Difference between revisions 6160 and 6165 on hiwikibooks==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण == आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प(contracted; show full)शरीरं गृहे। पूजा ते विविधोपभोग रचना निद्रा समाधिस्थितिः।। संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो। यद्यत्कर्मं करोमि तत्तदखिलं शंभो! तवाराधनम्।।’’ शरीर रूपी मंदिर में परमात्मतत्व तू शिव ही आत्मा, प्रकृति/माया स्वरूपिणी पार्वती बुद्धि, सहयोगीगण प्राण है विभिन्न भोग उपयोग रचना यानी क्रिया ही पूजा तथा समाधि की स्थिति नींद है। पैरो का संचार यानी चलना ही परिक्रमा और हर प्रकार की ध्वनि यानी वाणी स्तुतिगान है। हे प्रभु! इस तरह मैरे द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कर्म आपकी आराधना है। - देवेश शास्त्री ==कोई नहीं जाता खाली हाथ== सब कुछ समेट के ले जाना पड़ता है ‘‘जो जस करहि सो तस फल चाखा।’’ यानी कर्मगति को ही प्रारब्ध कहा गया है। ‘‘राम कीन्ह चाहइ सोइ होई।’’ यानी परमात्मा जो चाहता है वही होता है। दोनों कथन विरोधाभासी प्रतीत हो रहे हैं लेकिन हैं नहीं। गीता मंे योगेश्वर कृष्ण कहते हैं- ‘‘कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्।’’ स्पष्ट है कि कर्मानुसार फल देना परमात्मा के अधीन है। दर्शनशास्त्र इसी कर्मसिद्धांत को परिभाषित करते है। अर्थात् हम स्वयं अपनी अगली योनि के नियंता हैं, कोई और नहीं। शरीर छोड़कर जीवात्मा अपने साथ वह सब कुछ ले जाता है, जो उसने सजोया है। ‘‘मुट्ठी बांधे आये जग में हाथ पसारे जायेगा।’’ मिथ्या मिथक है। मुट्ठी बांधे यानी सबकुछ अपने साथ ले जाना पड़़ता है। आपने जो भौतिक वस्तुओं का संग्रह किया है, क्या वह तुम्हारे साथ जायेगा? इस प्रश्न का सहज में जवाब है ‘नहीं।’ लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो कहेंगे- हां, कोई खाली हाथ नहीं नहीं जाता। सब कुछ समेटकर जे जाना पड़ता है। कैसे? विद्वान कहते हैं कि पाप-पुण्य ही साथ जाता है, यानी सद्धर्म जन्य पुण्य और अधर्म जन्य पाप के आधार पर ही जन्म जन्मान्तर के प्रारब्ध का निर्धारण ईश्वर करता है। जब ईश्वर अंश जीव अविनाशी है, तो प्रत्यक्ष रूप से जीव ही अपना प्रारब्ध रच रहा है। पाप-पुण्य उस ‘क्रेडिट कार्ड’ की तरह है, जो संचित भौतिक संपदा को जन्मान्तर में सहेजकर पहुंचाता है। भौतिक संपदा का उपार्जन धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय, सत्- असत्, नीति-अनीति से होता है, जिनका ‘क्रेडिट’ पुण्य और पाप हुआ। ‘परलोकात् भयम्’ ही युग युगान्तर सन्मार्गगामी काल खंड रहा। अन्याय, अधर्म और अनीति से डरते हुए लोग कह देते थे- हम बाल-बच्चेदार हैं। यानी परलोक का भय था, जो व्यवहार में हमें सन्मार्ग से विचलित नहीं होने देता था। पाप-पुण्य ही साथ जाने के सूत्र का रहस्य भौतिक सम्पदा साथ ले जाना है। उदाहरण के रूप में एक अतिविपन्न परिवार में उत्पन्न शिशु अपने पूर्वकृत कर्मों के पुण्य की क्रकडिट पर पढ़-लिखकर उच्चपद पा लेता है। हालात बदलते हंै, विपन्नता दूर हो जाती है। भौतिक संपदा चारों ओर घेर लेती है। यानी वह अपने पूर्वजन्म की ही संपदा को भोगने लगता है। दूसरी ओर एक अतिसंपन्न धनाढ्य व्यक्ति मरता है, लगता है वह अपनी भौतिक सम्पदा यहीं छोड़कर गया है, वह सन्तान के अपने पाप की क्रेडिट पर व्यसनागत प्रवृत्ति से नष्ट होती जाती है, और वह भुखमरी की स्थिति में पहंुच जाता है। यही तो संपदा के हस्तान्तरण की प्रक्रिया है। यहां यह सूक्ति प्रासंगिक है-‘‘पूत कपूत तो का धन संचय?’’ ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की दशा और प्रभाव ‘कर्म’ पर केन्द्रित है। अमुक का ‘‘राजयोग’’ है, देखते ही देखते वह पीएम या सीएम अथवा उच्चपदस्थ अधिकारी हो गया। राजवैभव आ गया, वह वैभव पूर्वजन्म के अर्जित पुण्य का प्रभाव था, जो वह अपने साथ लाया था। काफी समय उसने वैभव भोग किया और किसी सामाजिक, आर्थिक अथवा राजनैतिक अपराध में फंस गया, जेल जाना पड़ा। भौतिक संपदा दूर हो गई, जन सामान्य की दृष्टि से पतित हो गया। कहा- अनिष्ट ग्रह की कुदृष्टि का प्रभाव है। वास्तव में संचित पुण्य की पूंजी समाप्त होते ही संचित पाप का प्रभाव ही अनिष्ट ग्रह की कुदृष्टि के रूप में परिभाषित की गई। यहां एक प्रसंग दृष्टव्य है- एक सेठ ऋणदाता के रूप मंे प्रख्यात थे, याचक जब चाहे अदा करे। यहां तक कि अगले जन्म में अदा करने की शर्त पर भी ऋण मिलता था। एक व्यक्ति आया और उसने दो लाख रुपये की याचना की और अगले जन्म में अदायगी का वायदा किया। धन मिल गया। वह व्यक्ति रकत लेकर रात में अपने मित्र के घर पर रुक गया। वहां रात में उसने दो बैलों के वार्तालाप को सुना- ‘मेरा कर्ज तो अदा हो गया और मैं मुक्त हो गया’ दूसरा बोला- ‘मेरे भी 300 रुपये शेष हैं मै भी जल्दी मुक्त हो जाऊंगा।’ सुबह हुई, पहला बैल फिसलकर गिरा और मर गया। जोड़ी टूट गई मित्र के धर लोग संवेदना व्यक्त करने आने लगे। किसी ने कहा-‘आपका एक बैल किस काम का, बेचोगे? हां, 300 रुपये दूं। लाओ। 300 रुपये देकर बैल लेकर वह चला कुछ दूर जाते ही वह भी गिर गया, मर गया। यह सब कुछ देखकर वह व्यक्ति सोचने लगा। अगले जन्म की अदायगी की शर्त पर लिये कर्ज के भुगतान के लिए मुझे भी कितने जन्मों तक इस दौर से गुजरना पड़ेगा? पाप और पुण्य के क्रेडिट कार्ड से अपनी भौतिक संपदा के हस्तान्तरण की प्रक्रिया का ही प्रभाव है कि प्रारब्ध वश एक कुत्ता एसी में मेम की गोद में रहता कीमती बिस्किट व अन्य भोज्य खाता वहीं दूसरा भोजन की जुगाड़ में कदम कदम पर डंडे खाता। स्पष्ट है कि आज हम जो भी भौतिक संपदा सजो रहे हैं। वह पाप और पुण्य के क्रेडिट कार्ड के रूप में समेटकर ले जायेंगे। -- देवेश शास्त्री⏎ ⏎ ⏎ ==अहं भाव का आत्मरूप ही देवत्व== अहंकार है‘‘अंतश्चतुष्ट्य’’मन, चित्त, बुद्धि के मध्यस्थ का अवयव जो करता है अंतश्शत्रु का मुकाबला रामायण काल में दो बलिष्ट पात्र हनुमान और रावण हैं, रावणं अहंकारी है- ‘मेरी इन बड़ी भुजाओं ने कैलाश पहाड़ उठाया है, दानव मय इंद्र कुबेर बरुण इन बाणों से थर्राया है।’ यानी सफलता का हर पक्ष अहं से सराबोर है। दूसरी ओर हनुमान जी प्रत्येक सफलता के पीछे ईश्वरीय कृपा को श्रेय देते हैं-‘लांधि सिंधु हाटक पुर जारा, निशिचर गन वधि विपिन उजारा, सो सब तब कृपालु प्रभुताई, नाथ न कछू मोर प्रभुताई(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है। All content in the above text box is licensed under the Creative Commons Attribution-ShareAlike license Version 4 and was originally sourced from https://hi.wikibooks.org/w/index.php?diff=prev&oldid=6165.
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