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==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण ==
आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प(contracted; show full)ाते हुए भाग खडा हुआ। जंगल में बेहाल वह घास फूस खाकर समय काटने लगा। उसे याद आया माँ ने कहा था - जीवन में जब भारी संकट आये कोई सहारा न दिखे तब अंगूठी से उपदेश-पत्र निकल कर पढ़ लेना। उसने तत्काल उपदेश-पत्र निकाला , जिसमें १ श्लोक था , भावार्थ इस तरह है- संग (आसक्ति) सर्वथा त्याज्य है यदि संग त्यागना मुश्किल हो तो सतसंग करो, कामना सर्वथा त्याज्य है यदि संभव न हो तो मोक्ष की कामना करो। 
उक्त उपदेश ही हम सभी लोगों को विद्या- अविद्या का भेद बताता है।
उक्त मदालसा उपाख्यान को पढ़ें, गुनें यही आत्मतत्व का सार है। 


==संस्कार द्वारा ही व्यवस्था परिवर्तन संभव ==

भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के संकल्प को लेकर जो आन्दोलन शुरू हुआ था, वह स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के चलते भ्रष्ट-सियासी सोच में उलझ गया है। सब चाहते है संसदीय जनतंत्र को सदाचारी होना चाहिए, किन्तु कैसे? इस प्रश्न के जवाब में संस्कारपरक कार्ययोजना की जरूरत है। जिसका प्रेरक है पौराणिक प्रह्लाद प्रसंग। जब हिरण्यकश्यप की कुशासनिक व्यवस्था परिवर्तन हो सकता है तो नित नये घोटालों देने वाली भ्रष्ट व्यवस्थ...ा परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता?
हिरण्यकश्यप की कुशासनिक व्यवस्था में हाहाकार मचा था। रानी कयाधू का देवराज इन्द्र ने हरण किया। कयाधू का गर्भस्थ बालक वंशानुक्रम गुण दोषों के आधार पर हिरण्यकश्यप का ‘बाप’ होगा। यानी ऐसे दैत्यराज का जन्म से पहले ही बध करना होगा, यह सोचकर इन्द्र भ्रूणहत्या करना चाहते थे। इस बीच देवर्षि नारद ने इन्द्र को अनर्थ करने से रोक दिया- ‘‘संस्कार द्वारा ही व्यवस्था परिवर्तन संभव है, हिंसा से नहीं। कयाधू मेरे हवाले कर दो, मैं गारंटी लेता हूं कि भावी दैत्यसुत देवत्व संपन्न होगा।’’
कयाधू को लेकर देवर्षि नारद अपने आश्रम में ले गये। वहां एक शिक्षक की भांति कयाधू को पढ़ाने लगे। वे जानते थे कि पतिव्रता कयाधू को नहीं बदल सकते, उनकी ध्येय गर्भस्थ शिशु को सद्संस्कार देकर शिक्षित करना था। वे उसमें सफल भी हुए। पाठ्यक्रम पूरा होते ही कयाधू को नारद ने वापस भेज दिया। प्रह्लाद जन्मना ही देवत्वपूर्ण था, देवर्षि की दृढ़ इच्छाशक्ति के आधार पर सत्यनिष्ठा के प्रताप से ही व्यवस्था परिवर्तित हुई।
आज भावी पीढ़ी को कदाचारी प्रवृत्ति से बचाने की जरूरत है, वह भी सद्संस्कारों से, ताकि आने वाला समय भष्टाचार मुक्त हो सके।
भ्रष्टाचार के बीजारोपण भावी पीढ़ी में कुसंस्कार के रूप देने वाले कोई और नहीं, हम शिक्षक ही हैं। सरकारी नौकरी के लिए मैरिट जरूरी है, अभिभावक उच्चमैरिट के लिए जुगाड़ लगाता है, लोभी शिक्षक सुविधाशुल्क के बदले अच्छी मैरिट की गारंटी ले लेते है। बच्चे में यह कुसंस्कार नहीं तो क्या है। 
किसी भी कार्यसिद्धि के लिए सिफारिश और जुगाड़ की मानसिकता ही भ्रष्टाचार की श्रेणी में आती है, लिहाजा अनासक्त-सत्यनिष्ठ कर्मयोगियों को नारद नीति के तहत आध्यात्मिक शैली में अभियान चलाना होगा। याद करें व्यवस्था का बदलने के लिए शिक्षा को ही सहज रास्ता माना जाता रहा है। मैकाले का घोषणापत्र हो या आरएसएस की शिशुमंदिर योजना अथवा मदरसों में सिमी के माध्यम से धर्मान्धता का बीजारोपण। 
शैशव, बाल, किशोर व युवा वर्ग में सदाचार के लिए नैतिक शिक्षा का पाठ्यक्रम लंबे समय तक रहा मगर कोई असर नहीं पड़ा। क्योंकि नैतिक शिक्षा का पाठ्यक्रम शासन स्तर पर था। क्या हिरण्यकश्यप ब्रह्मनिष्ठा का पाठ्यक्रम ला सकता था, ब्रह्मनिष्ठा के सद्संस्कार देवर्षि नारद ने दिये। उसी आधार पर सत्यनिष्ठ कर्मयोगियों को अनासक्त भाव से नारदनीति को नजीर बनाकर चाणक्यनीति का अनुपालन करते हुए भावी पीढ़ी की मानसिकता से भ्रष्टाचार के दूषित बायरस को मिटाने के लिए सद्संस्कार रूपी ऐण्टीवायरस का प्रयोग करना होेगा।
कार्य योजना के तहत सभी जगह सत्यनिष्ठजनों की टीम बनाई जायेगी। जो निकटवर्ती शिक्षण संस्थाओं में जाकर सप्ताह में एक वार संयुक्त कक्षा लेकर सन्मार्ग दिखाते हुए भारत के भविष्य को स्वच्छ बनाने का प्रयास करेंगे। यह अभियान दीर्घकालिक ही नहीं निरंतर प्रक्रिया हो जायेगी, बिल्कुल पल्स पोलियो अभियान की तरह। पालियो के विषाणु मारे जा सकते हैं तो भ्रष्टाचार के क्यों नहीं? सदाचारी मानसिकता की भावी पीढ़ी शासन- प्रशासन में दाखिल होगी, तो व्यवस्था परिवर्तन का अहसास होने लगेगा।See More


==आरक्षण है बैशाखी?==

प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर सियासत उग्र होती जा रही है। अनुसूचित जाति-जन जाति के लिए तरक्की में आरक्षण के प्रावधान संबंधी बिल के साथ ही ओबीसी आरक्षण की मांग और अल्पसंख्यकों के निमित्त सच्चर कमेटी व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों से जुड़े मुद्दे भी उठने लगे हैं। जातिवाद की उठती आग की ज्वाला में झुलते समाज में जातीय उन्माद सामने दिखाई देने लगा है।
‘‘आरक्षण’’ का प्रावधान अनुसू...चित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्ग के लोगों का स्तर ऊपर उठाने के लिए किया गया था। आजादी के 6 दशक बाद भी सामाजिक न्याय का रोना आखिर क्यों? क्योंकि आरक्षण बैशाखी का रूप ले चुका है अच्छी व स्वस्थ मानसिक व बौद्धिक क्षमता सम्पन्न होते हुए भी यह आरक्षण रूपी बैशाखी सामाजिक न्याय के नाम पर ‘अपंग’ बना रही है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो सामाजिक स्तर पर ‘गरीबी’ की तरह ‘पिछड़ेपन’ की सीमा भी बढ़ती जायेगी।
स्कूल में दाखिले में भी आरक्षण रूपी बैशाखी लगाई गई। शिक्षार्जन की दिशा में समानता का पहला मौका मिला, तो अब बैशाखी हट जानी चाहिए। नहीं, पढ़ने के बाद अंकोें की विसमता को पाटने में भी यही बैशाखी काम आती है। आरक्षण रूपी सरकारी नौकरी पाकर भी सामाजिक न्याय नहीं मिला तो तरक्की की सीढ़ियों के लिए भी बैशाखी का प्रयोग यह सिद्ध करता है, मानसिकता में घर कर चुका पिछड़ापन जीवन के अंतिम चरण तक बैशाखी की आवश्यकता तय कर रहा है। सोचने की बात है जब सरकारी नौकरी मिल गई जो सामाजिक, आर्थिक जीवन स्तर तो समान हो गया तो प्रमोशन में आरक्षण रूपी आरक्षण की क्यों पड़ी आवश्यकता? जिस तरह गरीबी हटाओ अभियान वर्षों से चल रहा है जिसने कितनों को मालामाल कर दिया और गरीबी बढ़ती चली गई, उसी तरह सामाजिक न्याय के नाम पर ‘‘अन्यायपरक सिद्धान्त’’ पिछड़ेपन की खाई गहरी करता जा रहा है।See More


==चर्पट पंजरिका==

सुबह शाम दिन-रात बहु, आत जात ऋतु मास।
काल चक्र में आयु क्षय, तजी न फिर भी आस॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

आग घाम तन लाभ को, ठोड़ी घुटुवन चांप।
हाथ कटोरा वास वन, तजी ना आसा आप॥
(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है।