Difference between revisions 6429 and 6430 on hiwikibooks==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण == आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प(contracted; show full)ेता है। मारुत्यास्त्र रूपी ब्रह्मचर्य बल से कलंक को नष्ट किया जाता है तब मानवीयगिरि की दुर्गम चढ़ाई पर आगे बढ़ सकते हैं। मानवीयगिरि से तात्पर्य मानवीयता से है, जो अति दुर्गम है मानवीयगिरि का आरोहण में स्वार्थ और महत्वाकांक्षा रूपी असंख्य रासायनिक-फिसलन है, मानवीयगिरि पर आरोहित विजेता ‘‘मानव’’ होता है। जो निःश्रेयसवन पहंुचता है यानी श्रेयात्मक महत्वाकांक्षा से परे हो जाता है वह ब्रह्मनिष्ठ परमहंस ही ‘‘सत्य’’ का सामीप्य योग पाकर कल्पवृक्ष का सुख भोगता है और कामधेनु का पयपान करते हुए सारूप्य मोक्ष पाता है। ==मानव बनकर निःश्रेयस वन में कल्पवृक्ष की छााया में खुख पायें== गर्ग संहिता के विश्वजित खंड में प्रसंग आता है कि जब कृष्णकुमार प्रद्युम्न यादवसेना के साथ ब्रह्मांड विजय को निकलते हैं तो ‘रम्यकवर्ष’ में दैत्यराज कालनेमि (जिसका संहार हनुमानजी ने संजीवनी लेने जाते समय तब कर दिया था जब उसने साधु बनकर रास्ता रोका था) के पुत्र ‘‘कलंक’’ ने यादव सेना से भीषण युद्ध किया। साक्षात् कामदेव स्वरूप प्रद्युम्न ने कलंक पर ‘मारुत्यास्त्र’ का संधान किया। ‘मारुत्यास्त्र’ से बजरंगबली ने प्रकट होकर कालनेमि सुत कलंक का अंत कर दिया। रम्यकवर्ष में ‘‘मानवीय गिरि’’ है, जिसकी उपत्यिका में ‘‘निःश्रेयस वन’’ है, जो पारिजात (कल्पवृक्षों) का है। जिनकी छाया में कामधेनु गायें विचरण करती हैं। भाव लोक में इस प्रसंग को समझें- रम्यकवर्ष यानी रमने योग्य राष्ट्र में प्रवेश संभव नहीं है, क्योंकि कलंक ही अवरोधक है जो जीव को भृंगीवृत्ति से सारूप्य यानी कलंकित कर देता है। मारुत्यास्त्र रूपी ब्रह्मचर्य बल से कलंक को नष्ट किया जाता है तब मानवीयगिरि की दुर्गम चढ़ाई पर आगे बढ़ सकते हैं। मानवीयगिरि से तात्पर्य मानवीयता से है, जो अति दुर्गम है मानवीयगिरि का आरोहण में स्वार्थ और महत्वाकांक्षा रूपी असंख्य रासायनिक-फिसलन है, मानवीयगिरि पर आरोहित विजेता ‘‘मानव’’ होता है। जो निःश्रेयसवन पहंुचता है यानी श्रेयात्मक महत्वाकांक्षा से परे हो जाता है वह ब्रह्मनिष्ठ परमहंस ही ‘‘सत्य’’ का सामीप्य योग पाकर कल्पवृक्ष का सुख भोगता है और कामधेनु का पयपान करते हुए सारूप्य मोक्ष पाता है।⏎ ⏎ ==.. अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये!== ��जलाओ दिये, पर रहे ध्यान इतना। अंधेरा धरा पर, कहीं रह न जाये।�� पद्मश्री गोपालदास �नीरज� की इन पंक्तियों के गूढ़ार्थ को समझना ही जीवन को दिव्य बनाना है। जीवन ही समाज है, समाज ही देश और विश्व है। दीपोत्सव से तात्पर्य विश्व को ��दिव्य-आलोक�� से प्रकाशित करना। अंधेरा मिटाने के लिए दीप प्रज्ज्वलित करना, महज वार्षिक अनुष्ठान न होकर नियमित प्रक्रिया होनी चाहिए। अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म का गहन अंधकार हम सबकी स्वार्थाच्छादित कलुषित मानसिकता से बढ़ता ही जा रहा हैं। वर(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है। All content in the above text box is licensed under the Creative Commons Attribution-ShareAlike license Version 4 and was originally sourced from https://hi.wikibooks.org/w/index.php?diff=prev&oldid=6430.
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