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भारतीय साहित्य की मुख्य धारा में विचार, सोच और रचना की स्वीकृति और अस्पृश्यता की यह परम्परा सदियों पुरानी है। साहित्य की सत्ता में दखल रखनेवाले ऋषियों, मनीषियों और ग्रन्थकारों ने अपनी भाषायी और यथास्थितिवादी वैचारिक दुनिया निर्मित कर ली थी, साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र बना लिया था और जो उससे अलग और असहमत होता था, वह अपनी भाषा सहित उनके लिए ‘अछूत’ बन जाता था।<ref>http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=837&pageno=1  कथा संस्कृति खंड : एक कथा विचार संपादन - कमलेश्वर]  </ref> <ref>h(contracted; show full)
मित्रांनो! आपण खोटे श्रेष्ठकनिष्ठपणाचे वाद पुरून टाकू या. '''समाजसेवा करणारा प्रत्येक जण पवित्र आहे''', हे लक्षात धरू या. हे जोपर्यंत होत नाही, तो पर्यंत मी असेच म्हणणार.<ref>http://mr.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A5%80_%E0%A4%86%E0%A4%88/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%80</ref>


==गौतम बुद्धांचा दृष्टीकोण==

' न जच्चा वसलो होती।

न जच्या होति ब्राह्माणो।।

कम्मुना होति वसलो।

कम्मुना होति ब्राह्माणो।।' 



( माणूस जन्मामुळे शूद ठरत नाही. माणूस जन्मामुळे ब्राह्माण होत नाही. माणूस आपल्या कर्मांनी शूद ठरतो. माणूस आपल्या कर्मांनी ब्राह्माण ठरतो.)  <ref>http://maharashtratimes.indiatimes.com/articleshow/3802739.cms</ref>





=={{संदर्भयादी}}==
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