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==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण ==
आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प(contracted; show full)
इन दिनों BTC की प्रक्रिया पूरे प्रदेश में चल रही है। मैरिट के आधार पर चयन हो रहा है, जिसमें ऐसे प्रतिभागी चयनित हो रहे हैं जो अपने कैरियर के अनुरूप डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक बनकर देश सेवा कर सकते थे मगर अब abc और १२३, अबस में ही सिमट कर क्या ख़ाक कर पायेंगे? बेरोजगारी के दौर की दुहाई देकर अपने से कमजोर वर्ग का हक़ मारना कहाँ का न्याय है? जब BTC की अर्हता स्नातक तो सिर्फ स्नातक को ही इस पद के अनुरूप अर्ह माना जाना चाहिए, कम या ज्यादा नहीं। 


==विलक्षण संत थे बाबा श्यामानंद==
रामायण का अखंड पाठ हो, या भागवत अथवा सत्संग कीर्तन सभी जगह हाथ में खंजड़ी लिए तन्मय होकर नाचते हुए जो बाबा पहुच जाते थे। नुमायश पंडाल के अधिकांश कार्यक्रमों, साप्ताहिक सत्संग ‘मंगल मिलन’ व सुन्दरकांड के कार्यक्रम में जिनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। जब कोई कार्यक्रम नहीं तो सड़कों पर घूम-घूम कर नाचना, अथवा सीटी बजाकर डंडा खटकाते हुए घूमते रहना उनकी दिनचर्या थी। वे कौन थे? क्या थे? कोई नहीं जानता। ज्यादातर लोग उन्हें ‘‘पागल’’ कहते थे। क्या वे पागल थे? नहीं वे विलक्षण संत थे, इसी पुरुषोत्तम मास की पहली घड़ी में अपने अनुज बाबा कंबोदानंद से कहा ‘‘अब मैं चलता हूं।’’ छोटे भाई ने पूछा- ‘‘कहां जाओगे, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, कहीं गिर पड़ोगे।’’ उत्तर दिये बिना बाबा ब्रह्मलीन हो गये। 

इष्टसाध्य इष्टापथ में विलक्षण व्यक्तित्व समय समय पर प्रकट होते रहे हैं और कुछ न कुछ संदेश देकर चले जाते रहे हैं। इसी क्रम में 444 नौरंगाबाद इटावा में 28 फरवरी 1938  को बंशीलाल कोस्टा की धमपत्नी तिजा देवी के गर्भ से जिस शिशु का जन्म हुआ, उसका नाम श्याम लाल कोस्टा रखा गया। इसके लगभग 3 साल बाद कंबोदबाबू  का जन्म हुआ। दोनों भाइयों में अगाध प्रेम यहां तक है कि बड़े भाई बाबा श्यामानंद के विरह में बाबा कंबोदानंद व्याकुल रहते हैं।
पराधीन भारत में जन्में श्यामलाल उर्फ बाबा श्यामानंद  ने स्वतंत्र भारत में हाईस्कूल किया। फिर होमगार्ड में भर्ती हुए, लम्बे अर्से तक नौकरी की। इस बीच वरिष्ठ अधिवक्ता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के मुंशी भी रहे। मुशीगीरी के साथ बाबा श्यामानंद वकील साहब के पुत्रों को खिलाते और पढ़ाते भी थे। इनमें सुवीर त्रिपाठी आज अजीतमल महाविद्यालय में प्रोफेसर हैं और अरुण त्रिपाठी न्यायाधीश हैं। 
‘‘सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्या’’ वेद वाक्य को अंगीकार कर बाबा-बंधु ईश्वर के प्रति समर्पित हो गये थे। दोनों भाई ‘‘सबै भूमि गोपाल की’’ सद्धारणा से पैत्रिक घर 444 नौरंगाबाद इटावा को आश्रम मानते हुए भगवद् भक्ति में तल्लीन हो गये। भजन गाते और तन्मय होकर नाचते रहना उनकी दिनचर्या हो गई। ‘‘समर्पण भक्ति’’ के प्रतीक बाबाबन्धु (श्यामानंद और कंबोदानन्द) न केवल इटावा में ही नाचते गाते रहे बल्कि समय समय पर ढपली लेकर मथुरा, वृन्दावन, हरिद्वार, ऋषीकेश और मायानगरी मुम्बई में घूमते फिरते रहे। राजधानी दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के कार्यालय में भी भजन गाकर नाचने वाले बााब बन्धुओं के भजन की तारीफ मोतीलाल बोरा, सज्जन कुमार आदि नेताओं ने की। 
आध्यात्मिक दृष्टि से जो परमहंस की गति शास्त्रों में बताई गई, वह बाबा श्यामानंद के रहन सहन में स्पष्ट दिखाई देती थी। श्रद्धा से कोई भी व्यतिक्त जो भी दे देता, वे प्रेम से खा लेते। अच्छी बुरी हर जगह पर सो जाते। लोग पागल कहने लगे। धन तो दूर भौतिक सुख की किसी वस्तु का संग्रह नहीं किया यानी पूर्ण बीतरागी।
ढपली बजाते हुए नाचते गाते  हुए विलक्षण बाबा के छवि इटावा नगर में हर व्यक्ति की आंखें में बसी हुई है। वे बाबा 19 अगस्त 2012 को माामूली बुखरी आते ही चल बसे। उनकी अंतिम इच्छा थी आश्रम में ही समाधि बनाना। बाबा कंबोदानंद ने समाधि की तैयारी की तो मुहल्ले वालों ने पुलिस को बुला लिया और यमूना तट पर अंत्येष्टि करवा दी। अब उनके फूल (अस्थि कलश) आश्रम में ही समाधि रूप में स्थापित किये जायेंगे। 



==शरीर है कंप्यूटर==
२१ वीं सताब्दी कंप्यूटर क्रांति व सूचना प्रौद्योगिकी की चरम शताब्दी है, यदि दार्शनिक अंदाज में आध्यात्मिक रूप से परिभाषित करें तो भारतीय दर्शन आसानी से समझ में आ सकता है।
मानव एक कंप्यूटर है-
सगुणात्मक तत्व हार्डवेयर है, जिसके अंतर्गत हैं इन्द्रियां, त्वचा, रक्त, मज्जा, अस्थि आदि।
निर्गुनात्मक तत्व साफ्टवेयर है, जिसके अंतर्गत हैं मन, बुद्धि, आत्मा, अहंकार आदि।
(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है।