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==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण ==
आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प(contracted; show full)ा के साथ आगे बढ़ो। यदि 2-4 लोग भी आत्मदृष्टा, पवित्र व नैतिक चरित्र वाले सत्यनिष्ठ मिल जायें तो तूफान मचा दें।�� हम स्वामी विवेकानंद की 150 वीं जयन्ती मनाने जा रहे हैं, इतने लम्बे अंतराल में तूफान मचाने वाली युवा ऊर्जा दिग्भ्रमित होकर सियासी मदारी के हाथ का खिलौना बनकर ठगी जाती रही,जिन पर कुछ विश्वास भी किया जा सकता था,वे कालनेमि सिद्ध होते जा रहे रहे है, दानवीयता में उलझी युवा ऊर्जा का मानवता पर बज्राघात तब तक जारी रहेगा, जब तक स्वामी विवेकानंद के सदुपदेशों को आत्मसात करने की प्रबल इच्छाशक्ति नहीं होगी।


==�आत्म-तत्व� का सर्वोत्कृष्ट वाग्मयी मूर्ति है गीता==
21वीं शताब्दी निश्चित रूप से विज्ञान का क्रांति-दौर माना जा रहा है, मगर इससे भी परे ��परात्पर विज्ञान�� का दौर रहा है, और आने वाला दिख रहा है। इस सर्वोत्कृष्ट विज्ञान का ग्रन्थ है गीता। गीता ने ही ��महाभारत�� को निर्णायक स्वरूप दिया। गीता के वैज्ञानिक तथ्यों की ऊर्जाशक्ति से महात्मा गांधी ने ब्रिटिश हुकूमत को खदेड़ा, गीता से ही स्वामी विवेकानंद ने विश्व को परात्पर अध्यात्म-विज्ञान की ज्योति से प्रकाशित किया। क्रमशः 18 अध्यायों के गीता शास्त्र की अनुक्रमणिका में 1. अर्जुनविषादयोग, 2.सांख्ययोग, 3. कर्मयोग, 4. ज्ञानकर्मसंन्यासयोग,5. कर्मसंन्यासयोग,6. आत्मसंयमयोग, 7. ज्ञानविज्ञानयोग,8.क्षरब्रह्मयोग, 9. राजविद्या- राजगुह्ययोग, 10. विभूतियोग,11. विश्वरूपदर्शनयोग,12.भक्तियोग, 13. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभागयोग,14. गुुणत्रयविभागयोग, 15. पुरुषोत्तमयोग, 16. दैवासुर सम्पद्विभागयोग, 17.श्रद्धात्रय विभागयोग 18. मोक्षसंन्यासयोग। वास्तव में आत्म-तत्व के परात्पर विज्ञान को आत्मसात करना ही वैज्ञानिक बनना है। आखिर विज्ञान क्या है? वि उपसर्ग दो अथों में होता है विशिष्ट और विकृत। विशिष्ट ज्ञान ही विज्ञान है जिसे �तत्वज्ञान� कहा जाता है। गीता शास्त्र आत्मतत्व को परिभाषित करने वाला सर्वात्कृष्ट विज्ञान-ग्रन्थ है। दूसरी ओर विज्ञान को परिधि में समेटना �विकृतज्ञान� है। जिज्ञासा से ही हम तत्व की और जाते हैं, जब जिज्ञासा होती है- ऐसा क्यों? उसका समाधान क्रमशः तत्व तक पहुचाता है। जैसे बनस्पति, रसायन, भौतिक बिन्दुओं पर जिज्ञासायें ��ऐसा क्यों? ऐसा क्यों? ऐसा क्यों? के क्रमिक समाधान तत्संबन्धी विज्ञान है, बनस्पति विज्ञान, रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान। व्यापक समाज के बारे में ऐसी जिज्ञासायें सामाजिक विज्ञान के तत्व तक ले जाती है, घर गृहस्थी की जिज्ञासायें गृह-विज्ञान के तत्व तक पहुचने की सीढ़ी है। यही प्रक्रिया भूतल विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, कम्प्यूटर विज्ञान सहित तत्वज्ञान (विज्ञान) के अनंत भेद है। प्राणी के साफ्टबेयर स्वरूप अन्तःचतुष्टय में मन आता है, और मन का तत्वज्ञान ही मनोविज्ञान है। उसी तरह ��आत्मतत्व�� का ज्ञान अध्यात्म विज्ञान है, फिर अध्यात्म को विज्ञान की श्रेणी में सर्वोकृष्ट माना जाता है। आज जिस विज्ञान की बातें हो रही हैं, उनके जानकार यानी वरिष्ठ वैज्ञानिक ही ��ऐसा क्यों?�� की धुन में बढ़ते-बढ़ते आत्मतत्व तक पहुंचे हैं। विषादयोग ही पहली सीढ़ी है तत्वज्ञान की जो मोक्षसन्यास योग तक पहुंचाती है। पद्मपुराण के उत्तरखंड में श्रीमद्भगवद्गीता के अष्टादश अध्यायों का महात्म्य वर्णित है। क्षीरसागर में शेष शैया पर विराजमान श्री विष्णु से भगवती लक्ष्मी ने निवेदन किया��आप जगत् का पालन करते हुए भी अपने ऐश्वर्य के प्रति उदासीन होकर क्षीरसागर में सुख की नींद ले रहे हैं।�� श्रीहरि बोले-��मैं नींद नहीं लेता हूं, अपितु तत्व का अनुसरण करने वाली अन्तर्दृष्टि के द्वारा अपने ही माहेश्वर तेज का साक्षात्कार कर रहा हूं। यह वही माहेश्वर तेज है जिसका योगी पुरुष कुशाग्र बुद्धि के द्वारा अपने अंतःकरण में दर्शनकरते हैं तथा जिसे मीमांसक विद्वान वेदों का सार तत्व निश्चित करते हैं। वह माहेश्वर तेज एक, अजर प्रकाश स्वरूप, आत्मरूप, रोग-शोक रहित, अखंड आनंद पुंज, निष्पन्द तथा द्वैत रहित है। विश्व का जीवन उसी के अधीन है। मै सतत् उसी का अनुभव करता हूं। देवेश्वरि! यही कारण है कि मैं तुम्हें नींद लेता सा प्रतीत हो रहा हूं।�� लक्ष्मीजी ने फिर प्रश्न किया कि ��हे प्रभो! आप ही योण्यिों के ध्येय हैं क्या आपके अतिरिक्त भी कोई ध्यान करने योग्य तत्व है?�� श्रीहरि बोले-��हां! द्वैत-अद्वैत से प्रथक, भाव-अभाव से मुक्त, आदि-अंत से रहित, शुद्ध ज्ञान के प्रकाश उपलब्ध होने वाला, सर्वसमर्थ, परमानंद स्वरूप होने के कारण मोहक मेरा परात्पर तत्व ही ��आत्मा�� के रूप में अनुभूत होता है। गीताशास्त्र में मैंने इसी स्वरूप को प्रतिपादित किया है। हे सुन्दरि! क्रमशः 5 अध्यायों को पंच-मुख जानो, 10 अध्यायों को दश-भुजाएं, सोलहवें अध्याय को उदर, 17वें व 18वें अध्याय को दोनों चरण मानें। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता अठारह अध्याय की वाग्मयी ईश्वरी-मूर्ति है।�� भगवान ने गीता के प्रथम अध्याय के महात्म्य में सुकर्मा की कथा कही, आश्रम में रहने वाले शुक ने गीता पाठ सुनकर रट लिया। उसी तोते पिंजरस्थ होकर गीता गान करने से एक वैश्या के पातक पुण्य में परिवर्तित हुए। उस वेश्या के पुण्य दान से पातकी सुकर्मा का उद्धार हुआ। विषादोपरान्त योगेश्वर रीकृष्ण्ण द्वारा सांख्ययोग, कर्मयोग,ज्ञानकर्म संन्यासयोग, कर्मसंन्यासयोग,आत्म- संयमयोग,ज्ञानविज्ञानयोग, क्षरब्रह्मयोग,राजविद्याराज- गुह्ययोग, विभूतियोग, विश्वरूपदर्शनयोग, भक्तियोग, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभागयोग, गुणत्रय- विभागयोग, पुरुषोत्तमयोग, दैवासुर सम्पद्विभागयोग, श्रद्धात्रय विभागयोग के बाद मोक्षसंन्यास योगका उपदेश दिया। जिसका सार है ��सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज।� यानी उस महत्तत्व ही आत्मा है, जिसका स्वयं ब्रह्मा जाप करते है, विष्णु अन्तमुखी होकर चिंतन करते हैं और शंकर ध्यान करते हैं। वही निर्गुण तत्व ही माहेश्वर तेज स्वरूप आत्म तत्व है।

==गुरु महत्व==
व्यास जयन्ती ही गुरु पूर्णिमा है। गुरु को गोविंद से भी ऊंचा कहा गया है। गुरुपरंपरा को ग्रहण लगाया तो सद्गुरु का लेबिल लगाकर धर्मभीरुता की आड़ में धंधा चलाने वाले ‘‘कालिनेमियों ने। शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा ग(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है।