Difference between revisions 6174 and 6183 on hiwikibooks==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण == आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प(contracted; show full)शरीरं गृहे। पूजा ते विविधोपभोग रचना निद्रा समाधिस्थितिः।। संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो। यद्यत्कर्मं करोमि तत्तदखिलं शंभो! तवाराधनम्।।’’ शरीर रूपी मंदिर में परमात्मतत्व तू शिव ही आत्मा, प्रकृति/माया स्वरूपिणी पार्वती बुद्धि, सहयोगीगण प्राण है विभिन्न भोग उपयोग रचना यानी क्रिया ही पूजा तथा समाधि की स्थिति नींद है। पैरो का संचार यानी चलना ही परिक्रमा और हर प्रकार की ध्वनि यानी वाणी स्तुतिगान है। हे प्रभु! इस तरह मैरे द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कर्म आपकी आराधना है। - देवेश शास्त्री ==सकारात्मक दिशा में उठने लगी ‘भाव-चक्र’ सुनामी== सामवेद में उल्लेख है कि भाव- प्रवाह उसी तरह अपना सर्किल पूरा करता है, जिस तरह विद्युत- प्रवाह। भाव प्रवाह से उत्पन्न होता है गायन। गायन में है मोम को पिघलाने, पानी में आग लगाने और बादल बुलाकर जलवृष्टि करने की अपरिमित शक्ति। विद्युत (ऊर्जा) प्रवाह की भांति एक बार फिर भाव प्रवाह अपना सर्किल पूरा करते हुए ऐसी भावात्मक ‘‘सुनामी’’ ला रहा है, जो जन-मन के ‘व्यवस्था परिवर्तन लक्ष्य’ लक्ष्य पर ले जायेगा। आखिर भाव प्रवाह है क्या? भाव यानी वैचारिक तरंग। यहां यह दृष्टांत प्रासंगिक है- एक राजा ने सार्वजनिक आदेश दिया कि समूची प्रजा रात में अमुक तालाब में एक-एक कलश दूध डालेगा, इस तरह पवित्र ‘दुग्ध-सरोवर’ तैयार हो जायेगा। मगर सुबह देखा तो सूखा तालाब लबालब तो था मगर दूध से नहीं, पानी से। ऐसा क्यांे? यही भाव प्रभाव है। एक ने सोचा -‘‘जब सब लोग दूध डालेंगे तो मेरा एक कलश पानी पता ही नही चलेगा।’’ यह विचार (भाव) किसी एक का नहीं, समूची प्रजा का बना। यानी भाव प्रवाह ने अपना सर्किल पूरा किया। पूर्णिमा की उज्ज्वल चांदनी रात में पानी का अर्पण भी सफेदी से पूरित प्र्रतीत हो रहा था, लिहाजा प्रत्येक व्यक्ति को यही लगा कि मेरे अलावा सभी दूध डाल रहे हैं।इस प्रसंग को आज के हालात में भावात्मक संजीदगी के जोड़ और भाव प्रवाह की उठती ‘‘सुनामी’’ की अनुभूति करें! भ्रष्टाचार से आहत जन मानस आक्रोशित है, लंबे अर्से से व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्षात्मक भाव बनते रहे हैं, भाव प्रवाह शुरू होता रहा मगर अपना सर्किल पूरा न कर सका। एक बार फिर उठा है, आशावादी दृष्टि से यह भाव प्रवाह अपना सर्किल पूरा करेगा। व्यवस्था परिवर्तन की सुनामी के लिए तथाकथित राजनैतिक विकल्प ही इस भाव- प्रवाह का उद्गम बिन्दु होगा। अरविन्द केजरीवाल ने दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ राजनैतिक विकल्प देने की शुरूआत जन सामान्य में मौजूदा सियासी जमात के गुप्त भावात्मक राज (मनोवृत्ति) को उजागर करना शुरू किया। सत्ताधारी संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रावर्ट वाड्रा की मनोदशा को बेपर्दा किया। जाकिर हुसैन ट्रस्ट को प्रतीक बनाकर ट्रस्टाधीशों की मनोवृत्ति से पर्दा उठाने की शुरूआत की, इसके साथ ही मुख्य विपक्षी भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी के गोरखधंधे को उजागर किया। इन तीन बिन्दुओं पर विद्युत प्रवाह की तरह भाव-प्रवाह तीब्र गति पकड़ने लगा। प्रथम बिन्दु वाड्रा पर वरिष्ठ सपा नेता आजम खां ने एक कदम आगे बढ़कर कोमनबेल्थ खेल घोटाले में भी वाड्रा को घसीट दिया। ये क्या सहयोगी दल का नेता ही केंद्र सुप्रीमो की पोल खोलने लगा? यही है सर्किल पर गतिशील भाव-प्रवाह। इसी क्रम में दूसरी ओर हरियाणा के कद्दावर नेता चैटाला ने युवराज राहुल के कारनामे का खुलाशा कर दिया। दूसरे बिन्दु जाकिर हुसैन ट्रस्ट के बैनर से कानूनमंत्री नवाब खुर्शीद के गोरखधंधे पर समूचा विपक्ष ही नहीं, सहयोगी सपा के लीडर आजम खां भी बोल पड़े। सत्तापक्ष की बोलती बंद देख कानूनमंत्री की अंतरात्मा की आवाज इस रक्तिम अंदाज में प्रस्फुटित हुई। ये सब कुछ सबके सामने है। इस तरह जो भाव-प्रवाह अपने सर्किल आगे बढ़ता जायेगा। स्वयं सियासी जमात एक दूसरे को निर्वस्त्र करती जायेगी। प्रभावित जनमानस अपने वोट के तथाकथित दुरुपयोग पर प्रायश्चित करेगी। ‘अरे, लालच में पड़कर मैने लुटेरे को अपना वोट दिया।’’ यह भाव अपना सर्किल पूरा करेगा, पूरा देश भावात्मक साम्यता से ‘‘सुनामी’’ प्रकट होगी- सत्यनिष्ट ईमानदार उम्मीदवार को वोट देने में अपना व जनतंत्र का हित मानेगी। तब भी भाव-प्रवाह ही सक्रिय होगा, फलस्वरूप सभी राजनैतिक दल प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया बदलकर आन्तरिक परिशोधनात्मक सर्किल पर दौड़ेंगे। एक दूसरे के मुकाबले भले, ईमानदार व सच्चरित्र प्रत्याशियों को जनता की अदालत में पेश करेंगे। उनमें से चयन करते हुए अच्छे, ठीक, उत्तम व अत्युत्तम की कोटि निर्धारित कर अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। संसदीय जनतंत्र प्रदूषण मुक्त होगी। सवाल उठता है कि क्या यह संभव है? हां, बशर्ते चक्रवात की तरह जो भाव-प्रवाह का तूफान उठ रहा वह शाट-सर्किट की भेंट न चढ़ेे और अपना सर्किल पूरा करते हुए सियासी-समुद्र में भयावह लहरें उठाने वाली ‘सुनामी’ बन जाये। - देवेश शास्त्री⏎ ⏎ ⏎ ==कोई नहीं जाता खाली हाथ== सब कुछ समेट के ले जाना पड़ता है ‘‘जो जस करहि सो तस फल चाखा।’’ यानी कर्मगति को ही प्रारब्ध कहा गया है। ‘‘राम कीन्ह चाहइ सोइ होई।’’ यानी परमात्मा जो चाहता है वही होता है। दोनों कथन विरोधाभासी प्रतीत हो रहे हैं लेकिन हैं नहीं। गीता मंे योगेश्वर कृष्ण कहते हैं- ‘‘कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्।’’ स्पष्ट है कि कर्मानुसार फल देना परमात्मा के अधीन है। दर्शनशास्त्र इसी कर्मसिद्धांत को परिभाषित करते है। अर्थात् हम स्वयं अपनी अगली योनि के नियंता हैं, कोई और नहीं। शरीर छोड़कर जीवात(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है। All content in the above text box is licensed under the Creative Commons Attribution-ShareAlike license Version 4 and was originally sourced from https://hi.wikibooks.org/w/index.php?diff=prev&oldid=6183.
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