Difference between revisions 6209 and 6211 on hiwikibooks==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण == आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प्रतिकूलता दुःख । अनासक्त भाव को इस तरह देखें - आसक्ति व विरक्ति दोनों से श्रेष्ठ है अनासक्ति, जिससे परमानंद की अनुभूति होती है। आत्मदृष्टा जब अंतर्मुखी हो जाता है परमात्मरूप ( videh) प्रतीत होता है , उसकी हर गतिविधि रहस्य प्रतीत होती है । ==मृत्युलोक का सत्य!== वास्तव में मृत्युलोक का सत्य सिर्फ मृत्यु है। यहां ईश्वर भी यदि किसी अवतार के रूप में आये तो उन्हें भी जाना पड़ा। कविवर शिशु जी लिखते है- ‘‘पता नहीं जाने वाले को आना भी पड़ता है, किन्तु यहां आने वाले को जाना ही पड़ता है। पौराणिक आख्यानों में ऐसे तमाम राक्षसी वृत्ति के लोगों के प्रसंग देखने को मिलते हैं जिन्होंने मौत पर विजय पाने के लिए तपबल से ईश्वरीय क्षमता हासिल कर ली हो मगर उन्हें भी मृत्यु से पराजित होना पड़ा। हिरण्यकश्यप ने वर पाया-‘‘ न दिन में, न रात में, न घर में, न बाहर, न नर से, न पशु से, न आधि से और व्याधि से मरूं’’ यानी मृत्युलोक के सत्य ‘‘मृत्यु’’ पर विजय का भ्रम पाला। स्वयं ईश्वर को ‘नृसिंह’ रूप धारण करके आना पड़ा। संध्या काल (न दिन, न रात) देहरी पर (न घर, न बाहर) आदि वर की गरिमा का पालन हुआ और मृत्युलोक के सत्य का वरण भी करना पड़ा। आज हम 21 वी सदीं के आई टी के क्रांति दौर से गुजर रहे हैं और अनीति, अन्याय, अधर्म और असत् से धनार्जन कर रहे हैं। निरंतर सम्पदा के विस्तार की प्रवृत्ति इस मनो-दशा को परिभाषित करती है कि ‘‘हम कभी मरेंगे नहीं, और युग युगांतर भोगते रहेंगे।’’ जन्म-जन्मान्तर के संचित कर्म फल (प्रारब्ध को) भुलाना ही मृत्यु है। जो सन्मार्ग पर चलते हुए प्रारब्ध को स्वीकार कर जीवन यापन करते हुए मृत्यु को सहर्ष स्वीकार करता है, वह मरकर भी नहीं मरता। मृत्यु से तात्पर्य देहान्तरण है, हमारी कृत्य संचित कर्मफल में जुड़कर अगले परिवेश रूपी देह का चयन कर लेते हैं। इसी आधार पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- ‘‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि..’’ मृत्युलोक सिर्फ देहान्तरण की सत्यता को सिद्ध करता है जिसे मृत्यु कहा गया है, यह भी एक विभ्रम है। -देवेश शास्त्री⏎ ⏎ ⏎ ==.. अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये!== ��जलाओ दिये, पर रहे ध्यान इतना। अंधेरा धरा पर, कहीं रह न जाये।�� पद्मश्री गोपालदास �नीरज� की इन पंक्तियों के गूढ़ार्थ को समझना ही जीवन को दिव्य बनाना है। जीवन ही समाज है, समाज ही देश और विश्व है। दीपोत्सव से तात्पर्य विश्व को ��दिव्य-आलोक�� से प्रकाशित करना। अंधेरा मिटाने के लिए दीप प्रज्ज्वलित करना, महज वार्षिक अनुष्ठान न होकर नियमित प्रक्रिया होनी चाहिए। अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म का गहन अंधकार हम सबकी स्वार्थाच्छादित कलुषित मानसिकता से बढ़ता ही जा रहा हैं। वर(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है। All content in the above text box is licensed under the Creative Commons Attribution-ShareAlike license Version 4 and was originally sourced from https://hi.wikibooks.org/w/index.php?diff=prev&oldid=6211.
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