Difference between revisions 6183 and 6209 on hiwikibooks==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण == आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प्रतिकूलता दुःख । अनासक्त भाव को इस तरह देखें - आसक्ति व विरक्ति दोनों से श्रेष्ठ है अनासक्ति, जिससे परमानंद की अनुभूति होती है। आत्मदृष्टा जब अंतर्मुखी हो जाता है परमात्मरूप ( videh) प्रतीत होता है , उसकी हर गतिविधि रहस्य प्रतीत होती है । ==.. अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये!== ��जलाओ दिये, पर रहे ध्यान इतना। अंधेरा धरा पर, कहीं रह न जाये।�� पद्मश्री गोपालदास �नीरज� की इन पंक्तियों के गूढ़ार्थ को समझना ही जीवन को दिव्य बनाना है। जीवन ही समाज है, समाज ही देश और विश्व है। दीपोत्सव से तात्पर्य विश्व को ��दिव्य-आलोक�� से प्रकाशित करना। अंधेरा मिटाने के लिए दीप प्रज्ज्वलित करना, महज वार्षिक अनुष्ठान न होकर नियमित प्रक्रिया होनी चाहिए। अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म का गहन अंधकार हम सबकी स्वार्थाच्छादित कलुषित मानसिकता से बढ़ता ही जा रहा हैं। वर्ष में एक दिन विशेष को प्रकाश-पर्व इस उद्घोष के साथ मनाया जाता है- अंधेरा धरा पर, कहीं रह न जाये। प्रगाढ़ अंधकार को भला कृत्रिम दीपमालिकाओं से कैसे मिटाया जा सकता है? अध्यात्म-विज्ञान करोड़ों सूर्यों के प्रकाशपुंज �आत्म-तत्व� को ज्ञान रूपी नीराजना से प्रकाशित करने का संदेश देता है ताकि अंतःचतुष्टय (मन, चित्त, बुद्धि व अहंकार) पर छाये अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म का गहन अंधकार को दूर हो सके। जब जन-जन में आत्म-तत्व प्रकाशपुंज के रूप में दीप जलेंगे। तो ज्ञान स्वरूप प्रकाश से अज्ञान-तिमिर छंट जायेगा। सत् रूप प्रकाश से असत् स्वरूप अंधेरा मिटेगा। नैतिकता का प्रकाश अनैतिकता रूपी तम को उखाड़ देगा। न्याय स्वरूप आलोक अन्याय रूपी काले अंधेरे का भंजन करेगा और धर्म-ज्योति से अधर्म रूपी तिमिरान्धकार मिट जायेगा। अंधेरे का सफर कितना दुस्तर होता है? कहीं कांटों में उलझने का, तो कहीं कुए अथवा गड्ढे में गिरने का भय आगे बढ़ने नहीं देता, ऐसे में कहीं हवा के झोंके में सरसराहट होने लगे तो किसी हिंसक जानवर का शिकार बनने का डर, अपनी ही छाया में प्रेत की अनुभूति प्राणघातक हो जाती है। वही दशा मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार पर छाये अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म के गहन अंधकार के कारण जीवन के पल-पल गड्ढे में गिरने, कांटों में उलझने, भय के भूतों से आहत होते हुए गुजर रहे है। दिये जलाये, जाते हैं फिर भी अंधेरा? वास्तव में दीपोत्सव अब दिखवा है। अंतःकरण में कालिमा समेटे वाह्य अंधकार को मिटाने का दंभ और सर्व जनोपयोगी �तेज� को कृत्रिम प्रसाधनों से हथियाने (हक हरण) की वृत्ति के भ्रम में �तम� की ही परत हम मोटी करते जा रहे है। ��तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय, मृत्युर्मामृतं गमय�� की प्रार्थना के साथ ज्ञान, सत्य, नीति, न्याय, धर्म की दीपमालिका विवेकपूर्ण रंगोली की बुद्धि पर प्रज्ज्वलित करें जिससे ��आत्म-तत्व�� का प्रकाशपुंज अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म का गहन अंधकार को मिटा देगा। -सत्यमेव जयते- तेजोऽसि तेजो मयि देहि। ओजोऽसि ओजो मयि देहि। वीर्याेऽसि वीर्यो मयि देहि।⏎ ⏎ ==संकल्प का अभाव क्यों?== आज हम विकल्पों में उलझकर संकल्प-शक्ति से दूर जा चुके हैं, संकल्प वह अजस्र ऊर्जा संपन्न साधना है, जो प्रत्येक ‘कल्पना’ को साकार बना सकता है। संकल्प से दूरी का मुख्य कारण वैकल्पिक जगत रूपी ‘मायाजाल’ में चित्त का उलझाव। (contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है। All content in the above text box is licensed under the Creative Commons Attribution-ShareAlike license Version 4 and was originally sourced from https://hi.wikibooks.org/w/index.php?diff=prev&oldid=6209.
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