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==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण ==
आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प्रतिकूलता दुःख । अनासक्त भाव को इस तरह देखें - आसक्ति व विरक्ति दोनों से श्रेष्ठ है अनासक्ति, जिससे परमानंद की अनुभूति होती है। आत्मदृष्टा जब अंतर्मुखी हो जाता है परमात्मरूप ( videh) प्रतीत होता है , उसकी हर गतिविधि रहस्य प्रतीत होती है ।

==संकल्प का अभाव क्यों?==

आज हम विकल्पों में उलझकर संकल्प-शक्ति से दूर जा चुके हैं, संकल्प वह अजस्र ऊर्जा संपन्न साधना है, जो प्रत्येक ‘कल्पना’ को साकार बना सकता है। संकल्प से दूरी का मुख्य कारण वैकल्पिक जगत रूपी ‘मायाजाल’ में चित्त का उलझाव।
राष्ट्रपिता बापू ने ‘रामराज्य’ की कल्पना की, वे संकल्पित भाव से उस पथ पर आगे बढ़े, कदाचारी ब्रिटिश हुकूमत से आजाद होना, उसी संकल्प शक्ति का परिणाम था। रामराज्य से तात्पर्य सुशासन से है, ‘‘नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लक्षन हीना।। सब नर करहि परस्पर प्रीती। चलहि सुधर्म निरत सब नीती।’’ बैसे तो तुलसीबाबा ने रामराज्य का विस्तार से वर्णन किया मगर ये चैपाई यदि हमारा ‘संकल्प’ बन जायें तो सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना, कहीं भी गरीबी नहीं। गरीबी ही ‘विश्वगुरु भारत’ की सबसे बड़ी कमजोरी है। जिसका कारण है अशिक्षा-‘नहिं कोउ अबुध न लक्षन हीना’ सभी शिक्षित और सद्गुणों से युक्त हों। ये हमें सौहार्द से प्राप्त होगा, वैमनस्यता से शिक्षा व सदगुण नहीं आ सकते-‘सब नर करहि परस्पर प्रीती’ पारस्परिक सौहार्द्र निरन्तर धर्म और नीति से ही संभव हैं-‘चलहि सुधर्म निरत सब नीती।’
धर्म का अर्थ हिन्दू-इस्लाम-ईसाई- जैन-बौद्ध-पारसी आदि से नहीं। नैतिक मर्यादा की लक्ष्मण रेखा में कर्तव्य परायणता अर्थात सदाचार। आचरण ही धर्म है ‘आचारः परमो धर्मः, सत् को श्रेष्ठ धर्म कहा गया है ‘धर्म न दूसर सत्य समाना’ सत् और आचरण रूपी धर्म का संगम (सन्धि) है सदाचार। जिसका उद्गम बताया गया है-परहित। ‘‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई।’’
जनकल्याण की दिशा में संकल्पित होकर ‘सदाचार’ हमें रामराज्य स्थापित करने के बापू की कल्पना को साकार किया जा सकता। बापू का संदेश ‘जो परिवर्तन लाना चाहते हो स्वयं उसका हिस्सा बनो अर्थात् उसे धारण करो’ ऐसा संकल्प है, जिसके बूते पर स्वयं सत्य-अहिंसा को धारण करके बापू ने 90 वर्ष जले ‘‘महाभारत’’ (स्वतंत्रता संग्राम) का परिणाम स्वरूप स्वाधीनता दिलाई। कल्पना थी रामराज्य लाने की। आज उनके अनुयायी ‘रावणराज्य’ कायम किये हंै। 
‘रावणराज्य’ यानी लूटमार, अनाचार अत्याचार, व्यभिचारादि कदाचार का बोलबाला। हम विकल्प के मकड़जाल में उलझे हैं, लगातार  सत्ता परिवर्तन करते हुए कदाचार की गिरफ्त में हैं। क्योंकि संकल्प का अभाव है। इस वक्त जो भी क्रियाकलाप सामने दिखाई दे रहे हैं, स्वयं हमारे द्वारा बुना गया वैकल्पिक मकड़जाल है। मकड़ी अपनी लार से जाल पूरती है, और फिर उसी मंे फंसकर जान गवां देती है, लेकिन संकल्प शक्ति के बूते पर कुछेक मकड़ीं अपनी लार से बुने गये जाल को पुनः स्वयं में समाहित कर लेतीं है। यही ईश्वरीय सत्ता का वेदान्तगत संकल्प है। 
वेदवाक्य ‘‘सत्यमेव जयते’’ को ‘दर्शन’ मानकर उसका पहल संकल्प पर आधारित है। कोई भी व्यक्ति किसी पद पर आरूढ़ होता है, तब वह सत्यनिष्ठा की शपथ लेता है। और उसका रत्ती भर भी अनुपालन नहीं करता। 
‘‘शपथ और संकल्प’’ में अंतर है? ‘हां’ है। शपथ और औपचारिकता है, जो वाणी (जुवान) तक सीमित है, जबकि संकल्प अंतरात्मा की वह धारणा है, जो अष्टांगयोग का छटवां अंग है। जिसकी अगली सीढ़ी ‘ध्यान’ है। संकल्प रूपी धारणा हमें कभी घ्यानभंग नहीं देती। 
बैसे व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्षरत करोड़ों लोगों से जब ‘‘संकल्प’’ की बात कही जाये कि ‘‘मैं किसी भी काम के लिए रिश्वत नहीं दूंगा, और न लूंगा। मैं किसी की भी सिफारिश नहीं मानूंगा और न सिफारिश करूंगा। कर्तव्यपरायणता ही धर्म है, लिहाजा ‘‘कामचोरी’’ नहीं करूंगा। किसी के दबाव में गलत काम नहीं करुंगा, और न गलत काम के लिए किसी को विवश करूंगा। अपने संचित कर्मों के फल स्वरूप प्रारब्ध को स्वीकार करते हुए संतुष्ट रहूंगा।’’ तो कितने लोग संकल्प लेंगे? एक भी प्रतिशत नहीं, हां, कहीं लाखों में एकाध ही संकल्प रूपी धारणा पर घ्यान केन्द्रित करेंगे।
आखिर ऐसी क्यों? यदि सवा अरब की आबादी वाला भारतवर्ष दृढ़ संकल्पित हो जाये तो बापू के रामराज्य यानी ‘‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’’ की संकल्पना साकार हो जायेगी। 
‘‘रिश्वत लेना पाप है
पर देना अभिशाप।
लेना-देना बंद हो,
तभी मिटे संताप।।’’
जब हर कोई स्वार्थ और महत्वाकांक्षा त्यागकर सत्यनिष्ठा के संकल्प पर केंद्रित होगा। तो लूटमार करने वाले बाल्मीकि और अंगुलिमाल सरीखे कदाचारी लोग भी ‘‘महर्षि व भिक्षु’’ बन जायेंगे। आयें असीम ऊर्जास्पद संकल्पशक्ति जगायें


==कार्य ही पूजा है!==
वर्क इज वर्शिप, भरतीय षड्दर्शन, प्रस्थानत्रय (गीता, वेदान्त, ब्रह्मसूत्र) आदि सभी धर्मग्रंथ कर्म सिद्धांत को प्रतिपादित करते हैं। इसी आधार पर कार्य को पूजा की संज्ञा दी गई है। कृ धातु में यत् प्रत्यय के साथ शब्द बना कार्य। कार्य से तात्पर्य है, करने योग्य। यथा पाठ्य-पढ़ने योग्य, पूज्य- पूजा के योग्य, दृश्य- देखने के योग्य। 
(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है।