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==श्री गणेश चालीसा १==
'''दोहा'''<br>
जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।<br>
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥<br>
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'''चौपाई'''<br>
जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥१<br>
जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥२<br>
(contracted; show full)श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान।३९<br>
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥४०<br>
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'''दोहा'''<br>
सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।<br>
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥<br>


A==श्री गणेश चालीसा २==
Pankja kumar roy<br>
top khana bazar<br>
munger<br>
'''दोहा'''<br>
मंगलमय मंगल करन, करिवर वदन विशाल।<br>
विघ्न हरण रिपु रूज दलन, सुमिरौ गिरजा लाल॥<br>
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'''चौपाई'''<br>
जय गणेश बल बुद्दि उजागर। व्रक्तुन्द विद्या के सागर॥१<br>
शम्भ्पूत सब जग से वन्दित। पुलकित बदन हमेश अनंदित॥२<br>
शांत रूप तुम सिंदूर बदना। कुमति निवारक संकट हरना॥३<br>
क्रीट मुकुट चंद्रमा बिराजै। कर त्रिशूल अरु पुस्तक राजै॥४<br>
ॠद्दि सिद्दि के हे प्रिय स्वामी। माता पिता माता पिता वचन अनुगामी॥५<br>
भावे मूषक की असवारी। जिनको उनकी है बलिहारी॥६<br>
तुम्हरो नाम सकल नर गावै। कोटि जन्म के पाप नसावै॥७<br>
सब मे पूजना प्रथम तुम्हारा। अचल अमर प्रिय नाम तुम्हारा॥८<br>
भजन दुखी नर जो हैं करते। उनके संकट पल मे हरते॥९<br>
अहो षडानन के प्रिय भाई। थकी गिरा तव महिमा गाई॥१०<br>
गिरिजा ने तुमको उपजायो। वदन मैल तै अंग बनायो॥११<br>
द्वार पाल की पदवी सुंदर। दिन्ही बैठायो ड्योडी पर॥१२<br>
पिता शम्भू तब तप कर आए। तुम्हे देख कर अति सकुचाये॥१३<br>
पूछैउं कौन कह्ना ते आयो। तुम्हे कौन एहि थल बैठायो॥१४<br>
बोले तुम पार्वती लाल ह्नूं। इस ड्योडी का द्वारपाल ह्नूं॥१५<br>
उनने कहा उमा का बालक। हुआ नही कोई कुल पालक॥१६<br>
तू तेहि को फिर बालक कैसो। भ्रम मेरे मन में है ऐसो॥१७<br>
सुन कर वचन पिता के बालक। बोले तुम मैं ह्नू कुलपालक॥१८<br>
या मैं तनिक न भ्रम ही कीजे। कान वचन पर मेरे दीजे॥१९<br>
माता स्नान कर रही भीतर। द्वारपाल सुत को थापित कर॥२०<br>
सो छिन में यही अवसर अइहै। प्रकट सफल सन्देह मिटाइहै॥२१<br>
सुन कर शिव ऐसे तब वचना। ह्रदय बीच कर नई कल्पना॥२२<br>
जाने के हित चरण बढाये। भीतर आगे तब तुम आये॥२३<br>
बोले तात न पाँव उठाओ। बालक से जी न रार बढाओं॥२४<br>
क्रोधित शिव ने शूल उठाया। गला काट कर पाँव बढाया॥२५<br>
गए तुम गिरिजा के पास। बोले कहां नारी विश्वास॥२६<br>
सुत कसे यह तुमने जायो। सती सत्य को नाम डुबायो॥२७<br>
तब तव जन्म उमा सब भाखा। कुछ न छिपाया शंभु सन राखा॥२८<br>
सुन गिरिजा की सकल कहानी। हँसे शम्भु माया विज्ञानी॥२९<br>
दूत भद्र मुख तुरंत पठाये। हस्ती शीश काट सो लाये॥३०<br>
स्थापित कर शिव सो धड़ ऊपर। किनी प्राण संचार नाम धर॥३१<br>
गणपति गणपति गिरिजा सुवना। प्रथम पूज्य भव भयरूज दहना॥३२<br>
साई दिवस से तुम जग वन्दित। महाकाय से तुष्ट अनन्दित॥३३<br>
पृथ्वी प्रद्क्षिणा दोउ दीन्ही। तहां षडानन जुगती कीन्ही॥३४<br>
चढि मयूर ये आगे आगे। व्रक्तुन्द सो तुम संग भागे॥३५<br>
नारद तब तोहिं दिय उपदेशा। रहनो न संका को लवलेसा॥३६<br>
मातापिता की फेरी कीन्ही। भू फेरी कर महिमा लीन्ही॥३७<br>
धन्य धन्य मूषक असवारी। नाथ आप पर जग बलिहारी॥३८<br>
डासना पी नित कृपा तुम्हारी। रहे यही प्रभू इच्छा भारी॥३९<br>
जो श्रधा से पढे ये चालीस। उनके तुम साथी गौरीसा॥४०<br>
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'''दोहा'''<br>
शंबू तनय संकट हरन, पावन अमल अनूप।<br>
शंकर गिरिजा सहित नित, बसहु ह्रदय सुख भूप।<br>

==श्री गणेश चालीसा ३==
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<br><br>'''दोहा'''<br>
जय जय जय वंदन भुवन, नंदन गौरिगणेश । <br>
दुख द्वंद्वन फंदन हरन,सुंदर सुवन महेश ॥ <br><br>
'''चौपाई'''<br>
(contracted; show full)जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा 
माता जाकी पार्वती पिता महादेव

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