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==जिन्दगी== 
जिन्दगी मुझको लगी, महबूब का ज्यों प्यार हो। 
जिन्दगी ऐसी खली, ज्यों नफरतों का हार हो।।

 रंगीनियत कुछ पल समेटे आ गयी जब सामने, 
हूरे-जन्नत जिन्दगी, उस पर किये सिंगार हो।
 
जब खुशी में हो गया, पागल बताऊँ क्या तुम्हें, 
जिन्दगी मीठी लगी खट्टी लगी ज्यों जार हो।
 
कष्ट का जब सिलसिला आया, चला, चलता रहा, 
जिन्दगी यो लग रही थी, खड्ग की ज्यों धार हो।
 
पल खुशी के हमने हँसते, काटे न मालूम ही पड़ा, 
जिन्दगी का अर्थ लगता था, गुले गुलजार हो।
 
जिल्लतों का समय, काटे से भी कटता है नहीं, 
जिन्दगी है बन गया अश्कों का लम्बा हार हो।
 
जहर का प्याला नहीं, अमृत की भी बूँदें नहीं, 
जिन्दगी के जाम में, अंगूर का ज्यों क्षार हो।

-देवेश शास्त्री

==आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण ==
आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प(contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है।