Difference between revisions 6435 and 6462 on hiwikibooks==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण == आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प्रतिकूलता दुःख । अनासक्त भाव को इस तरह देखें - आसक्ति व विरक्ति दोनों से श्रेष्ठ है अनासक्ति, जिससे परमानंद की अनुभूति होती है। आत्मदृष्टा जब अंतर्मुखी हो जाता है परमात्मरूप ( videh) प्रतीत होता है , उसकी हर गतिविधि रहस्य प्रतीत होती है । ==हरतालिका-गणपति-सप्तर्षि त्रिवेणी में ‘दश-लाक्षणी’ धर्म का विज्ञानपरक रहस्य == ----------------------------------------------- देवशयनी एकादशी से देवोत्थानी एकादशी तक चातुर्मास्य ‘‘आत्मशोधन का कालखंड’’ माना जाता है। सावन में काम (सेक्स) मर्दन शिवत्व की साधना, भाद्रपद के पूर्वार्द्ध में परमेश्वर के परिपूर्णावतार लीलापुरुषोत्तम का प्राकट्योत्सव, व अत्तरार्द्ध में शिवत्व के लिए पार्वती के तप व लक्ष्यवेध की प्रतीक हरतालिका तीज, विघ्नविनाशक गणपति की साधना पर्व गणेशचैथ तथा तपबल से सौरमंडल में रहकर अपनी वेब्स से सज्ज्योति देने वाले सप्तर्षियों की आराधना पर्व ऋषि पंचमी की त्रिवेणी में दशलाक्षणी धर्म का ‘‘आत्म-मंथनीय’’ दश धर्मकलशों से क्रमशः 1. क्षमा, 2. मार्दव, 3. आर्जव, 4. शौच, 5. सत्य, 6. संयम, 7. तपस्या, 8. त्याग, 9. असंचय व 10. ब्रह्मचर्य रूपी ‘अमृत’ द्वारा स्वयं वाह्याभ्यान्तर शुद्धि हेतु अभिषेक प्रक्रिया विज्ञानपरक रहस्य को समेटे हुए है। इसी को सद्धर्म कहा गया है। क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तपस्या, त्याग, असंचय व ब्रह्मचर्य का मन-वाणी और कर्म में समावेश अजस्र ऊर्जा शक्ति को जाग्रत करता है, जो क्रमशः ऋषित्व, शिवत्व और सत्व के सोपान पर चढ़ते हुए सारूप्य मोक्ष यानी कैवल्य तक पहुंचाता है। -देवेश शास्त्री⏎ ⏎ ==मृत्युलोक का सत्य!== वास्तव में मृत्युलोक का सत्य सिर्फ मृत्यु है। यहां ईश्वर भी यदि किसी अवतार के रूप में आये तो उन्हें भी जाना पड़ा। कविवर शिशु जी लिखते है- ‘‘पता नहीं जाने वाले को आना भी पड़ता है, किन्तु यहां आने वाले को जाना ही पड़ता है। (contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है। All content in the above text box is licensed under the Creative Commons Attribution-ShareAlike license Version 4 and was originally sourced from https://hi.wikibooks.org/w/index.php?diff=prev&oldid=6462.
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