Difference between revisions 6211 and 6257 on hiwikibooks==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण == आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प(contracted; show full)षण व्यवस्था में भिक्षा मांगते थे ईंधन चयन करते थे। क्या राजा ने कभी अनुदान नहीं देना चाहा? देना चाहा मगर स्वीकार नहीं किये गये। अन्यायोर्जित धन के नियोजन के बहुमंजिला शिक्षालयों में विद्या नहीं प्राप्त हो सकती। अविद्या का ही साम्राज्य है। विद्वता, शिक्षण, पांडित्य, तत्वज्ञान, विज्ञान अन्वेषण में चित्त पर नियन्त्रण(योगश्चित्तवृत्तिः निरोधः), इन्द्रियों पर नियन्त्रण, शुचिता, धैर्य, सरलता, एकाग्रता तथा ज्ञान-विज्ञान में विश्वास आवश्यक तत्वात्मक गुण हैं जिनमें धनाढ्ता बाधक ही नहीं अधम्र्य है। -देवेश शास्त्री ==ऊष्मा जाग्रत करने का वक्त!== अजस्र ऊर्जा के स्रोत सूर्य-नारायण के उत्तरायण होने का पर्व 'मकर संक्रांति' जो समचे 'ब्रह्मांड' में अपनी-अपनी तरह से माना जाता है। पंजाबी शैली में 'लोहड़ी', आर्य शैली में 'खिचड़ी' और द्रविड़ शैली में 'पोंगल' अथवा देश-देशान्तर में स्थानीय परम्परागत शैली के विविध उत्सव सूर्योपासना के ही रूपक है,यदि सौर-संक्रमण प्रक्रिया की गहराई में जायें और आत्म-तत्व निहित अनंत ऊष्मा को जाग्रत कर सकते हैं,जो अब अवश्यंभावी है। कर्क से धनु राशि में सूर्य दक्षिणायन रहता है, यानी 14 जुलाई से 14 जनवरी तक की छमाही। 14 जनवरी को धनु से मकर राशि में संक्रमण करते ही सूर्य उत्तरायण हो जाते है। विज्ञान की दृष्टि से भी सूर्य की तपन की क्रमिक अभिवृद्धि सुखद हो जीती है। शादी-विवाह और अन्य शुभकार्य शुरु हो जाते हैं। 'खिचड़ी','लोहड़ी' और 'पोंगल' के रूप में खेत खलिहान में उत्सव मनाना, आग जलाकर खेलना, नदियों के पवित्र जल में स्नान कर 'खिचड़ी' का 'दान' देना जैसी तमाम परंपराओं के विज्ञान परक कारण हैं,न कि मात्र आडंबर। वर्षा-शरद-शिशिर में निस्तेज सूर्य की स्थिति दक्षिणायन का प्रतीक और क्रमशः हेमन्त-बसंत और ग्रीष्म में अपने ऊष्मित तेवर के रूप में उत्तरायण हो जाता है। यह सौर-प्रक्रिया यानी परात्पर परमात्मा के अंशांशावतार सूर्य की गति हमें अपने अंतस्थ परमात्म स्वरूप की ऊष्मा को जाग्रत करने का संदेश देती है। सांख्य दर्शन के अनुसार शरीर की रचना 5 महद्तत्वों से होती है, उनमें तेज (अग्नि-ऊष्मा) प्रमुख है। �ईश्वर अंश जीव अविनाशी� अध्यात्म विज्ञान आत्मा को करोड़ों सूर्यों की ऊष्मा के परात्पर स्रोत परमात्मा ही मानता है,इसीलिए आत्म-साक्षात्कार को तपस्वी मनीषियों ने वेद-वेदांत आदि बांगमय में मोक्ष कहा। �तप-बल� से ही सारा सांसारिक उपक्रम संचालित है। तप,सूर्य की तपन से भी परे है। तपबल से कपिल-मुनि के दृष्टिपात से राजा सगर के 60 हजार पुत्र जल गये,तपबल से ऊष्मित दधीचि की हड्डियों से बज्र बना। क्या हम अपनी ऊष्मा को जाग्रत नहीं कर सकते? अमरीकी मूल के भारतीय वैज्ञानिक एमके त्रिवेदी एक ऐसे उदाहरण हैं,जिन्होने अंतस्थ दिव्य ऊर्जा को जाग्रत किया। श्री त्रिवेदी पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों व मनुष्य पर जो आशीर्वाद स्वरूप प्रयोग कर परहित में लगे हैं, जिनके अंग-प्रत्यंग के प्रत्यंतरित (भिन्न-भिन्न) तापमान और विचार संचरण का रहस्य अन्तरात्मा की ऊष्मा का प्राकट्य और जनहित में प्रयोग की सद्भावना है। वे कहते हैं- जब सूर्य की ऊष्मा ही प्रकृति और प्राणी का आधार है, वह ईश्वरीय कृपा से सुलभ है,महेन्द्र कुमार त्रिवेदी इस दिशा में स्वयं को निमित्त-मात्र मानते हैं, जो अध्यात्म और विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता है। आज समस्याग्रस्त समाज को मकर संक्रांति पर अपने अंदर छिपी अतंत ऊष्मा को सत्यनिष्ठा स्वरूप तपबल से जाग्रत करनी होगी,यह देश-काल-परिस्थिति के आधार पर अवंश्यंभावी है। ==युवा-ऊर्जा का पराभव!== विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष 'राष्ट्रीय युवा दिवस' के रूप में मनायी जाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् 1985 ई. को 'अर्न्तराष्ट्रीय युवा वर्ष' घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की, कि सन 1985 से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिन के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए,और मनाया जाने लगा यानी युवा दिवस के रूप में स्वामी विवेकानंद का चिन्तन अपना प्रभाव छोड़ने की बजाय रस्म अदायगी की भेंट चढ़ गया। यही कारण है कि परमाणु-बम से भी अधिक ऊर्जित यूथ-पावर आज भीषण शीत में हेमराज और सुधाकर सिंह के रूप में नापाक बर्बरता की भेंट चढ़ गया। यूथ-पावर व्यभिचारी दुप्रवृत्ति में फंसकर निर्भीकता पूर्वक दुष्कर्म में संलग्न हो गया,अनगिनत दामिनियों की यूथ-पावर व्यभिचारी यूथपावर के शॉट-सर्किट से घ्वस्त होने लगी। यूथ-पावर यानी युवा ऊर्जा कदाचारी सियासी जमात की स्वार्थसिद्धि के लिए भोग्य-ऊर्जा बनकर कारगर साबित होने लगी। 1993 में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के 'विश्व धर्म सम्मेलन' में कहा था-��मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ,जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते,वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान हैं, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया हैं। जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न- भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं। जो कोई मेरी ओर आता हैं - चाहे किसी प्रकार से हो - मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।�� वास्तविक धर्म शक्ति, युवाशक्ति यही है। स्वामी विवेकानंद मानते हैं कि धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है। व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनने के लिए सत् को धारण करना होगा। सत्यमेव जयते नानृतं, सत्य की ही विजय होती है मिथ्या लानी असत्य की नहीं। सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्या अर्थात् सत् है तो सिर्फ परमात्मा जो आत्मरूप से विद्यमान है। आज जरूरत है स्वामी विवेकानंद के सद्विचारों को धारण करने की। स्वामी विवेकानंद ने 120 साल पहले 1893 में अतीत के झरोखे से आज के हालात को समझा था, शिकागों में उन्होंने कहा था- ��साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी बीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं, उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये बीभत्स दानवी न होती, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता, पर अब उनका समय आ गया हैं, और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टाध्वनि हुई हैं, वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होने वाले सभी उत्पीड़नों का,और एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।�� क्या हम वह कर पाये जो स्वामी जी चाहते थे? नहीं, बदले में उसी वीभत्स अतीत की पुनरावृत्ति करते हुए हम समय,भाग्य और ईश्वर पर ही मिथ्या दोष लगाते हुए युवा-दिवस मनाकर विवेकानन्द के नाम पुष्पांजलि कर स्वयं को महिमामंडित कर लेते हैं। सवाल उठता है क्या करे युवा वर्ग? इसका जवाब भी स्वामी विवेकानंद ही देते हैं- ��सारी शक्ति तो तुम्हीं में है,अपने ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। प्रबल शक्ति आत्मा की है। डर किस बात का है? मृत्यु से प्रेम करो,सिंह सी शूरता और फूल सी कोमलता के साथ आगे बढ़ो। यदि 2-4 लोग भी आत्मदृष्टा, पवित्र व नैतिक चरित्र वाले सत्यनिष्ठ मिल जायें तो तूफान मचा दें।�� हम स्वामी विवेकानंद की 150 वीं जयन्ती मनाने जा रहे हैं, इतने लम्बे अंतराल में तूफान मचाने वाली युवा ऊर्जा दिग्भ्रमित होकर सियासी मदारी के हाथ का खिलौना बनकर ठगी जाती रही,जिन पर कुछ विश्वास भी किया जा सकता था,वे कालनेमि सिद्ध होते जा रहे रहे है, दानवीयता में उलझी युवा ऊर्जा का मानवता पर बज्राघात तब तक जारी रहेगा, जब तक स्वामी विवेकानंद के सदुपदेशों को आत्मसात करने की प्रबल इच्छाशक्ति नहीं होगी। ==गुरु महत्व== व्यास जयन्ती ही गुरु पूर्णिमा है। गुरु को गोविंद से भी ऊंचा कहा गया है। गुरुपरंपरा को ग्रहण लगाया तो सद्गुरु का लेबिल लगाकर धर्मभीरुता की आड़ में धंधा चलाने वाले ‘‘कालिनेमियों ने। शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है। All content in the above text box is licensed under the Creative Commons Attribution-ShareAlike license Version 4 and was originally sourced from https://hi.wikibooks.org/w/index.php?diff=prev&oldid=6257.
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