Difference between revisions 6430 and 6435 on hiwikibooks==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण == आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प(contracted; show full)ेता है। मारुत्यास्त्र रूपी ब्रह्मचर्य बल से कलंक को नष्ट किया जाता है तब मानवीयगिरि की दुर्गम चढ़ाई पर आगे बढ़ सकते हैं। मानवीयगिरि से तात्पर्य मानवीयता से है, जो अति दुर्गम है मानवीयगिरि का आरोहण में स्वार्थ और महत्वाकांक्षा रूपी असंख्य रासायनिक-फिसलन है, मानवीयगिरि पर आरोहित विजेता ‘‘मानव’’ होता है। जो निःश्रेयसवन पहंुचता है यानी श्रेयात्मक महत्वाकांक्षा से परे हो जाता है वह ब्रह्मनिष्ठ परमहंस ही ‘‘सत्य’’ का सामीप्य योग पाकर कल्पवृक्ष का सुख भोगता है और कामधेनु का पयपान करते हुए सारूप्य मोक्ष पाता है। ⏎ ==सत्कर्मों का प्रताप== http://hi.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8B_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A5%8D ‘‘सत्कर्मों का प्रताप’’ अपने आप में करोड़ों सूर्याें की ‘‘अनंत ऊर्जा यानी महत्तेज’’ जिससे दैहिक, दैविक व भौतिकताप स्वतः आने से पहले ही अस्तित्वहीन हो जाते हैं तथा अथाह ‘ब्रह्मद्रव का ऐसा प्रवाह जिसके आगे खड़ी चट्टानों के परखच्चे उड़ जाते हैं। आयें, पहले ‘सत्कर्म’ और ‘प्रताप’ शब्दों को समझें- सत् ही परमसत्ता है, प्रत्येक विचारक ‘‘कर्मसिद्धांत’’ को सर्वोपरि मानते हैं, संचित कर्मों के फल को ‘प्रारब्ध’ कहा गया है। गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कर्मयोग का उपदेश दिया। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा- ‘‘जो जस करहि, सो तस फल चाखा।’’ कर्मगति ही जब प्रारब्ध है तो उसे भोगना ही है। ऐसे सर्वाधार ‘कर्म’ को परमसत्ता ‘सत’ को सौपना यानी कर्मों को सत् से संबद्ध करना ही सत्कर्म है। जो क्रमशः बुद्धिगत चिंतन, आहार, व्यवहार आदि सोपान से आगे बढ़ता है इन्हें भी सत् से जोड़ना होगा- सद्बुद्धि होने पर सद्विचार आयेंगे सात्विक आहार होगा, तब सदाचरण (सत् आचरण) होगा। इन सोपानों से आगे बढ़कर हम जिस रास्ते पर होंगे वह सत्पथ यानी सन्मार्ग होगा। इस रास्ते से ही हमारा कर्म, अकर्म व विकर्म सभी कुछ सत्कर्म हो जायेंगे।⏎ ⏎ ==.. अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये!== ��जलाओ दिये, पर रहे ध्यान इतना। अंधेरा धरा पर, कहीं रह न जाये।�� पद्मश्री गोपालदास �नीरज� की इन पंक्तियों के गूढ़ार्थ को समझना ही जीवन को दिव्य बनाना है। जीवन ही समाज है, समाज ही देश और विश्व है। दीपोत्सव से तात्पर्य विश्व को ��दिव्य-आलोक�� से प्रकाशित करना। अंधेरा मिटाने के लिए दीप प्रज्ज्वलित करना, महज वार्षिक अनुष्ठान न होकर नियमित प्रक्रिया होनी चाहिए। अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म का गहन अंधकार हम सबकी स्वार्थाच्छादित कलुषित मानसिकता से बढ़ता ही जा रहा हैं। वर(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है। All content in the above text box is licensed under the Creative Commons Attribution-ShareAlike license Version 4 and was originally sourced from https://hi.wikibooks.org/w/index.php?diff=prev&oldid=6435.
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