चढ़ गया। यही कारण है कि परमाणु-बम से भी अधिक ऊर्जित यूथ-पावर आज भीषण शीत में हेमराज और सुधाकर सिंह के रूप में नापाक बर्बरता की भेंट चढ़ गया। यूथ-पावर व्यभिचारी दुप्रवृत्ति में फंसकर निर्भीकता पूर्वक दुष्कर्म में संलग्न हो गया,अनगिनत दामिनियों की यूथ-पावर व्यभिचारी यूथपावर के शॉट-सर्किट से घ्वस्त होने लगी। यूथ-पावर यानी युवा ऊर्जा कदाचारी सियासी जमात की स्वार्थसिद्धि के लिए भोग्य-ऊर्जा बनकर कारगर साबित होने लगी। 1993 में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के 'विश्व धर्म सम्मेलन' में कहा था-��मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ,जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते,वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान हैं, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया हैं। जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न- भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं। जो कोई मेरी ओर आता हैं - चाहे किसी प्रकार से हो - मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।�� वास्तविक धर्म शक्ति, युवाशक्ति यही है। स्वामी विवेकानंद मानते हैं कि धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है। व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनने के लिए सत् को धारण करना होगा। सत्यमेव जयते नानृतं, सत्य की ही विजय होती है मिथ्या लानी असत्य की नहीं। सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्या अर्थात् सत् है तो सिर्फ परमात्मा जो आत्मरूप से विद्यमान है। आज जरूरत है स्वामी विवेकानंद के सद्विचारों को धारण करने की। स्वामी विवेकानंद ने 120 साल पहले 1893 में अतीत के झरोखे से आज के हालात को समझा था, शिकागों में उन्होंने कहा था- ��साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी बीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं, उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये बीभत्स दानवी न होती, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता, पर अब उनका समय आ गया हैं, और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टाध्वनि हुई हैं, वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होने वाले सभी उत्पीड़नों का,और एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।�� क्या हम वह कर पाये जो स्वामी जी चाहते थे? नहीं, बदले में उसी वीभत्स अतीत की पुनरावृत्ति करते हुए हम समय,भाग्य और ईश्वर पर ही मिथ्या दोष लगाते हुए युवा-दिवस मनाकर विवेकानन्द के नाम पुष्पांजलि कर स्वयं को महिमामंडित कर लेते हैं। सवाल उठता है क्या करे युवा वर्ग? इसका जवाब भी स्वामी विवेकानंद ही देते हैं- ��सारी शक्ति तो तुम्हीं में है,अपने ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। प्रबल शक्ति आत्मा की है। डर किस बात का है? मृत्यु से प्रेम करो,सिंह सी शूरता और फूल सी कोमलता के साथ आगे बढ़ो। यदि 2-4 लोग भी आत्मदृष्टा, पवित्र व नैतिक चरित्र वाले सत्यनिष्ठ मिल जायें तो तूफान मचा दें।�� हम स्वामी विवेकानंद की 150 वीं जयन्ती मनाने जा रहे हैं, इतने लम्बे अंतराल में तूफान मचाने वाली युवा ऊर्जा दिग्भ्रमित होकर सियासी मदारी के हाथ का खिलौना बनकर ठगी जाती रही,जिन पर कुछ विश्वास भी किया जा सकता था,वे कालनेमि सिद्ध होते जा रहे रहे है, दानवीयता में उलझी युवा ऊर्जा का मानवता पर बज्राघात तब तक जारी रहेगा, जब तक स्वामी विवेकानंद के सदुपदेशों को आत्मसात करने की प्रबल इच्छाशक्ति नहीं होगी।

== �आत्म-तत्व� का सर्वोत्कृष्ट वाग्मयी मूर्ति है गीता ==
21वीं शताब्दी निश्चित रूप से विज्ञान का क्रांति-दौर माना जा रहा है, मगर इससे भी परे ��परात्पर विज्ञान�� का दौर रहा है, और आने वाला दिख रहा है। इस सर्वोत्कृष्ट विज्ञान का ग्रन्थ है गीता। गीता ने ही ��महाभारत�� को निर्णायक स्वरूप दिया। गीता के वैज्ञानिक तथ्यों की ऊर्जाशक्ति से महात्मा गांधी ने ब्रिटिश हुकूमत को खदेड़ा, गीता से ही स्वामी विवेकानंद ने विश्व को परात्पर अध्यात्म-विज्ञान की ज्योति से प्रकाशित किया। क्रमशः 18 अध्यायों के गीता शास्त्र की अनुक्रमणिका में 1. अर्जुनविषादयोग, 2.सांख्ययोग, 3. कर्मयोग, 4. ज्ञानकर्मसंन्यासयोग,5. कर्मसंन्यासयोग,6. आत्मसंयमयोग, 7. ज्ञानविज्ञानयोग,8.क्षरब्रह्मयोग, 9. राजविद्या- राजगुह्ययोग, 10. विभूतियोग,11. विश्वरूपदर्शनयोग,12.भक्तियोग, 13. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभागयोग,14. गुुणत्रयविभागयोग, 15. पुरुषोत्तमयोग, 16. दैवासुर सम्पद्विभागयोग, 17.श्रद्धात्रय विभागयोग 18. मोक्षसंन्यासयोग। वास्तव में आत्म-तत्व के परात्पर विज्ञान को आत्मसात करना ही वैज्ञानिक बनना है। आखिर विज्ञान क्या है? वि उपसर्ग दो अथों में होता है विशिष्ट और विकृत। विशिष्ट ज्ञान ही विज्ञान है जिसे �तत्वज्ञान� कहा जाता है। गीता शास्त्र आत्मतत्व को परिभाषित करने वाला सर्वात्कृष्ट विज्ञान-ग्रन्थ है। दूसरी ओर विज्ञान को परिधि में समेटना �विकृतज्ञान� है। जिज्ञासा से ही हम तत्व की और जाते हैं, जब जिज्ञासा होती है- ऐसा क्यों? उसका समाधान क्रमशः तत्व तक पहुचाता है। जैसे बनस्पति, रसायन, भौतिक बिन्दुओं पर जिज्ञासायें ��ऐसा क्यों? ऐसा क्यों? ऐसा क्यों? के क्रमिक समाधान तत्संबन्धी विज्ञान है, बनस्पति विज्ञान, रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान। व्यापक समाज के बारे में ऐसी जिज्ञासायें सामाजिक विज्ञान के तत्व तक ले जाती है, घर गृहस्थी की जिज्ञासायें गृह-विज्ञान के तत्व तक पहुचने की सीढ़ी है। यही प्रक्रिया भूतल विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, कम्प्यूटर विज्ञान सहित तत्वज्ञान (विज्ञान) के अनंत भेद है। प्राणी के साफ्टबेयर स्वरूप अन्तःचतुष्टय में मन आता है, और मन का तत्वज्ञान ही मनोविज्ञान है। उसी तरह ��आत्मतत्व�� का ज्ञान अध्यात्म विज्ञान है, फिर अध्यात्म को विज्ञान की श्रेणी में सर्वोकृष्ट माना जाता है। आज जिस विज्ञान की बातें हो रही हैं, उनके जानकार यानी वरिष्ठ वैज्ञानिक ही ��ऐसा क्यों?�� की धुन में बढ़ते-बढ़ते आत्मतत्व तक पहुंचे हैं। विषादयोग ही पहली सीढ़ी है तत्वज्ञान की जो मोक्षसन्यास योग तक पहुंचाती है। पद्मपुराण के उत्तरखंड में श्रीमद्भगवद्गीता के अष्टादश अध्यायों का महात्म्य वर्णित है। क्षीरसागर में शेष शैया पर विराजमान श्री विष्णु से भगवती लक्ष्मी ने निवेदन किया��आप जगत् का पालन करते हुए भी अपने ऐश्वर्य के प्रति उदासीन होकर क्षीरसागर में सुख की नींद ले रहे हैं।�� श्रीहरि बोले-��मैं नींद नहीं लेता हूं, अपितु तत्व का अनुसरण करने वाली अन्तर्दृष्टि के द्वारा अपने ही माहेश्वर तेज का साक्षात्कार कर रहा हूं। यह वही माहेश्वर तेज है जिसका योगी पुरुष कुशाग्र बुद्धि के द्वारा अपने अंतःकरण में दर्शनकरते हैं तथा जिसे मीमांसक विद्वान वेदों का सार तत्व निश्चित करते हैं। वह माहेश्वर तेज एक, अजर प्रकाश स्वरूप, आत्मरूप, रोग-शोक रहित, अखंड आनंद पुंज, निष्पन्द तथा द्वैत रहित है। विश्व का जीवन उसी के अधीन है। मै सतत् उसी का अनुभव करता हूं। देवेश्वरि! यही कारण है कि मैं तुम्हें नींद लेता सा प्रतीत हो रहा हूं।�� लक्ष्मीजी ने फिर प्रश्न किया कि ��हे प्रभो! आप ही योण्यिों के ध्येय हैं क्या आपके अतिरिक्त भी कोई ध्यान करने योग्य तत्व है?�� श्रीहरि बोले-��हां! द्वैत-अद्वैत से प्रथक, भाव-अभाव से मुक्त, आदि-अंत से रहित, शुद्ध ज्ञान के प्रकाश उपलब्ध होने वाला, सर्वसमर्थ, परमानंद स्वरूप होने के कारण मोहक मेरा परात्पर तत्व ही ��आत्मा�� के रूप में अनुभूत होता है। गीताशास्त्र में मैंने इसी स्वरूप को प्रतिपादित किया है। हे सुन्दरि! क्रमशः 5 अध्यायों को पंच-मुख जानो, 10 अध्यायों को दश-भुजाएं, सोलहवें अध्याय को उदर, 17वें व 18वें अध्याय को दोनों चरण मानें। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता अठारह अध्याय की वाग्मयी ईश्वरी-मूर्ति है।�� भगवान ने गीता के प्रथम अध्याय के महात्म्य में सुकर्मा की कथा कही, आश्रम में रहने वाले शुक ने गीता पाठ सुनकर रट लिया। उसी तोते पिंजरस्थ होकर गीता गान करने से एक वैश्या के पातक पुण्य में परिवर्तित हुए। उस वेश्या के पुण्य दान से पातकी सुकर्मा का उद्धार हुआ। विषादोपरान्त योगेश्वर रीकृष्ण्ण द्वारा सांख्ययोग, कर्मयोग,ज्ञानकर्म संन्यासयोग, कर्मसंन्यासयोग,आत्म- संयमयोग,ज्ञानविज्ञानयोग, क्षरब्रह्मयोग,राजविद्याराज- गुह्ययोग, विभूतियोग, विश्वरूपदर्शनयोग, भक्तियोग, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभागयोग, गुणत्रय- विभागयोग, पुरुषोत्तमयोग, दैवासुर सम्पद्विभागयोग, श्रद्धात्रय विभागयोग के बाद मोक्षसंन्यास योगका उपदेश दिया। जिसका सार है ��सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज।� यानी उस महत्तत्व ही आत्मा है, जिसका स्वयं ब्रह्मा जाप करते है, विष्णु अन्तमुखी होकर चिंतन करते हैं और शंकर ध्यान करते हैं। वही निर्गुण तत्व ही माहेश्वर तेज स्वरूप आत्म तत्व है।

== गुरु महत्व ==
व्यास जयन्ती ही गुरु पूर्णिमा है। गुरु को गोविंद से भी ऊंचा कहा गया है। गुरुपरंपरा को ग्रहण लगाया तो सद्गुरु का लेबिल लगाकर धर्मभीरुता की आड़ में धंधा चलाने वाले ‘‘कालिनेमियों ने। शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। ‘व्यास’ का शाब्दिक संपादक, वेदों का व्यास यानी विभाजन भी संपादन की श्रेणी में आता है। कथावाचक शब्द भी व्यास का पर्याय है। कथावाचन भी देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप पौराणिक कथाओं का विश्लेषण भी संपादन है। भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, 18पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया। पंचम वेद ‘महाभारत’ की रचना इसी पूर्णिमा के दिन पूर्ण की और विश्व के सुप्रसिद्ध आर्ष ग्रंथ ब्रह्मसूत्र का लेखन इसी दिन आरंभ किया। तब देवताओं ने वेदव्यासजी का पूजन किया। तभी से व्यासपूर्णिमा मनायी जा रही है। ‘‘तमसो मा ज्योतिगर्मय’’ अंधकार की बजाय प्रकाश की ओर ले जाना ही गुरुत्व है। आगम-निगम-पुराण का निरंतर संपादन ही व्यास रूपी सद्गुरु शिष्य को परमपिता परमात्मा से साक्षात्कार का माध्यम है। जिससे मिलती है सारूप्य मुक्ति। तभी कहा गया- ‘‘सा विद्या या विमुक्तये।’’ आज विश्वस्तर पर जितनी भी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, उनका मूल कारण है गुरु-शिष्य परंपरा का टूटना। श्रद्धावाॅल्लभते ज्ञानम्। आज गुरु-शिष्य में भक्ति का अभाव गुरु का धर्म ‘‘शिष्य को लूटना, येन केन प्रकारेण धनार्जन है’’ क्योंकि धर्मभीरुता का लाभ उठाते हुए धनतृष्णा कालनेमि गुरुओं को गुरुता से पतित करता है। यही कारण है कि विद्या का लक्ष्य ‘मोक्ष’ न होकर धनार्जन है। ऐसे में श्रद्धा का अभाव स्वाभाविक है। अन्ततः अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचारादि कदाचार बढ़ा। व्यासत्व यानी गुरुत्व अर्थात् संपादकत्व का उत्थान परमावश्यक है।

== दोषी कौन ? ==
एक पौराणिक आख्यान --
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विधवा ब्राह्मणी का बच्चा सांप के काटने से मर गया । तत्काल लोगों ने सांप को पकर लिया ।
सांप वोला - मैं दोषी नहीं हूँ , मैंने किसी की प्रेरणा से कटा।
प्रश्न - किसकी प्रेरणा से ?
जवाब- यम की।
तत्काल यम का आवाहन हुआ , वह बोला-मैं दोषी नहीं हूँ , मैंने किसी की प्रेरणा से सांप को प्रेरित किया। प्रश्न - किसकी प्रेरणा से ?
जवाब- काल की।
तत्काल काल का आवाहन हुआ , वह बोला-मैं दोषी नहीं हूँ , मैंने किसी की प्रेरणा से यम को प्रेरित किया। प्रश्न - किसकी प्रेरणा से ?जवाब- इस बच्चे के कर्मो की। 

== मदालसा आख्यान ==
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रानी मदालसा अपने पहले पुत्र को बचपन से ही वे संस्कार देने शुरू कर दिए जो वास्तविक विद्या है। आज हम जो विद्या ग्रहण करने पर जोर देते हैं या ले रहे है वह विद्या नहीं अविद्या है। सा विद्या या विमुक्तये, ये जीवन का लक्ष नहीं जो अपनाते हुए कदाचार कर रहे हैं ।
मदालसा के उपदेश से बालक विरक्त होकर जंगल में चला गया। दूसरा पुत्र हुआ उसे भी मदालसा ने वास्तविक विद्या दी , वह भी चला गया। इस तरह क्रमशः ४ पुत्र सन्यासी हो गए। जब पांचवां गर्भ आया तो राजा ने कहा प्रिये ! अब होने वाली संतान को वह विद्या मत देना, हमें उत्तराधिकारी चाहिए।
पति के आदेश पर पांचवें पुत्र को मोह-लोभ , राग द्वेष के साथ राजयोग की शिक्षा दी। वह बड़ा हुआ आश्रम व्यवस्था के तहत राजा रानी ने पुत्र का राज्याभिषेक कर संन्यास आश्रम में जाने का विचार किया। रानी मदालसा ने पुत्र को एक अंगूठी दी और कहा कि इसमें उपदेश-पत्र रखा है। जीवन में जब भारी संकट आये कोई सहारा न दिखे तब अंगूठी से उपदेश-पत्र निकल कर पढ़ लेना। यह कहकर राजा रानी जंगल में चले गए।
मदालसा के पुत्र ने १००० वर्ष शासन किया प्रजा खुशहाल थी। काशी नरेश ने आक्रमण कर दिया भयंकर युद्ध में मदालसा का पुत्र हर गया वह बीवी -बचों को छोड़कर अपनी जान बचाते हुए भाग खडा हुआ। जंगल में बेहाल वह घास फूस खाकर समय काटने लगा। उसे याद आया माँ ने कहा था - जीवन में जब भारी संकट आये कोई सहारा न दिखे तब अंगूठी से उपदेश-पत्र निकल कर पढ़ लेना। उसने तत्काल उपदेश-पत्र निकाला , जिसमें १ श्लोक था , भावार्थ इस तरह है- संग (आसक्ति) सर्वथा त्याज्य है यदि संग त्यागना मुश्किल हो तो सतसंग करो, कामना सर्वथा त्याज्य है यदि संभव न हो तो मोक्ष की कामना करो। 
उक्त उपदेश ही हम सभी लोगों को विद्या- अविद्या का भेद बताता है।
उक्त मदालसा उपाख्यान को पढ़ें, गुनें यही आत्मतत्व का सार है। 

== संस्कार द्वारा ही व्यवस्था परिवर्तन संभव ==

भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के संकल्प को लेकर जो आन्दोलन शुरू हुआ था, वह स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के चलते भ्रष्ट-सियासी सोच में उलझ गया है। सब चाहते है संसदीय जनतंत्र को सदाचारी होना चाहिए, किन्तु कैसे? इस प्रश्न के जवाब में संस्कारपरक कार्ययोजना की जरूरत है। जिसका प्रेरक है पौराणिक प्रह्लाद प्रसंग। जब हिरण्यकश्यप की कुशासनिक व्यवस्था परिवर्तन हो सकता है तो नित नये घोटालों देने वाली भ्रष्ट व्यवस्थ...ा परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता?
हिरण्यकश्यप की कुशासनिक व्यवस्था में हाहाकार मचा था। रानी कयाधू का देवराज इन्द्र ने हरण किया। कयाधू का गर्भस्थ बालक वंशानुक्रम गुण दोषों के आधार पर हिरण्यकश्यप का ‘बाप’ होगा। यानी ऐसे दैत्यराज का जन्म से पहले ही बध करना होगा, यह सोचकर इन्द्र भ्रूणहत्या करना चाहते थे। इस बीच देवर्षि नारद ने इन्द्र को अनर्थ करने से रोक दिया- ‘‘संस्कार द्वारा ही व्यवस्था परिवर्तन संभव है, हिंसा से नहीं। कयाधू मेरे हवाले कर दो, मैं गारंटी लेता हूं कि भावी दैत्यसुत देवत्व संपन्न होगा।’’
कयाधू को लेकर देवर्षि नारद अपने आश्रम में ले गये। वहां एक शिक्षक की भांति कयाधू को पढ़ाने लगे। वे जानते थे कि पतिव्रता कयाधू को नहीं बदल सकते, उनकी ध्येय गर्भस्थ शिशु को सद्संस्कार देकर शिक्षित करना था। वे उसमें सफल भी हुए। पाठ्यक्रम पूरा होते ही कयाधू को नारद ने वापस भेज दिया। प्रह्लाद जन्मना ही देवत्वपूर्ण था, देवर्षि की दृढ़ इच्छाशक्ति के आधार पर सत्यनिष्ठा के प्रताप से ही व्यवस्था परिवर्तित हुई।
आज भावी पीढ़ी को कदाचारी प्रवृत्ति से बचाने की जरूरत है, वह भी सद्संस्कारों से, ताकि आने वाला समय भष्टाचार मुक्त हो सके।
भ्रष्टाचार के बीजारोपण भावी पीढ़ी में कुसंस्कार के रूप देने वाले कोई और नहीं, हम शिक्षक ही हैं। सरकारी नौकरी के लिए मैरिट जरूरी है, अभिभावक उच्चमैरिट के लिए जुगाड़ लगाता है, लोभी शिक्षक सुविधाशुल्क के बदले अच्छी मैरिट की गारंटी ले लेते है। बच्चे में यह कुसंस्कार नहीं तो क्या है। 
किसी भी कार्यसिद्धि के लिए सिफारिश और जुगाड़ की मानसिकता ही भ्रष्टाचार की श्रेणी में आती है, लिहाजा अनासक्त-सत्यनिष्ठ कर्मयोगियों को नारद नीति के तहत आध्यात्मिक शैली में अभियान चलाना होगा। याद करें व्यवस्था का बदलने के लिए शिक्षा को ही सहज रास्ता माना जाता रहा है। मैकाले का घोषणापत्र हो या आरएसएस की शिशुमंदिर योजना अथवा मदरसों में सिमी के माध्यम से धर्मान्धता का बीजारोपण। 
शैशव, बाल, किशोर व युवा वर्ग में सदाचार के लिए नैतिक शिक्षा का पाठ्यक्रम लंबे समय तक रहा मगर कोई असर नहीं पड़ा। क्योंकि नैतिक शिक्षा का पाठ्यक्रम शासन स्तर पर था। क्या हिरण्यकश्यप ब्रह्मनिष्ठा का पाठ्यक्रम ला सकता था, ब्रह्मनिष्ठा के सद्संस्कार देवर्षि नारद ने दिये। उसी आधार पर सत्यनिष्ठ कर्मयोगियों को अनासक्त भाव से नारदनीति को नजीर बनाकर चाणक्यनीति का अनुपालन करते हुए भावी पीढ़ी की मानसिकता से भ्रष्टाचार के दूषित बायरस को मिटाने के लिए सद्संस्कार रूपी ऐण्टीवायरस का प्रयोग करना होेगा।
कार्य योजना के तहत सभी जगह सत्यनिष्ठजनों की टीम बनाई जायेगी। जो निकटवर्ती शिक्षण संस्थाओं में जाकर सप्ताह में एक वार संयुक्त कक्षा लेकर सन्मार्ग दिखाते हुए भारत के भविष्य को स्वच्छ बनाने का प्रयास करेंगे। यह अभियान दीर्घकालिक ही नहीं निरंतर प्रक्रिया हो जायेगी, बिल्कुल पल्स पोलियो अभियान की तरह। पालियो के विषाणु मारे जा सकते हैं तो भ्रष्टाचार के क्यों नहीं? सदाचारी मानसिकता की भावी पीढ़ी शासन- प्रशासन में दाखिल होगी, तो व्यवस्था परिवर्तन का अहसास होने लगेगा।See More


== आरक्षण है बैशाखी? ==

प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर सियासत उग्र होती जा रही है। अनुसूचित जाति-जन जाति के लिए तरक्की में आरक्षण के प्रावधान संबंधी बिल के साथ ही ओबीसी आरक्षण की मांग और अल्पसंख्यकों के निमित्त सच्चर कमेटी व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों से जुड़े मुद्दे भी उठने लगे हैं। जातिवाद की उठती आग की ज्वाला में झुलते समाज में जातीय उन्माद सामने दिखाई देने लगा है।
‘‘आरक्षण’’ का प्रावधान अनुसू...चित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्ग के लोगों का स्तर ऊपर उठाने के लिए किया गया था। आजादी के 6 दशक बाद भी सामाजिक न्याय का रोना आखिर क्यों? क्योंकि आरक्षण बैशाखी का रूप ले चुका है अच्छी व स्वस्थ मानसिक व बौद्धिक क्षमता सम्पन्न होते हुए भी यह आरक्षण रूपी बैशाखी सामाजिक न्याय के नाम पर ‘अपंग’ बना रही है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो सामाजिक स्तर पर ‘गरीबी’ की तरह ‘पिछड़ेपन’ की सीमा भी बढ़ती जायेगी।
स्कूल में दाखिले में भी आरक्षण रूपी बैशाखी लगाई गई। शिक्षार्जन की दिशा में समानता का पहला मौका मिला, तो अब बैशाखी हट जानी चाहिए। नहीं, पढ़ने के बाद अंकोें की विसमता को पाटने में भी यही बैशाखी काम आती है। आरक्षण रूपी सरकारी नौकरी पाकर भी सामाजिक न्याय नहीं मिला तो तरक्की की सीढ़ियों के लिए भी बैशाखी का प्रयोग यह सिद्ध करता है, मानसिकता में घर कर चुका पिछड़ापन जीवन के अंतिम चरण तक बैशाखी की आवश्यकता तय कर रहा है। सोचने की बात है जब सरकारी नौकरी मिल गई जो सामाजिक, आर्थिक जीवन स्तर तो समान हो गया तो प्रमोशन में आरक्षण रूपी आरक्षण की क्यों पड़ी आवश्यकता? जिस तरह गरीबी हटाओ अभियान वर्षों से चल रहा है जिसने कितनों को मालामाल कर दिया और गरीबी बढ़ती चली गई, उसी तरह सामाजिक न्याय के नाम पर ‘‘अन्यायपरक सिद्धान्त’’ पिछड़ेपन की खाई गहरी करता जा रहा है।See More


== चर्पट पंजरिका ==

सुबह शाम दिन-रात बहु, आत जात ऋतु मास।
काल चक्र में आयु क्षय, तजी न फिर भी आस॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

आग घाम तन लाभ को, ठोड़ी घुटुवन चांप।
हाथ कटोरा वास वन, तजी ना आसा आप॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

जब लौं आप कमात हैं , तब लौं मिलता प्यार।
तन अशक्त जर्जर हुआ, मिलन लगी दुत्कार॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

गेरू भूरे बस्त्र या , घुटे बड़े बहु केश ।
बाबा उदर निमित्त ही धारें नाना वेश॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

करो न गंगा आचमन लाहो न गीता ज्ञान।
हरि चर्चा भाई नहीं कैसे हो कल्याण॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

खेल-कूद में बालपन , यौवन भोग-विलास।
ज़रा काल चिंता फसे, कटे नहीं भाव पाश॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

जनम मरण पुनि-पुनि मिले, कोख कैद हर बार।
भव सागर दुस्तर अधिक, करो मुरारी पार ॥ 
मंद-मति भज ले हरी का नाम। 

देह शिथिल शितकेश भे , गिरे दांत कर लट्ठ ।
फिर भी आसा ना तजि भूले जीवन तथ्य॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

ढली उमर में वासना, सूखा जल तालाब।
ज्यों दरिद्रता में स्वजन, आत्मतत्व भव-चाव॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

कुच नितम्ब तो मात्र हैं माया के आवेश।
अथवा मांस विकार हैं सोचो अब देवेश॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

कौन आप आये कहाँ से को माई बाप।
सोचो स्वप्न विचार तज दुनिया का संताप॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

गीता पढ़ श्री हरि जपो, जपो सहस हरि नाम।
नित होवे सतसंग प्रिय बांटो जमकर दाम॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

जबतक तन में प्राण हैं, तब तक स्वजन लगाव।
हंस उड़ा तन के लिए पत्नी का भय भाव॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

पहले रमणी ऱत रहे, फिर आये तन रोग।
मृत्यु सत्य स्वीकार पर तजे न पापाभोग॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।
(आदिशंकराचार्य रचित चर्पतापन्जरिका का काव्यानुवाद )
देवेश शास्त्री

== सत्यनिष्ठा ही ब्रह्मनिष्ठा ==

- देवेश शास्त्री-

‘‘सत्यमेव जयते’’ वेदवाक्य, के निहितार्थ को आत्मसात करते हुए सत्यनिष्ठा के साथ पद की शपथ लेने वाले ‘जनसेवकों’ से पूछिए, कि आप सत्यनिष्ठा के रहस्य को जानते है? सत्यनिष्ठा का राग अलापने की कोई आवश्यकता नहीं है और न ही सत्यमेव जयते को मनोरंजन का साधन बनाने की। वास्तव में यह वेदवाक्य मन का रंजन नहीं कर सकता, बल्कि आत्मानुभूति कराता है। जिसे अनुपमेय आनंद का आधार कहा जा सकता। इस संदर्भ में गीतकार ओपी दीक्षित के ये पंक्तियां दृष्टव्य हैं-‘‘जाओ जाकर उनसे कह दो कुर्सी पाकर कुछ काम करें, मत ढोल पीटकर वादों के, अब लोकतंत्र बदनाम करें।’’ ‘सत्यं वद, धर्मं चर’, याद करने के नहीं, धारण करने के मंत्र हैं। यहां यह भी कहा गया - सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, मा ब्रूयात सत्यमप्रियम्। ‘सत्य बोलो, प्रिय बोलो किंतु अप्रिय सत्य तथा प्रिय असत्य मत बोलो।’ यहां यह भी उल्लेखनीय है- ‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।’ यानी प्रिय-सत्य एक साथ नहीं हो सकते। जब सत्यता कटु है और असत्य में माधुर्य है तो क्या करना चाहिए? सत्य अप्रिय और असत्य प्रिय होता है, इसीलिए असत्य का बोलवाला है। ‘‘मधुर वचन है औषधी, कटुक वचन है तीर।’’ यानी सत्य हानिकारक शस्त्र है और असत्य लाभदायक औषधि है। बाबा तुलसी ने स्पष्ट कर दिया- ‘‘सचिव वैद गुरु तीन जो प्रिय बोलें भय आश। राज धर्म तन तीन कर होय वेग ही नाश।।’’ सचिव यदि प्रिय बोले तो राज्य, बैद्य यदि प्रिय बोले तो शरीर और गुरू यदि प्रिय बोले तो धर्म का नाश निश्चित है। प्रिय बोलना अहित कर इसलिए है, क्योंकि वह असत्य ही प्रिय है। इस तरह अर्थ की बजाय हम अनर्थ निकालते रहे और स्वार्थपरता में गधे को बाप बनाते हुए अपना उल्लू सीधा करते चले आ रहे हैं। ‘सत्य’ की परिभाषा सीधी है, उक्त सभी उक्तियां उचित और मानव जीवन के लक्ष्यवेध में मंत्र के रूप में हैं। ‘‘त्यागाय संभ्रतार्थानां, सत्याय मितभाषिणाम्’’ मितभाषी ही सत्यवादी होता है। साधक दीर्घकाल मौन साधना करता है जब मुंह से कोई शब्द निकलता तो वह सत् रूप ब्रह्मवाक्य होता है। वही प्रिय सत्य कहा गया है। सत्यनिष्ठा की अजस्र ऊर्जा शक्ति मितभाषी सत्यनिष्ठ साधक की रिद्धि-सिद्धि संपन्नता को प्रकट करता है। ‘‘सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्।’’ आइये! विचार करें!! सत्-चित्-आनंद यानी सच्चिदानंद स्वरूप वह परमतत्व है, जिसे परब्रह्म परमात्मा या परमेश्वर कहते हैं। ‘‘सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्या’’ यह वेदबाक्य स्पष्ट करता है कि सत् रूप ब्रह्म है, सत् से सत्य शब्द बना अर्थात् जो सत् (ब्रह्म के योग्य है वही सत्य है। यह सत् जब मन-वाणी-कर्म ही नहीं बल्कि श्वांस-श्वांस में समा जाता है तब किसी तरह द्विविधा नहीं रहती। सिर्फ सत् से ही सरोकार रह जाय, तब ‘सत्यं वद’ को कंठस्थ हुआ मानो। सन्मार्ग से विचलित न होना सत्स्वरूप परमेश्वर की कृपा से ही संभव है। सन्मार्ग पर पहला कदम है सद्विचारों का आविर्भाव होना। विचारों से दुबुद्धि का सद्बुद्धि के रूप में परिवर्तन दिखाई देगा। बुद्धि से संबद्ध विवेक में सत् का समावेश होगा और वह सत्यासत्य का भेद करने की राजहंसीय गति प्राप्त कर लेता है। अष्टांग योग प्रथमांग यम का प्रथम चरण ही सत् है, सत् पर केंद्रित होने की दशा में ही ‘योगश्चित्त वृत्तिः निरोधः’ सद्बुद्धि ही चित्तवृत्तियों को नियंत्रित करती है। अन्तःचतुष्टय में बुद्धि के बाद चित्त, अहंकार में ब्रह्मरूपी सत् समावेश होते ही मन पर नियंत्रण पाया जा सकता है। मन पर केंद्रित हैं, कामनायें। जो इन्द्रियों की अभिरुचि के आधार पर प्रस्फुटित होती है। कामनाओं का मकड़जाल ही तृष्णा है। संतोष रूपी परमसुख से तृष्णा का मकड़जाल टूटता है। मन द्वारा कामनाओं के शांत हो जाने से आचरण नियंत्रित हो जाता है। ‘‘आचारः परमो धर्मः’’ आचरण में सत् का समावेश ही सदाचार कहा गया है। ऐसे में कदाचार की कोई गुंजाइस नहीं रहती, मनसा-वाचा-कर्मणा लेश मात्र भी कदाचार दिखे तो मान लो कि यहां सत्यनिष्ठा का सिर्फ दिखावा है। सदाचार स्वच्छ मनोदशा का द्योतक है। जबकि कदाचार की परधि में अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार और भ्रष्टाचार अदि आते हैं। सत्-जन मिलकर सज्जन शब्द बनता है। प्रत्येक व्यक्ति सज्जन नहीं होता। इसी तरह सत् युक्त होने पर सन्यास की स्थिति बनती है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि सत्यनिष्ठा ही धर्मनिष्ठा, कर्मनिष्ठा और ब्रह्मनिष्ठा है। क्योंकि धर्म, कर्म ही ब्रह्मरूप सत् है। सत्य परेशान भले हो मगर पराजित नहीं होता। तभी तो ‘‘सत्यमेव जयते’’ के बेदवाक्य को राष्ट्रीय चिन्ह के साथ जोड़ा गया। यह भी विचारणीय है- सत्य परेशान भी क्यों होता है? अध्यात्म विज्ञान स्पष्ट करता है कि सत्यनिष्ठा में अंशमात्र का वैचारिक प्रदूषण यथा सामथ्र्य परेशानीदायक बन जाता है। सत्यनिष्ठा का सारतत्व यह है-‘‘हर व्यक्ति सत्य, धर्म व ज्ञान को जीवन में उतारे, यदि सत्य-धर्म-ज्ञान तीनों न अपना सकें तो सिर्फ सत्य ही पर्याप्त है क्योंकि वह पूर्ण है सत्य ही धर्म है, और सत्य ही ज्ञान। सदाचार से दया, शांति व क्षमा का प्राकट्य होता है। वैसे सत्य से दया, धर्म से शांति व ज्ञान से क्षमा भाव जुड़ा है। सत् को परिभाषित करते हुए रानी मदालिसा का वह उपदेशपत्र पर्याप्त है जो उन्होंने अपने पुत्र की अंगूठी में रखकर कहा था कि जब विषम स्थिति आने पर पढ़ना। ‘‘संग (आसक्ति) सर्वथा त्याज्य है। यदि संग त्यागने में परेशानी महसूस हो तो सत् से आसक्ति रखें यानी सत्संग करो इसी तरह कामनाएं अनर्थ का कारण हैं, जो कभी नहीं होनी चाहिए। कामना न त्याग सको तो सिर्फ मोक्ष की कामना करो।’’ अनासक्त और निष्काम व्यक्ति ही सत्यनिष्ठ है। आसक्ति और विरक्ति के मध्य की स्थिति अनासक्ति है। जो सहज है, दृऋषभदेव व विदेहराज जनक ही नहीं तमाम ऐसे अनासक्त राजा महाराजा हुए है। आज भी शासन, प्रशासन में नियोजित अनासक्त कर्तव्यनिष्ठ नेता व अफसर हैं जिन्हें यश की भी कामना नहीं है।

== बंधन का नाम है कृतज्ञता ==

हां! मैं कृतज्ञ हूं तो ईष्वर के प्रति, संसार के प्रति कृतघ्नता कायम रखूंगा।


- देवेश शास्त्री-

एक दिन बातों ही बातों में मेरे एक अजीज मित्र, नैतिकता का लवादा ओढ़कर अनैतिक क्रियाकलाप में लिप्त ‘व्यक्ति विशेष’ के आचरण पर चर्चा के दौरान बोले- ‘‘तुम तो कृतघ्न हो। उसने तुम्हारे आंदोलन में बढ़-चढ़कर मेहनत की, वही तुम्हाारे निशाने पर है। तुम्हें तो उसका कृतज्ञ होना चाहिए।’’ कृतज्ञता और कृतघ्नता के बीच गूंजने लगी पं रामप्रकाश शर्मा की पंक्तियां- ‘‘जाने कैसा मन अनय अनुगमन नहीं होता, दंभी अन्यायी के सम्मुख नमन नहीं होता। हंसवाहिनी का साधक हूं शायद इसीलिए इधर उलूकवाहिनी का आगमन नहीं होता।’’ मित्र बोले -‘‘सोचो! संधि कर लो। मैं भी आपके साथ जुड़ा हूं, जब तुम कोमा में थे तब मैं सैफई गया था। आर्थिक मदद भी की।.....’’ वे कुछ कहते। मैने कहा कि ‘‘अनयगामी ही नहीं उसकी वकालत करने वाला भी मेरे निशाने पर रहता है।’’ अजीज मित्र आज निशाने पर हंै। मेरे पड़ोस के मंजूकांड के आरोपी चारों तरफ कह रहे हैं- ‘‘ जब नल नहीं आते थे जलसंकट था तब हमने अपने निजी समर से पानी भरवाया, वही हमारे खिलाफ गवाह है। कृतघ्न कहीं के!’’ कृतज्ञता के तत्वार्थ को जाने बगैर संसार ने अहसान रूपी पाश में बांधकर कृतज्ञता रूपी बंधन में फसाना चाहा। एक साथी वाले - ‘‘हम आपके करीबी हैं फिर मेरे खिलाफ खबर कैसे छप गई। अच्छा यह तो बता ही दो कि यह खबर किसने दी।’’ मेरा जवाब था- ‘‘न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है।’’ कृतज्ञ! कृतघ्न!! कृतज्ञ!! कृतज्ञ का अर्थ होता है अपने प्रति किये गये सत्कृत्य या उपकार के भार से दबा हुआ। कृतज्ञता दासता का प्रतीक है। मैं इस संसार में किसी का भी कृतज्ञ नहीं हूं। हैं कृतज्ञ हूं तो सिर्फ ईश्वर के प्रति। जिसके उपकार के भार से दबा हूं मेरे संचित कर्मों के फल रूप प्रारब्ध को भोगने का निमित्त मात्र बनाकर मुझे मानव देह दी, उसमें भी संस्कृतनिष्ठ, सत्यनिष्ठ विप्रवंश, ईश्वरीय प्रेरणा से सत्पथगामी हूं। जीवन में पल-पल सत्पथ से विचलित करने वाले उपकार रूपी मिथ्याा प्रयास, किस किस का अहसानमन्द हुआ जाये। माता पिता ने जन्म देकर पाल पोसकर उपकार किया। सास-ससुर ने अपनी बेटी देकर उपकार किया। आचार्यों ने ज्ञान देकर, अनगिनत नियोजकों ने काम देकर उपकार किया। किसी ने मंच पर कविता पढ़वाकर उपकार किया तो बहुतेरों ने तालियां बजाकर उपकार किया। कइयों ने समारोहों में माला पहनाकर प्रतीक चिन्ह देकर अंगवस्त्र ओढ़ाकर उपकार किया। यहां तक कि हर सुबह हजारों लोग राम-राम करके उपकार कर रहे हैं। पत्नी गृहस्थी चलाकर उपकार कर रही है। हारी-बीमारी में अस्पताल पहुचाकर परिजन उपकार कर रहे हैं। हाल चाल लेने आने वाले संगी साथी मिलकर उपकार कर रहे है। कल जब शरीर ‘निर्जीव’ हो जायेगा तो आंसू बहाकर, चिता जलाकर, रो-गाकर, पिंडदान, तेरहवीं, श्राद्ध, तर्पण कर उपकार किया जायेगा। सब की महत्वाकांक्षा रही और रहेगी, कि आप हमारे प्रति कृतज्ञ रहें। अहसानमंद रहें, नमक हलाल हों। आखिर क्यों? इस अहसान की कोई जरूरत नहीं। में न ही मिथ्या उपकारों को सत्कार्य की श्रेणी में ही मान सकता हूं। ये संसार कोई उपकार नहीं कर रहा। बल्कि ईश्वरीय प्रेरणा से जो सांसारिक कृत्य दिख रहा है वह मेरे सत्कर्मां का प्रताप है। उस ईश्वरीय सत्ता का कृतज्ञ हूं। मिथ्या संसार के प्रति कृतघ्न हूं और बना रहूंगा। कृतज्ञता की परिभाषा सत्कृत्य या उपकार के भार से दबना है। तो किसी स्वार्थवश किया जाने वाला कृत्य सत्कृत्य या उपकार की श्रेणी में कहां? सरासर स्वार्थ है। एक गिलास पानी पिलाकर अहसान जताने की महत्वाकांक्षा स्वार्थ नहीं तो और क्या है? पानी पिलाने के लिए जिसने पे्ररित किया उस ईश्वर का कोई स्वार्थ नहीं है लिहाजा पानी पीने वाले को ईश्वर का कृतज्ञ होना चाहिए, उसका गुणगान करना चाहिए। कृतघ्न! कृतघ्न? किसी के द्वारा अपने प्रति किये गये सत्कार्य को भूल जाने वाले या न मानने वाले व्यक्ति को कृतघ्न कहते हैं तथा इस प्रकार की क्रिया कृतघ्नता कहलाती है। यानी नमकहराम। जो सत्कार्य के रूप में उपकार का प्रदर्शन होता है वह ढोंग है। जो परमार्थ दिख रहा है, उसमें छिपा है, स्वार्थ। ‘‘मरने वाले को फिर कफन की क्या जरूरत, अपनी इज्जत बचाने को कफन डालते है।’’ तभी मेरे पूज्य पितामह हररोज संध्या बंदन के समय गाते थे- ‘‘मरना भला विदेश का, जहां न अपना कोय। जीवजंतु भोजन करें कोटि जग्य फल होय।’’ वे 1975 में हरिद्वार आदि पर्वतीय तीर्थ करके आ रहे थे। मार्ग दुर्घटना में चल बसे । साथ में दादी थी। उन्होंने पार्थिव शरीर यानी मिट्टी को घर ले जाना उचित नहीं समझा। वहीं नहर में जलप्रवाह कर दिया। क्या यह कृतघ्नता थी? नहीं। उन्होने पतिव्रत धर्म का पालन किया मेरे पूज्य पितामह की वसीयत ‘‘मरना भला विदेश का, जहां न अपना कोय। जीवजंतु भोजन करें कोटि जग्य फल होय।’’ के अनुरूप जीव जंतुओं के आहार के लिए पार्थिव शरीर का जल प्रवाह किया। गोस्वामी तुलसीदास ने स्पष्ट शब्दों में लिखा -‘‘ सुर नर मुनि सब की यह रीती। स्वारथ लाग करें सब प्रीती।।’’ किसी का प्रेम सत्कृत्य व उपकार नहीं है, तो कृतज्ञता कैसी? कृतज्ञता ही ब्रह्मपाश है। बंधन में डालना यानी अहसान के ब्रह्मपाश में आबद्ध करना मंजूर नहीं। ईश्वरीय सत्ता के बिना पत्ता तक नहीं हिलता, वह सत्ता भी जीव के कर्मफल को प्रारब्ध के रूप प्रस्तुत किया जाता है। ।। शुभं भवतु।।

== मानवता ==
आज तथाकथित कवि मानते हैं - कविता का ह्रास हो रहा रहा। जरा सोचिये कविता है क्या? सत्ता,
मानवता, पशुता, दानवता आदि ता प्रत्यय के अनगिनत शब्दों की श्रेणी में कविता भी है। बात करते है मानवता की- मानवता के प्रति सभी सजग हैं , करोड़ों दिमाग मानवता को गर्त से निकालने का उपक्रम कर रहे हैं, हर कोई मानने लगा है कि मानवता समाप्त हो चुकी है, वास्तव में ये सब कुछ ड्रामा है। जिस दिन मानवता को जान लेंगे मानवता आ जाएगी। जानहि तुमहि तुमहि हुई जाई।
ता प्रत्यय की व्यापकता समझने की जिज्ञासा ही समाधान है। '' गुण-दोष-वृत्ति-प्रवृत्ति, आचार,विचार, आहार आदि । " मानव अर्थात मनु की संतान यानि वर्णाश्रम व्यवस्था का पालन करने वाला आदि आदि , यदि हम मानव हैं तो मानवीय गुण-दोष-वृत्ति-प्रवृत्ति, आचार,विचार, आहार भी होंगे। यही तो मानवता है। पशु हैं तो पशुगत गुण-दोष-वृत्ति-प्रवृत्ति, आचार,विचार, आहार होंगे वही पशुता है । हम अपने पुरखा (मनु) की वर्णाश्रम व्यवस्था को कोसते है फिर मनु वंशज होंने का दंभ क्यों पाले हैं?

== विकल्प ने किया संकल्प का सत्यानाश ==

दर्शन-शास्त्र के अनुसार संकल्प ही प्रमुख हैं जब कि विकल्प किसी भी प्राणी को उसके गंतव्य तक नहीं पंहुचा सकते । संकल्प से दृढ इच्छा शक्ति का प्रादुर्भाव होता हैं ओर प्राणी अपने संकल्प को पूरा करने के लिए जी जान लगा देता हैं जबकि विकल्प इच्छा-शक्ति को कमजोर कर हारे पै हरि नाम का दृष्टिकोण बनाकर विकल्पों को सामने रख लेता हैं ओर कभी भी गंतव्य तक पंहुचने की इच्छा-शक्ति जागृत नहीं कर पाता ।

२१ वी शताब्दी के इस दौर में जब कि कंप्यूटर क्रान्ति का युग चल रहा हैं ऐसे में युवापीढ़ी को राष्ट्र उत्थान कि दिशा में संकल्प पूर्वक दृढ इच्छा-शक्ति के साथ आगे बदना चाहिए जबकि युवापीढ़ी अपने मनोबल को कमजोर करते हुए विकल्पों के आधार पर ऊपर बढ़ने की वजाय नीचे की ओर गिरती जा रही हैं ऐसे में भला राष्ट्रका उत्थान कैसे हो सकता हैं ? प्रत्येक अभिभावक अपनी संतान के उज्जवल भविष्य की कल्पना करते हुए उसकी अभिरुचि के अनुरूप शिक्षित करने का प्रयास करता हैं और उस दिशा में ऊँची से ऊँची डिग्री हासिल कराता हैं भले ही हाई मैरिट के लिए नक़ल माफियाओं के माध्यम से कितने ही पापड भी बेलता हैं , लेकिन उसके सारे ख्वाब तब चूर-चूर हो जाते हैं जब हाई एजुकशन प्राप्त करने के बाद भी उसका बेटा किसी inter कॉलेज में घंटा बजाने का काम करने लगता हैं और वह भी ५ लाख देने के बाद।
इन दिनों BTC की प्रक्रिया पूरे प्रदेश में चल रही है। मैरिट के आधार पर चयन हो रहा है, जिसमें ऐसे प्रतिभागी चयनित हो रहे हैं जो अपने कैरियर के अनुरूप डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक बनकर देश सेवा कर सकते थे मगर अब abc और १२३, अबस में ही सिमट कर क्या ख़ाक कर पायेंगे? बेरोजगारी के दौर की दुहाई देकर अपने से कमजोर वर्ग का हक़ मारना कहाँ का न्याय है? जब BTC की अर्हता स्नातक तो सिर्फ स्नातक को ही इस पद के अनुरूप अर्ह माना जाना चाहिए, कम या ज्यादा नहीं। 

== विलक्षण संत थे बाबा श्यामानंद ==
रामायण का अखंड पाठ हो, या भागवत अथवा सत्संग कीर्तन सभी जगह हाथ में खंजड़ी लिए तन्मय होकर नाचते हुए जो बाबा पहुच जाते थे। नुमायश पंडाल के अधिकांश कार्यक्रमों, साप्ताहिक सत्संग ‘मंगल मिलन’ व सुन्दरकांड के कार्यक्रम में जिनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। जब कोई कार्यक्रम नहीं तो सड़कों पर घूम-घूम कर नाचना, अथवा सीटी बजाकर डंडा खटकाते हुए घूमते रहना उनकी दिनचर्या थी। वे कौन थे? क्या थे? कोई नहीं जानता। ज्यादातर लोग उन्हें ‘‘पागल’’ कहते थे। क्या वे पागल थे? नहीं वे विलक्षण संत थे, इसी पुरुषोत्तम मास की पहली घड़ी में अपने अनुज बाबा कंबोदानंद से कहा ‘‘अब मैं चलता हूं।’’ छोटे भाई ने पूछा- ‘‘कहां जाओगे, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, कहीं गिर पड़ोगे।’’ उत्तर दिये बिना बाबा ब्रह्मलीन हो गये। 

इष्टसाध्य इष्टापथ में विलक्षण व्यक्तित्व समय समय पर प्रकट होते रहे हैं और कुछ न कुछ संदेश देकर चले जाते रहे हैं। इसी क्रम में 444 नौरंगाबाद इटावा में 28 फरवरी 1938 को बंशीलाल कोस्टा की धमपत्नी तिजा देवी के गर्भ से जिस शिशु का जन्म हुआ, उसका नाम श्याम लाल कोस्टा रखा गया। इसके लगभग 3 साल बाद कंबोदबाबू का जन्म हुआ। दोनों भाइयों में अगाध प्रेम यहां तक है कि बड़े भाई बाबा श्यामानंद के विरह में बाबा कंबोदानंद व्याकुल रहते हैं।
पराधीन भारत में जन्में श्यामलाल उर्फ बाबा श्यामानंद ने स्वतंत्र भारत में हाईस्कूल किया। फिर होमगार्ड में भर्ती हुए, लम्बे अर्से तक नौकरी की। इस बीच वरिष्ठ अधिवक्ता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के मुंशी भी रहे। मुशीगीरी के साथ बाबा श्यामानंद वकील साहब के पुत्रों को खिलाते और पढ़ाते भी थे। इनमें सुवीर त्रिपाठी आज अजीतमल महाविद्यालय में प्रोफेसर हैं और अरुण त्रिपाठी न्यायाधीश हैं। 
‘‘सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्या’’ वेद वाक्य को अंगीकार कर बाबा-बंधु ईश्वर के प्रति समर्पित हो गये थे। दोनों भाई ‘‘सबै भूमि गोपाल की’’ सद्धारणा से पैत्रिक घर 444 नौरंगाबाद इटावा को आश्रम मानते हुए भगवद् भक्ति में तल्लीन हो गये। भजन गाते और तन्मय होकर नाचते रहना उनकी दिनचर्या हो गई। ‘‘समर्पण भक्ति’’ के प्रतीक बाबाबन्धु (श्यामानंद और कंबोदानन्द) न केवल इटावा में ही नाचते गाते रहे बल्कि समय समय पर ढपली लेकर मथुरा, वृन्दावन, हरिद्वार, ऋषीकेश और मायानगरी मुम्बई में घूमते फिरते रहे। राजधानी दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के कार्यालय में भी भजन गाकर नाचने वाले बााब बन्धुओं के भजन की तारीफ मोतीलाल बोरा, सज्जन कुमार आदि नेताओं ने की। 
आध्यात्मिक दृष्टि से जो परमहंस की गति शास्त्रों में बताई गई, वह बाबा श्यामानंद के रहन सहन में स्पष्ट दिखाई देती थी। श्रद्धा से कोई भी व्यतिक्त जो भी दे देता, वे प्रेम से खा लेते। अच्छी बुरी हर जगह पर सो जाते। लोग पागल कहने लगे। धन तो दूर भौतिक सुख की किसी वस्तु का संग्रह नहीं किया यानी पूर्ण बीतरागी।
ढपली बजाते हुए नाचते गाते हुए विलक्षण बाबा के छवि इटावा नगर में हर व्यक्ति की आंखें में बसी हुई है। वे बाबा 19 अगस्त 2012 को माामूली बुखरी आते ही चल बसे। उनकी अंतिम इच्छा थी आश्रम में ही समाधि बनाना। बाबा कंबोदानंद ने समाधि की तैयारी की तो मुहल्ले वालों ने पुलिस को बुला लिया और यमूना तट पर अंत्येष्टि करवा दी। अब उनके फूल (अस्थि कलश) आश्रम में ही समाधि रूप में स्थापित किये जायेंगे। 



== शरीर है कंप्यूटर ==
२१ वीं सताब्दी कंप्यूटर क्रांति व सूचना प्रौद्योगिकी की चरम शताब्दी है, यदि दार्शनिक अंदाज में आध्यात्मिक रूप से परिभाषित करें तो भारतीय दर्शन आसानी से समझ में आ सकता है।
मानव एक कंप्यूटर है-
सगुणात्मक तत्व हार्डवेयर है, जिसके अंतर्गत हैं इन्द्रियां, त्वचा, रक्त, मज्जा, अस्थि आदि।
निर्गुनात्मक तत्व साफ्टवेयर है, जिसके अंतर्गत हैं मन, बुद्धि, आत्मा, अहंकार आदि।
शरीर में मस्तिष्क हार्डडिस्क है, और सारा दारोमदार इसी पर होता है । हार्ड डिस्क को नमी व डस्ट से बचाने को ac या air tite कक्ष की व्यवस्था की जाती है, ईश्वर ने मस्तिष्क की सुरक्षा के लिए सर पर बाल दिए, शास्त्रों ने और ठंडा रखने हेतु चंदन लेपन की व्यवस्था दी, फ़िर भी धूप और शीत से वचाव हेतु सर ढांके रखने की आवश्यकता महसूस की गयी । अधिक तापमान में सिस्टम हंग होने लगता है और उसी तरह दिमाग भी काम करना बंद कर देता है। कभी-कभी बात करते बक्त व्यक्ति भूल जाता है कि वह क्या कह रहा था? यही तो हंग होना है। 
जिस तरह हार्ड डिस्क अलग-अलग मैमोरी की होती है उसी तरह मस्तिष्क की भी क्षमता और गति भिन्न-भिन्न है, हार्ड डिस्क का फेल होना ही ब्रेन हेमरेज है। यदि इलाज से सुधर हो गया तो ठीक, वरना मृत्यु।
सगुणात्मक तत्व हार्डवेयर की सारी गतिविधि निर्गुनात्मक तत्व साफ्टवेयर पर निर्भर है, यानि सभी १० इन्द्रियां पूरी तरह मन के अनुसार चलतीं हैं । मन बुद्धि को प्रभावित करता है , आत्मा मुख्य रूप से कंप्यूटर की विंडो है।
कर्मेन्द्रियों-ज्ञानेन्द्रियों के प्रत्येक क्रिया कलाप व अनुभूति मस्तिष्क रूपी हार्ड डिस्क की मैमोरी में save रहती है यानि स्मृति पटल पर अंकित रहती है। 
वाइरस- जिस तरह से वाइरस कंप्यूटर को निष्क्रिय कर देता है, उसी तरह संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे वाइरस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है।