Difference between revisions 7120 and 9798 on hiwikibooks== जिन्दगी == जिन्दगी मुझको लगी, महबूब का ज्यों प्यार हो। जिन्दगी ऐसी खली, ज्यों नफरतों का हार हो।। रंगीनियत कुछ पल समेटे आ गयी जब सामने, हूरे-जन्नत जिन्दगी, उस पर किये सिंगार हो। जब खुशी में हो गया, पागल बताऊँ क्या तुम्हें, जिन्दगी मीठी लगी खट्टी लगी ज्यों जार हो। कष्ट का जब सिलसिला आया, चला, चलता रहा, जिन्दगी यो लग रही थी, खड्ग की ज्यों धार हो। पल खुशी के हमने हँसते, काटे न मालूम ही पड़ा, जिन्दगी का अर्थ लगता था, गुले गुलजार हो। जिल्लतों का समय, काटे से भी कटता है नहीं, जिन्दगी है बन गया अश्कों का लम्बा हार हो। जहर का प्याला नहीं, अमृत की भी बूँदें नहीं, जिन्दगी के जाम में, अंगूर का ज्यों क्षार हो। -देवेश शास्त्री == आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण == आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प्रतिकूलता दुःख । अनासक्त भाव को इस तरह देखें - आसक्ति व विरक्ति दोनों से श्रेष्ठ है अनासक्ति, जिससे परमानंद की अनुभूति होती है। आत्मदृष्टा जब अंतर्मुखी हो जाता है परमात्मरूप ( videh) प्रतीत होता है , उसकी हर गतिविधि रहस्य प्रतीत होती है । == हरतालिका-गणपति-सप्तर्षि त्रिवेणी में ‘दश-लाक्षणी’ धर्म का विज्ञानपरक रहस्य == ----------------------------------------------- देवशयनी एकादशी से देवोत्थानी एकादशी तक चातुर्मास्य ‘‘आत्मशोधन का कालखंड’’ माना जाता है। सावन में काम (सेक्स) मर्दन शिवत्व की साधना, भाद्रपद के पूर्वार्द्ध में परमेश्वर के परिपूर्णावतार लीलापुरुषोत्तम का प्राकट्योत्सव, व अत्तरार्द्ध में शिवत्व के लिए पार्वती के तप व लक्ष्यवेध की प्रतीक हरतालिका तीज, विघ्नविनाशक गणपति की साधना पर्व गणेशचैथ तथा तपबल से सौरमंडल में रहकर अपनी वेब्स से सज्ज्योति देने वाले सप्तर्षियों की आराधना पर्व ऋषि पंचमी की त्रिवेणी में दशलाक्षणी धर्म का ‘‘आत्म-मंथनीय’’ दश धर्मकलशों से क्रमशः 1. क्षमा, 2. मार्दव, 3. आर्जव, 4. शौच, 5. सत्य, 6. संयम, 7. तपस्या, 8. त्याग, 9. असंचय व 10. ब्रह्मचर्य रूपी ‘अमृत’ द्वारा स्वयं वाह्याभ्यान्तर शुद्धि हेतु अभिषेक प्रक्रिया विज्ञानपरक रहस्य को समेटे हुए है। इसी को सद्धर्म कहा गया है। क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तपस्या, त्याग, असंचय व ब्रह्मचर्य का मन-वाणी और कर्म में समावेश अजस्र ऊर्जा शक्ति को जाग्रत करता है, जो क्रमशः ऋषित्व, शिवत्व और सत्व के सोपान पर चढ़ते हुए सारूप्य मोक्ष यानी कैवल्य तक पहुंचाता है। -देवेश शास्त्री == मृत्युलोक का सत्य! == वास्तव में मृत्युलोक का सत्य सिर्फ मृत्यु है। यहां ईश्वर भी यदि किसी अवतार के रूप में आये तो उन्हें भी जाना पड़ा। कविवर शिशु जी लिखते है- ‘‘पता नहीं जाने वाले को आना भी पड़ता है, किन्तु यहां आने वाले को जाना ही पड़ता है। पौराणिक आख्यानों में ऐसे तमाम राक्षसी वृत्ति के लोगों के प्रसंग देखने को मिलते हैं जिन्होंने मौत पर विजय पाने के लिए तपबल से ईश्वरीय क्षमता हासिल कर ली हो मगर उन्हें भी मृत्यु से पराजित होना पड़ा। हिरण्यकश्यप ने वर पाया-‘‘ न दिन में, न रात में, न घर में, न बाहर, न नर से, न पशु से, न आधि से और व्याधि से मरूं’’ यानी मृत्युलोक के सत्य ‘‘मृत्यु’’ पर विजय का भ्रम पाला। स्वयं ईश्वर को ‘नृसिंह’ रूप धारण करके आना पड़ा। संध्या काल (न दिन, न रात) देहरी पर (न घर, न बाहर) आदि वर की गरिमा का पालन हुआ और मृत्युलोक के सत्य का वरण भी करना पड़ा। आज हम 21 वी सदीं के आई टी के क्रांति दौर से गुजर रहे हैं और अनीति, अन्याय, अधर्म और असत् से धनार्जन कर रहे हैं। निरंतर सम्पदा के विस्तार की प्रवृत्ति इस मनो-दशा को परिभाषित करती है कि ‘‘हम कभी मरेंगे नहीं, और युग युगांतर भोगते रहेंगे।’’ जन्म-जन्मान्तर के संचित कर्म फल (प्रारब्ध को) भुलाना ही मृत्यु है। जो सन्मार्ग पर चलते हुए प्रारब्ध को स्वीकार कर जीवन यापन करते हुए मृत्यु को सहर्ष स्वीकार करता है, वह मरकर भी नहीं मरता। मृत्यु से तात्पर्य देहान्तरण है, हमारी कृत्य संचित कर्मफल में जुड़कर अगले परिवेश रूपी देह का चयन कर लेते हैं। इसी आधार पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- ‘‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि..’’ मृत्युलोक सिर्फ देहान्तरण की सत्यता को सिद्ध करता है जिसे मृत्यु कहा गया है, यह भी एक विभ्रम है। -देवेश शास्त्री == मानव बनकर निःश्रेयस वन में कल्पवृक्ष की छााया में खुख पायें == गर्ग संहिता के विश्वजित खंड में प्रसंग आता है कि जब कृष्णकुमार प्रद्युम्न यादवसेना के साथ ब्रह्मांड विजय को निकलते हैं तो ‘रम्यकवर्ष’ में दैत्यराज कालनेमि (जिसका संहार हनुमानजी ने संजीवनी लेने जाते समय तब कर दिया था जब उसने साधु बनकर रास्ता रोका था) के पुत्र ‘‘कलंक’’ ने यादव सेना से भीषण युद्ध किया। साक्षात् कामदेव स्वरूप प्रद्युम्न ने कलंक पर ‘मारुत्यास्त्र’ का संधान किया। ‘मारुत्यास्त्र’ से बजरंगबली ने प्रकट होकर कालनेमि सुत कलंक का अंत कर दिया। रम्यकवर्ष में ‘‘मानवीय गिरि’’ है, जिसकी उपत्यिका में ‘‘निःश्रेयस वन’’ है, जो पारिजात (कल्पवृक्षों) का है। जिनकी छाया में कामधेनु गायें विचरण करती हैं। भाव लोक में इस प्रसंग को समझें- रम्यकवर्ष यानी रमने योग्य राष्ट्र में प्रवेश संभव नहीं है, क्योंकि कलंक ही अवरोधक है जो जीव को भृंगीवृत्ति से सारूप्य यानी कलंकित कर देता है। मारुत्यास्त्र रूपी ब्रह्मचर्य बल से कलंक को नष्ट किया जाता है तब मानवीयगिरि की दुर्गम चढ़ाई पर आगे बढ़ सकते हैं। मानवीयगिरि से तात्पर्य मानवीयता से है, जो अति दुर्गम है मानवीयगिरि का आरोहण में स्वार्थ और महत्वाकांक्षा रूपी असंख्य रासायनिक-फिसलन है, मानवीयगिरि पर आरोहित विजेता ‘‘मानव’’ होता है। जो निःश्रेयसवन पहंुचता है यानी श्रेयात्मक महत्वाकांक्षा से परे हो जाता है वह ब्रह्मनिष्ठ परमहंस ही ‘‘सत्य’’ का सामीप्य योग पाकर कल्पवृक्ष का सुख भोगता है और कामधेनु का पयपान करते हुए सारूप्य मोक्ष पाता है। == सत्कर्मों का प्रताप == http://hi.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8B_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A5%8D ‘‘सत्कर्मों का प्रताप’’ अपने आप में करोड़ों सूर्याें की ‘‘अनंत ऊर्जा यानी महत्तेज’’ जिससे दैहिक, दैविक व भौतिकताप स्वतः आने से पहले ही अस्तित्वहीन हो जाते हैं तथा अथाह ‘ब्रह्मद्रव का ऐसा प्रवाह जिसके आगे खड़ी चट्टानों के परखच्चे उड़ जाते हैं। आयें, पहले ‘सत्कर्म’ और ‘प्रताप’ शब्दों को समझें- सत् ही परमसत्ता है, प्रत्येक विचारक ‘‘कर्मसिद्धांत’’ को सर्वोपरि मानते हैं, संचित कर्मों के फल को ‘प्रारब्ध’ कहा गया है। गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कर्मयोग का उपदेश दिया। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा- ‘‘जो जस करहि, सो तस फल चाखा।’’ कर्मगति ही जब प्रारब्ध है तो उसे भोगना ही है। ऐसे सर्वाधार ‘कर्म’ को परमसत्ता ‘सत’ को सौपना यानी कर्मों को सत् से संबद्ध करना ही सत्कर्म है। जो क्रमशः बुद्धिगत चिंतन, आहार, व्यवहार आदि सोपान से आगे बढ़ता है इन्हें भी सत् से जोड़ना होगा- सद्बुद्धि होने पर सद्विचार आयेंगे सात्विक आहार होगा, तब सदाचरण (सत् आचरण) होगा। इन सोपानों से आगे बढ़कर हम जिस रास्ते पर होंगे वह सत्पथ यानी सन्मार्ग होगा। इस रास्ते से ही हमारा कर्म, अकर्म व विकर्म सभी कुछ सत्कर्म हो जायेंगे। == .. अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये! == ��जलाओ दिये, पर रहे ध्यान इतना। अंधेरा धरा पर, कहीं रह न जाये।�� पद्मश्री गोपालदास �नीरज� की इन पंक्तियों के गूढ़ार्थ को समझना ही जीवन को दिव्य बनाना है। जीवन ही समाज है, समाज ही देश और विश्व है। दीपोत्सव से तात्पर्य विश्व को ��दिव्य-आलोक�� से प्रकाशित करना। अंधेरा मिटाने के लिए दीप प्रज्ज्वलित करना, महज वार्षिक अनुष्ठान न होकर नियमित प्रक्रिया होनी चाहिए। अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म का गहन अंधकार हम सबकी स्वार्थाच्छादित कलुषित मानसिकता से बढ़ता ही जा रहा हैं। वर्ष में एक दिन विशेष को प्रकाश-पर्व(contracted; show full)य अंधकार को मिटाने का दंभ और सर्व जनोपयोगी �तेज� को कृत्रिम प्रसाधनों से हथियाने (हक हरण) की वृत्ति के भ्रम में �तम� की ही परत हम मोटी करते जा रहे है। ��तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय, मृत्युर्मामृतं गमय�� की प्रार्थना के साथ ज्ञान, सत्य, नीति, न्याय, धर्म की दीपमालिका विवेकपूर्ण रंगोली की बुद्धि पर प्रज्ज्वलित करें जिससे ��आत्म-तत्व�� का प्रकाशपुंज अज्ञान, असत्य, अनीति, अन्याय, अधर्म का गहन अंधकार को मिटा देगा। -सत्यमेव जयते- तेजोऽसि तेजो मयि देहि। ओजोऽसि ओजो मयि देहि। वीर्याेऽसि वीर्यो मयि देहि। == सत्याय मितभाषिणाम् == आज शोभन सरकार की भविष्यवाणी पर न केवल सरकार बल्कि समूचा विश्व आंखें जमाये उन्नाव जिले के डौंड़िया खेड़ा में स्वर्णभंडार होने की सत्यता पर अनेकानेक भ्रम और संशय के भ्रमर जाल में उलझता हुआ प्रतीत हो रहा है। क्या स्वप्न कोेे प्रतीक बनाकर की गई भविष्यवाणी सच होगी? (contracted; show full) समझा जाता है कि एकांतवासी, मौनी ‘‘शोभन सरकार’’ का कथन सच होगा, क्योंकि वे सही मायने में संत हैं। इसका प्रमाण यही है कि डौंड़िया खेड़ा में चिन्हित स्थानों पर स्वर्ण-भंडार होने की पुष्टि भूगर्भ विज्ञान संयंत्रों द्वारा की गई। -देवेश शास्त्री == संकल्प का अभाव क्यों? == आज हम विकल्पों में उलझकर संकल्प-शक्ति से दूर जा चुके हैं, संकल्प वह अजस्र ऊर्जा संपन्न साधना है, जो प्रत्येक ‘कल्पना’ को साकार बना सकता है। संकल्प से दूरी का मुख्य कारण वैकल्पिक जगत रूपी ‘मायाजाल’ में चित्त का उलझाव। (contracted; show full)ं संकल्पित होकर ‘सदाचार’ हमें रामराज्य स्थापित करने के बापू की कल्पना को साकार किया जा सकता। बापू का संदेश ‘जो परिवर्तन लाना चाहते हो स्वयं उसका हिस्सा बनो अर्थात् उसे धारण करो’ ऐसा संकल्प है, जिसके बूते पर स्वयं सत्य-अहिंसा को धारण करके बापू ने 90 वर्ष जले ‘‘महाभारत’’ (स्वतंत्रता संग्राम) का परिणाम स्वरूप स्वाधीनता दिलाई। कल्पना थी रामराज्य लाने की। आज उनके अनुयायी ‘रावणराज्य’ कायम किये हंै। ‘रावणराज्य’ यानी लूटमार, अनाचार अत्याचार, व्यभिचारादि कदाचार का बोलबाला। हम विकल्प के मकड़जाल में उलझे हैं, लगातार सत्ता परिवर्तन करते हुए कदाचार की गिरफ्त में हैं। क्योंकि संकल्प का अभाव है। इस वक्त जो भी क्रियाकलाप सामने दिखाई दे रहे हैं, स्वयं हमारे द्वारा बुना गया वैकल्पिक मकड़जाल है। मकड़ी अपनी लार से जाल पूरती है, और फिर उसी मंे फंसकर जान गवां देती है, लेकिन संकल्प शक्ति के बूते पर कुछेक मकड़ीं अपनी लार से बुने गये जाल को पुनः स्वयं में समाहित कर लेतीं है। यही ईश्वरीय सत्ता का वेदान्तगत संकल्प है। (contracted; show full)‘‘रिश्वत लेना पाप है पर देना अभिशाप। लेना-देना बंद हो, तभी मिटे संताप।।’’ जब हर कोई स्वार्थ और महत्वाकांक्षा त्यागकर सत्यनिष्ठा के संकल्प पर केंद्रित होगा। तो लूटमार करने वाले बाल्मीकि और अंगुलिमाल सरीखे कदाचारी लोग भी ‘‘महर्षि व भिक्षु’’ बन जायेंगे। आयें असीम ऊर्जास्पद संकल्पशक्ति जगायें == कार्य ही पूजा है! == वर्क इज वर्शिप, भरतीय षड्दर्शन, प्रस्थानत्रय (गीता, वेदान्त, ब्रह्मसूत्र) आदि सभी धर्मग्रंथ कर्म सिद्धांत को प्रतिपादित करते हैं। इसी आधार पर कार्य को पूजा की संज्ञा दी गई है। कृ धातु में यत् प्रत्यय के साथ शब्द बना कार्य। कार्य से तात्पर्य है, करने योग्य। यथा पाठ्य-पढ़ने योग्य, पूज्य- पूजा के योग्य, दृश्य- देखने के योग्य। करने के योग्य जो है, वही कार्य अर्थात् कर्म है। जो करने योग्य नहीं है, और हो जाये वह अकर्म और विकार (दोष) युक्त विकर्म होता है। जबकि निषिद्ध कर्म कुकर्म की श्रेणी में आते हैं। अकर्म, विकर्म, कुकर्म (दुष्कर्म) आदि पूजा नहीं हैं। कर्म पूजा है किन्तु कर्म की कसौटी बड़ी खरी है, जीव द्वारा किया जाने वाले प्रत्येक कार्य को पूजा मान लेना अनिष्टकारी है। जब सत् ही ईश्वर है तो सत् की सत्ता का गुणगान यानी पूजा सत् से समाहित कर्म हुआ अर्थात् सत्कर्म ही कार्य है यानी करने योग्य है। वही पूजा है। आदि शंकराचार्य ने परापूजा स्तोत्र में लिखा है- अखंड, सच्चिदानंद, निर्विकल्प अद्वितीयभाव की पूजा कैसे हो? जो पूर्ण है उसका आवाहन? जो सर्वाधार है उसे आसन देना? स्वच्छ को अघ्र्य, शुद्ध को आचमन, निर्मल को स्नान? विश्वोदर यानी जिसके उदर में सारा ब्रह्मांड है उसे वस्त्र? अगोत्र को जनेऊ? निर्लेप को गंध? निर्वासित को पुष्प? निराकार को आभूषण? निरंजन को धूप? सर्वसाक्षी को दीप? स्वयंप्रकाशवान् को आरती? अनंत की परिक्रमा? जिसके रहस्य को वेद भी नहीं बता सके नेति नेति ही कह पाये उसकी स्तुति? अन्तर्बहि सर्वत्र स्थित का अवसान? इस तरह सत् पर केंद्रित प्रत्येक क्रिया कलाप ही परापूजा है। ‘‘आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहे। पूजा ते विविधोपभोग रचना निद्रा समाधिस्थितिः।। संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो। यद्यत्कर्मं करोमि तत्तदखिलं शंभो! तवाराधनम्।।’’ शरीर रूपी मंदिर में परमात्मतत्व तू शिव ही आत्मा, प्रकृति/माया स्वरूपिणी पार्वती बुद्धि, सहयोगीगण प्राण है विभिन्न भोग उपयोग रचना यानी क्रिया ही पूजा तथा समाधि की स्थिति नींद है। पैरो का संचार यानी चलना ही परिक्रमा और हर प्रकार की ध्वनि यानी वाणी स्तुतिगान है। हे प्रभु! इस तरह मैरे द्वारा किया जाने वाला प्रत्येक कर्म आपकी आराधना है। - देवेश शास्त्री == सकारात्मक दिशा में उठने लगी ‘भाव-चक्र’ सुनामी == सामवेद में उल्लेख है कि भाव- प्रवाह उसी तरह अपना सर्किल पूरा करता है, जिस तरह विद्युत- प्रवाह। भाव प्रवाह से उत्पन्न होता है गायन। गायन में है मोम को पिघलाने, पानी में आग लगाने और बादल बुलाकर जलवृष्टि करने की अपरिमित शक्ति। विद्युत (ऊर्जा) प्रवाह की भांति एक बार फिर भाव प्रवाह अपना सर्किल पूरा करते हुए ऐसी भावात्मक ‘‘सुनामी’’ ला रहा है, जो जन-मन के ‘व्यवस्था परिवर्तन लक्ष्य’ लक्ष्य पर ले जायेगा। (contracted; show full) इन तीन बिन्दुओं पर विद्युत प्रवाह की तरह भाव-प्रवाह तीब्र गति पकड़ने लगा। प्रथम बिन्दु वाड्रा पर वरिष्ठ सपा नेता आजम खां ने एक कदम आगे बढ़कर कोमनबेल्थ खेल घोटाले में भी वाड्रा को घसीट दिया। ये क्या सहयोगी दल का नेता ही केंद्र सुप्रीमो की पोल खोलने लगा? यही है सर्किल पर गतिशील भाव-प्रवाह। इसी क्रम में दूसरी ओर हरियाणा के कद्दावर नेता चैटाला ने युवराज राहुल के कारनामे का खुलाशा कर दिया। दूसरे बिन्दु जाकिर हुसैन ट्रस्ट के बैनर से कानूनमंत्री नवाब खुर्शीद के गोरखधंधे पर समूचा विपक्ष ही नहीं, सहयोगी सपा के लीडर आजम खां भी बोल पड़े। सत्तापक्ष की बोलती बंद देख कानूनमंत्री की अंतरात्मा की आवाज इस रक्तिम अंदाज में प्रस्फुटित हुई। ये सब कुछ सबके सामने है। इस तरह जो भाव-प्रवाह अपने सर्किल आगे बढ़ता जायेगा। स्वयं सियासी जमात एक दूसरे को निर्वस्त्र करती जायेगी। प्रभावित जनमानस अपने वोट के तथाकथित दुरुपयोग पर प्रायश्चित करेगी। ‘अरे, लालच में पड़कर मैने लुटेरे को अपना वोट दिया।’’ यह भाव अपना सर्किल पूरा करेगा, पूरा देश भावात्मक साम्यता से ‘‘सुनामी’’ प्रकट होगी- सत्यनिष्ट ईमानदार उम्मीदवार को वोट देने में अपना व जनतंत्र का हित मानेगी। तब भी भाव-प्रवाह ही सक्रिय होगा, फलस्वरूप सभी राजनैतिक दल प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया बदलकर आन्तरिक परिशोधनात्मक सर्किल पर दौड़ेंगे। एक दूसरे के मुकाबले भले, ईमानदार व सच्चरित्र प्रत्याशियों को जनता की अदालत में पेश करेंगे। उनमें से चयन करते हुए अच्छे, ठीक, उत्तम व अत्युत्तम की कोटि निर्धारित कर अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। संसदीय जनतंत्र प्रदूषण मुक्त होगी। सवाल उठता है कि क्या यह संभव है? हां, बशर्ते चक्रवात की तरह जो भाव-प्रवाह का तूफान उठ रहा वह शाट-सर्किट की भेंट न चढ़ेे और अपना सर्किल पूरा करते हुए सियासी-समुद्र में भयावह लहरें उठाने वाली ‘सुनामी’ बन जाये। - देवेश शास्त्री == हृदय परिवर्तन की अनोखी ‘ज्योति’ का प्रस्फुटन इटावा से == एलेन ओक्टेवियन ह्यूम और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस :-------------------- देवेश शास्त्री -------------------------- आज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थिति की तुलना यदि अपने मित्र दीपचन्द्र त्रिपाठी ‘निर्बल’ के इस दोहे के आधार पर बहुसंख्यक समुदाय के हालात से करें तो समुचित होगा- ‘‘सहमे सहमे से रहते हैं, हिन्दू हिन्दुस्तान में। ईश्वर जाने कैसे रहते होंगे पाकिस्तान में।।’’ हां, आज जहां एक ओर हिन्दू सहमा हुआ, वहीं दूसरी ओर वह कांग्रेस जिसे खड़ा होने में जितना समय लगा, उतना ही पतन में। जिसकी कभी तूती बोलती थी, आज लोकसभा में प्रतिपक्ष दल होने की भी हैसियत नहीं जुटा पा रही है, निसंदेह यह ‘कर्मगति’ है। उसी तरह तथाकथित हिन्दुत्व की झंडावरदार पार्टी के प्रभुत्व में हिन्दू अपने बिछुड़े साथियों को घर में वापस लाने के प्रयास को भी आपराधिक श्रेणी में गिना जा रहा है। तब लगता है- ईश्वर जाने कैसे रहते होंगे पाकिस्तान में? आज 28 दिसम्बर है, 129 वर्ष पहले यानी 1885 को आज ही के दिन आतताई ब्रिटिश हुकूमत के एक अफसर ने भारत की आजादी और स्वराज के लिए एक ‘प्लेटफार्म’ दिया, जो है ‘‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस।’’ अंग्रेज अफसर का आखिर हृदय परिवर्तन कैसे हुआ, संस्कृतनिष्ठा और इष्टसाध्य इटावा की अदृश्य ज्योति से! ............... 1829 को इंग्लैंड में जन्में एलेन ओक्टेवियन ह्यूम ब्रिटिश कालीन भारत में सिविल सेवा के अधिकारी एवं राजनैतिक सुधारक थे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक थे। इसी पार्टी ने भारत की स्वतंत्रता के लिये मुख्य रूप से संघर्ष किया और अधिकांश संघर्षों का नेतृत्व किया। ए. ओ. ह्यूम ने भारत में भिन्न-भिन्न पदों पर काम किया इनमें ‘इटावा का कलक्टर पद’ महत्वपूर्ण है, यही हुए हृदय परिवर्तन ने भारतवर्ष की स्वतंत्रता की नींव रखी। ‘‘ब्रिटिश हुकूमत के प्रति बफादार व समर्पित हिन्दुस्तानियों का संगठन खड़ा करने की मानसिकता ने इंडियन नेशनल कांग्रेस का खाका भले ही ए. ओ. ह्यूम के दिमाग में खिंचा था, मगर उस वक्त राष्ट्रभक्त हिन्दुस्तानियों के विद्रोही तेवर के आगे ए. ओ. ह्यूम को मुंह की खानी पड़ी, और जान बचाकर महिला के लिवास में जिलामुख्यालय इटावा छोड़कर यमुनापार भागना पड़ा। इस घटना ने कलक्टर का हृदय परिवर्तन कर दिया और दिमाग में ‘ब्रिटिश हुकूमत के प्रति बफादार व समर्पित हिन्दुस्तानियों का संगठन खड़ा करने खाका स्वतः बदल गया। यही है इष्टसाध्य इटावा की अदृश्य ज्योति का कमाल।’’ यहां उस अदृश्य ज्योति का भी उल्लेख प्रासंगिक है, जिसे गीताप्रेस गोरखपुर की पुस्तक एक लोटा पानी में पढ़ा जा सकता है। ब्रिटिश हुकूमत के ही भरथना के डिप्टी कलक्टर सर सप्रू अपने सेवक के एक दृष्टान्त से विरक्त होकर सिद्ध सन्त खटखटा बाबा हो गये, बाबा की चमत्कारी सिद्धि से प्रभावित होकर ब्रिटिश हुकूमत के ही जिला जज, मैनपुरी भी नौकरी छोड़कर खटखटा बाबा के शिष्य बन गये। इटावा में रहते हुए कलक्टर ए. ओ. ह्यूम कालेज, कोतवाली, जिला परिषद भवन सहित कई इमारतें, अनाज मंडी (जिसे ह्यूमगंज नाम दिया गया) व सड़के बनवाई। किन्तु कदाचार से पूरी तरह विरक्त हो चुके ए. ओ. ह्यूम ने 1882 में अवकाश ग्रहण किया। वरिष्ठ अधिवक्ता स्व. पं. कृष्ण गोपाल चैधरी द्वारा लिखी गई पुस्तक से तमाम रहस्योद्घाटन होते हंै जो मूलतः कलक्टर ह्यूम व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर केन्द्रित है। इंग्लैंड में ह्यूम साहब ने अंग्रेजों को यह बताया कि भारतवासी अब इस योग्य हैं कि वे अपने देश का प्रबंध स्वयं कर सकते हैं। उनको अंग्रेजों की भाँति सब प्रकार के अधिकार प्राप्त होने चाहिए और सरकारी नौकरियों में भी समानता होना आवश्यक है। जब तक ऐसा न होगा, वे चैन से न बैठेंगे। (contracted; show full) ब्रिटिश सरकार के असंतोष जनक कार्यों के फलस्वरूप भारत में अद्भुत जाग्रति उत्पन्न हो गई और वे अपने को संघटित करने लगे। इस कार्य में ह्यूम साहब से भारतीयों बड़ी प्रेरणा मिली। 1884 के अंतिम भाग में सुरेंद्रनाथ बनर्जी तथा व्योमेशचंद्र बनर्जी और ह्यूम साहब के प्रयत्न से इंडियन नेशनल यूनियम का संघटन किया गया। 27 दिसम्बर 1885 को भारत के भिन्न-भिन्न भागों से भारतीय नेता बंबई पहुँचे और दूसरे दिन 28 दिसम्बर 1885 को 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति में बाम्बे के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में सम्मेलन आरंभ हुआ। इस सम्मेलन का सारा प्रबंध ह्यूम ने किया था। इस प्रथम सम्मेलन के सभापति व्योमेशचंद्र बनर्जी बनाए गए थे जो बड़े योग्य तथा प्रतिष्ठित बंगाली क्रिश्चियन वकील थे। यह सम्मेलन ‘‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 1907 में काँग्रेस में दो दल बन चुके थे - गरम दल एवं नरम दल। गरम दल का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं बिपिन चंद्र पाल (जिन्हें लाल-बाल-पाल भी कहा जाता है) कर रहे थे। जबकि नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता एवं दादा भाई नौरोजी कर रहे थे। गरम दल पूर्ण स्वराज की माँग कर रहा था परन्तु नरम दल ब्रिटिश राज में स्वशासन चाहता था। प्रथम विश्व युद्ध के छिड़ने के बाद सन् 1916 की लखनऊ बैठक में दोनों दल फिर एक हो गये और होम रूल आंदोलन की शुरुआत हुई जिसके तहत ब्रिटिश राज में भारत के लिये अधिराज्य अवस्था (डामिनियन स्टेटस) की माँग की गयी। परन्तु 1915 में गाँधी जी के भारत आगमन के साथ काँग्रेस में बहुत बड़ा बदलाव आया। चम्पारन एवं खेड़ा में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जन समर्थन से अपनी पहली सफलता मिली। 1919 में जालियाँवाला बाग हत्याकांड के पश्चात गान्धी जी काँग्रेस के महासचिव बने। उनके मार्गदर्शन में काँग्रेस कुलीन वर्गीय संस्था से बदलकर एक जनसमुदाय संस्था बन गयी। तत्पश्चात् राष्ट्रीय नेताओं की एक नयी पीढ़ी आयी जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई एवं सुभाष चंद्र बोस आदि शामिल थे। गान्धीजी के नेतृत्व में प्रदेश काँग्रेस कमेटियों का निर्माण हुआ, काँग्रेस में सभी पदों के लिये चुनाव की शुरुआत हुई, सभी भेदभाव हटाये गये एवं कार्यवाहियों के लिये भारतीय भाषाओं का प्रयोग शुरू हुआ। काँग्रेस ने कई प्रान्तों में सामाजिक समस्याओं को हटाने के प्रयत्न किये जिनमें छुआछूत, पर्दाप्रथा एवं मद्यपान आदि शामिल थे। == क्या मै संस्कृतनिष्ठ हूं? == श्रावणी पूर्णिमा ‘‘संस्कृत दिवस’’ के रूप में मनाई जाती है। आखिर क्यों? इस प्रश्न ने कई बार मुझे झकझोरा, आखिर हम लोग (कथित रूप से संस्कृतनिष्ठ) संस्कृत दिवस क्यों नहीं मनाते? जब हम नहीं मनायेंगे तो कौन मनायेगा? एक प्रश्न के झकझोरने से जब दो प्रश्न खड़े हुए, तो अपने अंदर झांकने का प्रयास किया, तो फिर नया प्रश्न खड़ा हो गया कि क्या वास्तव में हम संस्कृत दिवस मनाने की अर्हता रखते हैं? यानी संस्कृतनिष्ठा ही यदि अर्हता है, तो क्या हम अर्ह है? मतलब ये हुआ कि हम स्वयं के संस्कृतनिष्ठ होने को पहले सिद्ध करें, तब (contracted; show full)ही संस्कृतनिष्ठा हुई और सत्य के प्रति निष्ठुरता सत्यनिष्ठा। निष्ठा के इस तत्वार्थ ने निश्चित रूप से उलट-पुलट कर दिया। नहीं, वास्तव में निष्ठा का तत्वार्थ है ‘‘सिद्धावस्था’’ अर्थात् एकात्म होना यानी मन, वाणी और कर्म से परे संस्कृतात्म (स्वयं यानी आत्मा को संस्कृतमय) होना ही संस्कृतनिष्ठा है। इसी क्रम में स्वयं को संस्कृतमय (संस्कृतात्म) करते ही, स्वयं सत्यात्म यानी सत्यमय हो जाना, स्वाभाविक परिवर्तन अनुभवगम्य है, वही आत्मा-परमात्मा के एकीभाव यानी अद्धैत की ‘‘सिद्धावस्था’’ है। - देवेश शास्त्री 9456825210 == कोई नहीं जाता खाली हाथ == सब कुछ समेट के ले जाना पड़ता है ‘‘जो जस करहि सो तस फल चाखा।’’ यानी कर्मगति को ही प्रारब्ध कहा गया है। ‘‘राम कीन्ह चाहइ सोइ होई।’’ यानी परमात्मा जो चाहता है वही होता है। दोनों कथन विरोधाभासी प्रतीत हो रहे हैं लेकिन हैं नहीं। गीता मंे योगेश्वर कृष्ण कहते हैं- ‘‘कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्।’’ स्पष्ट है कि कर्मानुसार फल देना परमात्मा के अधीन है। दर्शनशास्त्र इसी कर्मसिद्धांत को परिभाषित करते है। अर्थात् हम स्वयं अपनी अगली योनि के नियंता हैं, कोई और नहीं। शरीर छोड़कर जीवात्मा अपने साथ वह सब कुछ ले जाता है, जो उसने सजोया है। ‘‘मुट्ठी बांधे आये जग में हाथ पसारे जायेगा।’’ मिथ्या मिथक है। मुट्ठ(contracted; show full) पाप-पुण्य ही साथ जाने के सूत्र का रहस्य भौतिक सम्पदा साथ ले जाना है। उदाहरण के रूप में एक अतिविपन्न परिवार में उत्पन्न शिशु अपने पूर्वकृत कर्मों के पुण्य की क्रकडिट पर पढ़-लिखकर उच्चपद पा लेता है। हालात बदलते हंै, विपन्नता दूर हो जाती है। भौतिक संपदा चारों ओर घेर लेती है। यानी वह अपने पूर्वजन्म की ही संपदा को भोगने लगता है। दूसरी ओर एक अतिसंपन्न धनाढ्य व्यक्ति मरता है, लगता है वह अपनी भौतिक सम्पदा यहीं छोड़कर गया है, वह सन्तान के अपने पाप की क्रेडिट पर व्यसनागत प्रवृत्ति से नष्ट होती जाती है, और वह भुखमरी की स्थिति में पहंुच जाता है। यही तो संपदा के हस्तान्तरण की प्रक्रिया है। यहां यह सूक्ति प्रासंगिक है-‘‘पूत कपूत तो का धन संचय?’’ ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की दशा और प्रभाव ‘कर्म’ पर केन्द्रित है। अमुक का ‘‘राजयोग’’ है, देखते ही देखते वह पीएम या सीएम अथवा उच्चपदस्थ अधिकारी हो गया। राजवैभव आ गया, वह वैभव पूर्वजन्म के अर्जित पुण्य का प्रभाव था, जो वह अपने साथ लाया था। काफी समय उसने वैभव भोग किया और किसी सामाजिक, आर्थिक अथवा राजनैतिक अपराध में फंस गया, जेल जाना पड़ा। भौतिक संपदा दूर हो गई, जन सामान्य की दृष्टि से पतित हो गया। कहा- अनिष्ट ग्रह की कुदृष्टि का प्रभाव है। वास्तव में संचित पुण्य की पूंजी समाप्त होते ही संचित पाप का प्रभाव ही अनिष्ट ग्रह की कुदृष्टि के रूप में परिभाषित की गई। यहां एक प्रसंग दृष्टव्य है- एक सेठ ऋणदाता के रूप मंे प्रख्यात थे, याचक जब चाहे अदा करे। यहां तक कि अगले जन्म में अदा करने की शर्त पर भी ऋण मिलता था। एक व्यक्ति आया और उसने दो लाख रुपये की याचना की और अगले जन्म में अदायगी का वायदा किया। धन मिल गया। वह व्यक्ति रकत लेकर रात में अपने मित्र के घर पर रुक गया। वहां रात में उसने दो बैलों के वार्तालाप को सुना- ‘मेरा कर्ज तो अदा हो गया और मैं मुक्त हो गया’ दूसरा बोला- ‘मेरे भी 300 रुपये शेष हैं मै भी जल्दी मुक्त हो जाऊंगा।’ सुबह हुई, पहला बैल फिसलकर गिरा और मर गया। जोड़ी टूट गई मित्र के धर लोग संवेदना व्यक्त करने आने लगे। किसी ने कहा-‘आपका एक बैल किस काम का, बेचोगे? हां, 300 रुपये दूं। लाओ। 300 रुपये देकर बैल लेकर वह चला कुछ दूर जाते ही वह भी गिर गया, मर गया। यह सब कुछ देखकर वह व्यक्ति सोचने लगा। अगले जन्म की अदायगी की शर्त पर लिये कर्ज के भुगतान के लिए मुझे भी कितने जन्मों तक इस दौर से गुजरना पड़ेगा? पाप और पुण्य के क्रेडिट कार्ड से अपनी भौतिक संपदा के हस्तान्तरण की प्रक्रिया का ही प्रभाव है कि प्रारब्ध वश एक कुत्ता एसी में मेम की गोद में रहता कीमती बिस्किट व अन्य भोज्य खाता वहीं दूसरा भोजन की जुगाड़ में कदम कदम पर डंडे खाता। स्पष्ट है कि आज हम जो भी भौतिक संपदा सजो रहे हैं। वह पाप और पुण्य के क्रेडिट कार्ड के रूप में समेटकर ले जायेंगे। -- देवेश शास्त्री == अहं भाव का आत्मरूप ही देवत्व == अहंकार है‘‘अंतश्चतुष्ट्य’’मन, चित्त, बुद्धि के मध्यस्थ का अवयव जो करता है अंतश्शत्रु का मुकाबला रामायण काल में दो बलिष्ट पात्र हनुमान और रावण हैं, रावणं अहंकारी है- ‘मेरी इन बड़ी भुजाओं ने कैलाश पहाड़ उठाया है, दानव मय इंद्र कुबेर बरुण इन बाणों से थर्राया है।’ यानी सफलता का हर पक्ष अहं से सराबोर है। दूसरी ओर हनुमान जी प्रत्येक सफलता के पीछे ईश्वरीय कृपा को श्रेय देते हैं-‘लांधि सिंधु हाटक पुर जारा, निशिचर गन वधि विपिन उजारा, सो सब तब कृपालु प्रभुताई, नाथ न कछू मोर प्रभुताई।’ निमित्तमात्र जीव अहंकार में(contracted; show full)्मतत्व में अहं का एकात्म ही अहंकार का मूलतत्व है। ‘‘सोऽहमस्मि’’ वह आत्मा ही मैं हूं। यानी वह परमात्मा मैं (जीवात्मा) हूं। सहज रूप में देही की प्रेरणा से देह जो कर रहा है, कह रहा है या विचार कर रहा है वह अहं (मैं) कर रहा हूं। यानी ईश्वर कर रहा है अर्थात् ईश्वरीय सत्ता से हो रहा है। ‘‘सोऽहमस्मि’’ जब तक मैं को शरीर तक सीमित माना गया। तब तक अहं रावण की तरह शक्ति को क्षीर्ण करने तत्व रहा। जब वही अहं आत्मतत्व में समाहित हुुआ तो हनुमानजी के लिए शक्ति संबर्द्धक हो गया और अहं ही देवत्व हो गया। -देवेश शास्त्री == new वर्ण व्यवस्था == 21वीं सदी में फिर नये स्तर से वर्ण व्यवस्था सामने आ रही है। वह भी कर्मानुसार है। विप्र स्वरूप क्रीमी लिअर वर्ग यानी बड़े राजनेता, प्रथम श्रेणी के प्रशासनिक अफसर, न्याय पालिका के उच्चस्तरीय जज व कुबेरात्मक उद्योगपति। एक हाई-फाई नेता, अफसर या जज अपनी संतान का संबंध क्रीमी लियर वर्ग में ही जायेगा वहां पुरानी वर्णव्यवस्था कोई मायने नहीं रखती। दूसरा वर्ण क्षत्रिय स्वरूप सुरक्षा वर्ग है, यहां सैन्य वर्ग आता है। वह थलसेना वायुसेना व नौसेना हो या फिर अर्द्धसैनिक वर्ग, पीएसी, पुलिस व गार्ड। इनमें भी जनरल, ब्रिगेडियर, कर्नल जवान आदि उपवर्ग है। वे भी पारस्परिक उपवर्ग में ही संबंध चाहेंगे। तीसरा वर्ण वैश्य स्वरूप मध्यम आय वाला वर्ग है- मध्यम वर्गीय नेता, प्रशासनिक कर्मचारी, लघु व मध्यम व्यवसाई, शिक्षक, वकील, चिकित्सक आदि। आमदनी पर क्रेंद्रित। चैथा वर्ण शूद्र स्वरूप होगा कृपाजीबी दरिद्र वर्ग। उक्त तीनों वर्णों की सेवा यानी चाकरी कर कृपापात्र बनकर जीने वाले। == दरिद्रता ही ब्राह्मण की ‘‘वैभव संपदा’’ == ‘‘जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्द्विज उच्यते।’’ जन्म से सब एक हैं, किन्तु संस्कारों से दूसरा जन्म पाना ही द्विजाति वर्ग यानी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य होते है। समाज में, व्यवसाय-आधारित चार वर्ण होते हैं। ब्राह्मण (आध्यात्मिकता के लिए उत्तरदायी ), क्षत्रिय (धर्म रक्षक), वैश्य (व्यापारी व कृषक वर्ग) तथा शूद्र (शिल्पी, श्रमिक समाज)। व्यक्ति की विशेषता,आचरण एवं स्वभाव से उसकी जाति निर्धारित होती थी। विप्र, द्विज, द्विजोत्तम, भूसुर आदि नामों से ब्राह्मण जाना जाता है। विद्वान, शिक्षक, पंडित, बुद्धिजी(contracted; show full) व्यवस्था में भिक्षा मांगते थे ईंधन चयन करते थे। क्या राजा ने कभी अनुदान नहीं देना चाहा? देना चाहा मगर स्वीकार नहीं किये गये। अन्यायोर्जित धन के नियोजन के बहुमंजिला शिक्षालयों में विद्या नहीं प्राप्त हो सकती। अविद्या का ही साम्राज्य है। विद्वता, शिक्षण, पांडित्य, तत्वज्ञान, विज्ञान अन्वेषण में चित्त पर नियन्त्रण(योगश्चित्तवृत्तिः निरोधः), इन्द्रियों पर नियन्त्रण, शुचिता, धैर्य, सरलता, एकाग्रता तथा ज्ञान-विज्ञान में विश्वास आवश्यक तत्वात्मक गुण हैं जिनमें धनाढ्ता बाधक ही नहीं अधम्र्य है। -देवेश शास्त्री == ऊष्मा जाग्रत करने का वक्त! == अजस्र ऊर्जा के स्रोत सूर्य-नारायण के उत्तरायण होने का पर्व 'मकर संक्रांति' जो समचे 'ब्रह्मांड' में अपनी-अपनी तरह से माना जाता है। पंजाबी शैली में 'लोहड़ी', आर्य शैली में 'खिचड़ी' और द्रविड़ शैली में 'पोंगल' अथवा देश-देशान्तर में स्थानीय परम्परागत शैली के विविध उत्सव सूर्योपासना के ही रूपक है,यदि सौर-संक्रमण प्रक्रिया की गहराई में जायें और आत्म-तत्व निहित अनंत ऊष्मा को जाग्रत कर सकते हैं,जो अब अवश्यंभावी है। कर्क से धनु राशि में सूर्य दक्षिणायन रहता है, या(contracted; show full)्रत्यंग के प्रत्यंतरित (भिन्न-भिन्न) तापमान और विचार संचरण का रहस्य अन्तरात्मा की ऊष्मा का प्राकट्य और जनहित में प्रयोग की सद्भावना है। वे कहते हैं- जब सूर्य की ऊष्मा ही प्रकृति और प्राणी का आधार है, वह ईश्वरीय कृपा से सुलभ है,महेन्द्र कुमार त्रिवेदी इस दिशा में स्वयं को निमित्त-मात्र मानते हैं, जो अध्यात्म और विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता है। आज समस्याग्रस्त समाज को मकर संक्रांति पर अपने अंदर छिपी अतंत ऊष्मा को सत्यनिष्ठा स्वरूप तपबल से जाग्रत करनी होगी,यह देश-काल-परिस्थिति के आधार पर अवंश्यंभावी है। == युवा-ऊर्जा का पराभव! == विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष 'राष्ट्रीय युवा दिवस' के रूप में मनायी जाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् 1985 ई. को 'अर्न्तराष्ट्रीय युवा वर्ष' घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की, कि सन 1985 से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिन के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए,और मनाया जाने लगा यानी युवा द(contracted; show full)के साथ आगे बढ़ो। यदि 2-4 लोग भी आत्मदृष्टा, पवित्र व नैतिक चरित्र वाले सत्यनिष्ठ मिल जायें तो तूफान मचा दें।�� हम स्वामी विवेकानंद की 150 वीं जयन्ती मनाने जा रहे हैं, इतने लम्बे अंतराल में तूफान मचाने वाली युवा ऊर्जा दिग्भ्रमित होकर सियासी मदारी के हाथ का खिलौना बनकर ठगी जाती रही,जिन पर कुछ विश्वास भी किया जा सकता था,वे कालनेमि सिद्ध होते जा रहे रहे है, दानवीयता में उलझी युवा ऊर्जा का मानवता पर बज्राघात तब तक जारी रहेगा, जब तक स्वामी विवेकानंद के सदुपदेशों को आत्मसात करने की प्रबल इच्छाशक्ति नहीं होगी। == �आत्म-तत्व� का सर्वोत्कृष्ट वाग्मयी मूर्ति है गीता == 21वीं शताब्दी निश्चित रूप से विज्ञान का क्रांति-दौर माना जा रहा है, मगर इससे भी परे ��परात्पर विज्ञान�� का दौर रहा है, और आने वाला दिख रहा है। इस सर्वोत्कृष्ट विज्ञान का ग्रन्थ है गीता। गीता ने ही ��महाभारत�� को निर्णायक स्वरूप दिया। गीता के वैज्ञानिक तथ्यों की ऊर्जाशक्ति से महात्मा गांधी ने ब्रिटिश हुकूमत को खदेड़ा, गीता से ही स्वामी विवेकानंद ने विश्व को परात्पर अध्यात्म-विज्ञान की ज्योति से प्रकाशित किया। क्रमशः 18 अध्यायों के गीता शास्त्र की अनुक्रमणिका में 1. अर्जुनविषादयोग, 2.सांख्ययोग, 3. कर्मयोग,(contracted; show full)ासयोग, कर्मसंन्यासयोग,आत्म- संयमयोग,ज्ञानविज्ञानयोग, क्षरब्रह्मयोग,राजविद्याराज- गुह्ययोग, विभूतियोग, विश्वरूपदर्शनयोग, भक्तियोग, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभागयोग, गुणत्रय- विभागयोग, पुरुषोत्तमयोग, दैवासुर सम्पद्विभागयोग, श्रद्धात्रय विभागयोग के बाद मोक्षसंन्यास योगका उपदेश दिया। जिसका सार है ��सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज।� यानी उस महत्तत्व ही आत्मा है, जिसका स्वयं ब्रह्मा जाप करते है, विष्णु अन्तमुखी होकर चिंतन करते हैं और शंकर ध्यान करते हैं। वही निर्गुण तत्व ही माहेश्वर तेज स्वरूप आत्म तत्व है। == गुरु महत्व == व्यास जयन्ती ही गुरु पूर्णिमा है। गुरु को गोविंद से भी ऊंचा कहा गया है। गुरुपरंपरा को ग्रहण लगाया तो सद्गुरु का लेबिल लगाकर धर्मभीरुता की आड़ में धंधा चलाने वाले ‘‘कालिनेमियों ने। शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैस(contracted; show full)तनी भी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, उनका मूल कारण है गुरु-शिष्य परंपरा का टूटना। श्रद्धावाॅल्लभते ज्ञानम्। आज गुरु-शिष्य में भक्ति का अभाव गुरु का धर्म ‘‘शिष्य को लूटना, येन केन प्रकारेण धनार्जन है’’ क्योंकि धर्मभीरुता का लाभ उठाते हुए धनतृष्णा कालनेमि गुरुओं को गुरुता से पतित करता है। यही कारण है कि विद्या का लक्ष्य ‘मोक्ष’ न होकर धनार्जन है। ऐसे में श्रद्धा का अभाव स्वाभाविक है। अन्ततः अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचारादि कदाचार बढ़ा। व्यासत्व यानी गुरुत्व अर्थात् संपादकत्व का उत्थान परमावश्यक है। == दोषी कौन ? == एक पौराणिक आख्यान -- ---------------------- विधवा ब्राह्मणी का बच्चा सांप के काटने से मर गया । तत्काल लोगों ने सांप को पकर लिया । सांप वोला - मैं दोषी नहीं हूँ , मैंने किसी की प्रेरणा से कटा। प्रश्न - किसकी प्रेरणा से ? जवाब- यम की। तत्काल यम का आवाहन हुआ , वह बोला-मैं दोषी नहीं हूँ , मैंने किसी की प्रेरणा से सांप को प्रेरित किया। प्रश्न - किसकी प्रेरणा से ? जवाब- काल की। तत्काल काल का आवाहन हुआ , वह बोला-मैं दोषी नहीं हूँ , मैंने किसी की प्रेरणा से यम को प्रेरित किया। प्रश्न - किसकी प्रेरणा से ?जवाब- इस बच्चे के कर्मो की। == मदालसा आख्यान == -------------------- रानी मदालसा अपने पहले पुत्र को बचपन से ही वे संस्कार देने शुरू कर दिए जो वास्तविक विद्या है। आज हम जो विद्या ग्रहण करने पर जोर देते हैं या ले रहे है वह विद्या नहीं अविद्या है। सा विद्या या विमुक्तये, ये जीवन का लक्ष नहीं जो अपनाते हुए कदाचार कर रहे हैं । (contracted; show full)े हुए भाग खडा हुआ। जंगल में बेहाल वह घास फूस खाकर समय काटने लगा। उसे याद आया माँ ने कहा था - जीवन में जब भारी संकट आये कोई सहारा न दिखे तब अंगूठी से उपदेश-पत्र निकल कर पढ़ लेना। उसने तत्काल उपदेश-पत्र निकाला , जिसमें १ श्लोक था , भावार्थ इस तरह है- संग (आसक्ति) सर्वथा त्याज्य है यदि संग त्यागना मुश्किल हो तो सतसंग करो, कामना सर्वथा त्याज्य है यदि संभव न हो तो मोक्ष की कामना करो। उक्त उपदेश ही हम सभी लोगों को विद्या- अविद्या का भेद बताता है। उक्त मदालसा उपाख्यान को पढ़ें, गुनें यही आत्मतत्व का सार है। == संस्कार द्वारा ही व्यवस्था परिवर्तन संभव == भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के संकल्प को लेकर जो आन्दोलन शुरू हुआ था, वह स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के चलते भ्रष्ट-सियासी सोच में उलझ गया है। सब चाहते है संसदीय जनतंत्र को सदाचारी होना चाहिए, किन्तु कैसे? इस प्रश्न के जवाब में संस्कारपरक कार्ययोजना की जरूरत है। जिसका प्रेरक है पौराणिक प्रह्लाद प्रसंग। जब हिरण्यकश्यप की कुशासनिक व्यवस्था परिवर्तन हो सकता है तो नित नये घोटालों देने वाली भ्रष्ट व्यवस्थ...ा परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता? (contracted; show full) कार्य योजना के तहत सभी जगह सत्यनिष्ठजनों की टीम बनाई जायेगी। जो निकटवर्ती शिक्षण संस्थाओं में जाकर सप्ताह में एक वार संयुक्त कक्षा लेकर सन्मार्ग दिखाते हुए भारत के भविष्य को स्वच्छ बनाने का प्रयास करेंगे। यह अभियान दीर्घकालिक ही नहीं निरंतर प्रक्रिया हो जायेगी, बिल्कुल पल्स पोलियो अभियान की तरह। पालियो के विषाणु मारे जा सकते हैं तो भ्रष्टाचार के क्यों नहीं? सदाचारी मानसिकता की भावी पीढ़ी शासन- प्रशासन में दाखिल होगी, तो व्यवस्था परिवर्तन का अहसास होने लगेगा।See More == आरक्षण है बैशाखी? == प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर सियासत उग्र होती जा रही है। अनुसूचित जाति-जन जाति के लिए तरक्की में आरक्षण के प्रावधान संबंधी बिल के साथ ही ओबीसी आरक्षण की मांग और अल्पसंख्यकों के निमित्त सच्चर कमेटी व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों से जुड़े मुद्दे भी उठने लगे हैं। जातिवाद की उठती आग की ज्वाला में झुलते समाज में जातीय उन्माद सामने दिखाई देने लगा है। ‘‘आरक्षण’’ का प्रावधान अनुसू...चित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्ग के लोगों का स्तर ऊपर उठाने के लिए किया गया था। आजादी के 6 दशक बाद भी सामाजिक न्याय का रोना आखिर क्यों? क्योंकि आरक्षण बैशाखी का रूप ले चुका है अच्छी व स्वस्थ मानसिक व बौद्धिक क्षमता सम्पन्न होते हुए भी यह आरक्षण रूपी बैशाखी सामाजिक न्याय के नाम पर ‘अपंग’ बना रही है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो सामाजिक स्तर पर ‘गरीबी’ की तरह ‘पिछड़ेपन’ की सीमा भी बढ़ती जायेगी। स्कूल में दाखिले में भी आरक्षण रूपी बैशाखी लगाई गई। शिक्षार्जन की दिशा में समानता का पहला मौका मिला, तो अब बैशाखी हट जानी चाहिए। नहीं, पढ़ने के बाद अंकोें की विसमता को पाटने में भी यही बैशाखी काम आती है। आरक्षण रूपी सरकारी नौकरी पाकर भी सामाजिक न्याय नहीं मिला तो तरक्की की सीढ़ियों के लिए भी बैशाखी का प्रयोग यह सिद्ध करता है, मानसिकता में घर कर चुका पिछड़ापन जीवन के अंतिम चरण तक बैशाखी की आवश्यकता तय कर रहा है। सोचने की बात है जब सरकारी नौकरी मिल गई जो सामाजिक, आर्थिक जीवन स्तर तो समान हो गया तो प्रमोशन में आरक्षण रूपी आरक्षण की क्यों पड़ी आवश्यकता? जिस तरह गरीबी हटाओ अभियान वर्षों से चल रहा है जिसने कितनों को मालामाल कर दिया और गरीबी बढ़ती चली गई, उसी तरह सामाजिक न्याय के नाम पर ‘‘अन्यायपरक सिद्धान्त’’ पिछड़ेपन की खाई गहरी करता जा रहा है।See More == चर्पट पंजरिका == सुबह शाम दिन-रात बहु, आत जात ऋतु मास। काल चक्र में आयु क्षय, तजी न फिर भी आस॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। आग घाम तन लाभ को, ठोड़ी घुटुवन चांप। हाथ कटोरा वास वन, तजी ना आसा आप॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। जब लौं आप कमात हैं , तब लौं मिलता प्यार। तन अशक्त जर्जर हुआ, मिलन लगी दुत्कार॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। गेरू भूरे बस्त्र या , घुटे बड़े बहु केश । बाबा उदर निमित्त ही धारें नाना वेश॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। करो न गंगा आचमन लाहो न गीता ज्ञान। हरि चर्चा भाई नहीं कैसे हो कल्याण॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। खेल-कूद में बालपन , यौवन भोग-विलास। ज़रा काल चिंता फसे, कटे नहीं भाव पाश॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। जनम मरण पुनि-पुनि मिले, कोख कैद हर बार। भव सागर दुस्तर अधिक, करो मुरारी पार ॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। देह शिथिल शितकेश भे , गिरे दांत कर लट्ठ । फिर भी आसा ना तजि भूले जीवन तथ्य॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। ढली उमर में वासना, सूखा जल तालाब। ज्यों दरिद्रता में स्वजन, आत्मतत्व भव-चाव॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। कुच नितम्ब तो मात्र हैं माया के आवेश। अथवा मांस विकार हैं सोचो अब देवेश॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। कौन आप आये कहाँ से को माई बाप। सोचो स्वप्न विचार तज दुनिया का संताप॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। गीता पढ़ श्री हरि जपो, जपो सहस हरि नाम। नित होवे सतसंग प्रिय बांटो जमकर दाम॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। जबतक तन में प्राण हैं, तब तक स्वजन लगाव। हंस उड़ा तन के लिए पत्नी का भय भाव॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। पहले रमणी ऱत रहे, फिर आये तन रोग। मृत्यु सत्य स्वीकार पर तजे न पापाभोग॥ मंद-मति भज ले हरी का नाम। (आदिशंकराचार्य रचित चर्पतापन्जरिका का काव्यानुवाद ) देवेश शास्त्री == सत्यनिष्ठा ही ब्रह्मनिष्ठा == - देवेश शास्त्री- ‘‘सत्यमेव जयते’’ वेदवाक्य, के निहितार्थ को आत्मसात करते हुए सत्यनिष्ठा के साथ पद की शपथ लेने वाले ‘जनसेवकों’ से पूछिए, कि आप सत्यनिष्ठा के रहस्य को जानते है? सत्यनिष्ठा का राग अलापने की कोई आवश्यकता नहीं है और न ही सत्यमेव जयते को मनोरंजन का साधन बनाने की। वास्तव में यह वेदवाक्य मन का रंजन नहीं कर सकता, बल्कि आत्मानुभूति कराता है। जिसे अनुपमेय आनंद का आधार कहा जा सकता। इस संदर्भ में गीतकार ओपी दीक्षित के ये पंक्तियां दृष्टव्य हैं-‘‘जाओ जाकर उनसे कह दो कुर्सी पाकर कुछ काम करें, मत ढोल (contracted; show full)ि आने पर पढ़ना। ‘‘संग (आसक्ति) सर्वथा त्याज्य है। यदि संग त्यागने में परेशानी महसूस हो तो सत् से आसक्ति रखें यानी सत्संग करो इसी तरह कामनाएं अनर्थ का कारण हैं, जो कभी नहीं होनी चाहिए। कामना न त्याग सको तो सिर्फ मोक्ष की कामना करो।’’ अनासक्त और निष्काम व्यक्ति ही सत्यनिष्ठ है। आसक्ति और विरक्ति के मध्य की स्थिति अनासक्ति है। जो सहज है, दृऋषभदेव व विदेहराज जनक ही नहीं तमाम ऐसे अनासक्त राजा महाराजा हुए है। आज भी शासन, प्रशासन में नियोजित अनासक्त कर्तव्यनिष्ठ नेता व अफसर हैं जिन्हें यश की भी कामना नहीं है। == बंधन का नाम है कृतज्ञता == हां! मैं कृतज्ञ हूं तो ईष्वर के प्रति, संसार के प्रति कृतघ्नता कायम रखूंगा। - देवेश शास्त्री- एक दिन बातों ही बातों में मेरे एक अजीज मित्र, नैतिकता का लवादा ओढ़कर अनैतिक क्रियाकलाप में लिप्त ‘व्यक्ति विशेष’ के आचरण पर चर्चा के दौरान बोले- ‘‘तुम तो कृतघ्न हो। उसने तुम्हारे आंदोलन में बढ़-चढ़कर मेहनत की, वही तुम्हाारे निशाने पर है। तुम्हें तो उसका कृतज्ञ होना चाहिए।’’ कृतज्ञता और कृतघ्नता के बीच गूंजने लगी पं रामप्रकाश शर्मा की पंक्तियां- ‘‘जाने कैसा मन अनय अनुगमन नहीं होता, दंभी अन्यायी के सम्मुख नमन (contracted; show full)का, जहां न अपना कोय। जीवजंतु भोजन करें कोटि जग्य फल होय।’’ के अनुरूप जीव जंतुओं के आहार के लिए पार्थिव शरीर का जल प्रवाह किया। गोस्वामी तुलसीदास ने स्पष्ट शब्दों में लिखा -‘‘ सुर नर मुनि सब की यह रीती। स्वारथ लाग करें सब प्रीती।।’’ किसी का प्रेम सत्कृत्य व उपकार नहीं है, तो कृतज्ञता कैसी? कृतज्ञता ही ब्रह्मपाश है। बंधन में डालना यानी अहसान के ब्रह्मपाश में आबद्ध करना मंजूर नहीं। ईश्वरीय सत्ता के बिना पत्ता तक नहीं हिलता, वह सत्ता भी जीव के कर्मफल को प्रारब्ध के रूप प्रस्तुत किया जाता है। ।। शुभं भवतु।। == मानवता == आज तथाकथित कवि मानते हैं - कविता का ह्रास हो रहा रहा। जरा सोचिये कविता है क्या? सत्ता, मानवता, पशुता, दानवता आदि ता प्रत्यय के अनगिनत शब्दों की श्रेणी में कविता भी है। बात करते है मानवता की- मानवता के प्रति सभी सजग हैं , करोड़ों दिमाग मानवता को गर्त से निकालने का उपक्रम कर रहे हैं, हर कोई मानने लगा है कि मानवता समाप्त हो चुकी है, वास्तव में ये सब कुछ ड्रामा है। जिस दिन मानवता को जान लेंगे मानवता आ जाएगी। जानहि तुमहि तुमहि हुई जाई। ता प्रत्यय की व्यापकता समझने की जिज्ञासा ही समाधान है। '' गुण-दोष-वृत्ति-प्रवृत्ति, आचार,विचार, आहार आदि । " मानव अर्थात मनु की संतान यानि वर्णाश्रम व्यवस्था का पालन करने वाला आदि आदि , यदि हम मानव हैं तो मानवीय गुण-दोष-वृत्ति-प्रवृत्ति, आचार,विचार, आहार भी होंगे। यही तो मानवता है। पशु हैं तो पशुगत गुण-दोष-वृत्ति-प्रवृत्ति, आचार,विचार, आहार होंगे वही पशुता है । हम अपने पुरखा (मनु) की वर्णाश्रम व्यवस्था को कोसते है फिर मनु वंशज होंने का दंभ क्यों पाले हैं? == विकल्प ने किया संकल्प का सत्यानाश == दर्शन-शास्त्र के अनुसार संकल्प ही प्रमुख हैं जब कि विकल्प किसी भी प्राणी को उसके गंतव्य तक नहीं पंहुचा सकते । संकल्प से दृढ इच्छा शक्ति का प्रादुर्भाव होता हैं ओर प्राणी अपने संकल्प को पूरा करने के लिए जी जान लगा देता हैं जबकि विकल्प इच्छा-शक्ति को कमजोर कर हारे पै हरि नाम का दृष्टिकोण बनाकर विकल्पों को सामने रख लेता हैं ओर कभी भी गंतव्य तक पंहुचने की इच्छा-शक्ति जागृत नहीं कर पाता । २१ वी शताब्दी के इस दौर में जब कि कंप्यूटर क्रान्ति का युग चल रहा हैं ऐसे में युवापीढ़ी को राष्ट्र उत्थान कि दिशा में संकल्प पूर्वक दृढ इच्छा-शक्ति के साथ आगे बदना चाहिए जबकि युवापीढ़ी अपने मनोबल को कमजोर करते हुए विकल्पों के आधार पर ऊपर बढ़ने की वजाय नीचे की ओर गिरती जा रही हैं ऐसे में भला राष्ट्रका उत्थान कैसे हो सकता हैं ? प्रत्येक अभिभावक अपनी संतान के उज्जवल भविष्य की कल्पना करते हुए उसकी अभिरुचि के अनुरूप शिक्षित करने का प्रयास करता हैं और उस दिशा में ऊँची से ऊँची डिग्री हासिल कराता हैं भले ही हाई मैरिट के लिए नक़ल माफियाओं के माध्यम से कितने ही पापड भी बेलता हैं , लेकिन उसके सारे ख्वाब तब चूर-चूर हो जाते हैं जब हाई एजुकशन प्राप्त करने के बाद भी उसका बेटा किसी inter कॉलेज में घंटा बजाने का काम करने लगता हैं और वह भी ५ लाख देने के बाद। इन दिनों BTC की प्रक्रिया पूरे प्रदेश में चल रही है। मैरिट के आधार पर चयन हो रहा है, जिसमें ऐसे प्रतिभागी चयनित हो रहे हैं जो अपने कैरियर के अनुरूप डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक बनकर देश सेवा कर सकते थे मगर अब abc और १२३, अबस में ही सिमट कर क्या ख़ाक कर पायेंगे? बेरोजगारी के दौर की दुहाई देकर अपने से कमजोर वर्ग का हक़ मारना कहाँ का न्याय है? जब BTC की अर्हता स्नातक तो सिर्फ स्नातक को ही इस पद के अनुरूप अर्ह माना जाना चाहिए, कम या ज्यादा नहीं। == विलक्षण संत थे बाबा श्यामानंद == रामायण का अखंड पाठ हो, या भागवत अथवा सत्संग कीर्तन सभी जगह हाथ में खंजड़ी लिए तन्मय होकर नाचते हुए जो बाबा पहुच जाते थे। नुमायश पंडाल के अधिकांश कार्यक्रमों, साप्ताहिक सत्संग ‘मंगल मिलन’ व सुन्दरकांड के कार्यक्रम में जिनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। जब कोई कार्यक्रम नहीं तो सड़कों पर घूम-घूम कर नाचना, अथवा सीटी बजाकर डंडा खटकाते हुए घूमते रहना उनकी दिनचर्या थी। वे कौन थे? क्या थे? कोई नहीं जानता। ज्यादातर लोग उन्हें ‘‘पागल’’ कहते थे। क्या वे पागल थे? नहीं वे विलक्षण संत थे, इसी पुरुषोत्तम मास की पहली घड़ी में अपने अनुज बाबा कंबोदानंद से कहा ‘‘अब मैं चलता हूं।’’ छोटे भाई ने पूछा- ‘‘कहां जाओगे, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, कहीं गिर पड़ोगे।’’ उत्तर दिये बिना बाबा ब्रह्मलीन हो गये। इष्टसाध्य इष्टापथ में विलक्षण व्यक्तित्व समय समय पर प्रकट होते रहे हैं और कुछ न कुछ संदेश देकर चले जाते रहे हैं। इसी क्रम में 444 नौरंगाबाद इटावा में 28 फरवरी 1938 को बंशीलाल कोस्टा की धमपत्नी तिजा देवी के गर्भ से जिस शिशु का जन्म हुआ, उसका नाम श्याम लाल कोस्टा रखा गया। इसके लगभग 3 साल बाद कंबोदबाबू का जन्म हुआ। दोनों भाइयों में अगाध प्रेम यहां तक है कि बड़े भाई बाबा श्यामानंद के विरह में बाबा कंबोदानंद व्याकुल रहते हैं। पराधीन भारत में जन्में श्यामलाल उर्फ बाबा श्यामानंद ने स्वतंत्र भारत में हाईस्कूल किया। फिर होमगार्ड में भर्ती हुए, लम्बे अर्से तक नौकरी की। इस बीच वरिष्ठ अधिवक्ता लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के मुंशी भी रहे। मुशीगीरी के साथ बाबा श्यामानंद वकील साहब के पुत्रों को खिलाते और पढ़ाते भी थे। इनमें सुवीर त्रिपाठी आज अजीतमल महाविद्यालय में प्रोफेसर हैं और अरुण त्रिपाठी न्यायाधीश हैं। ‘‘सत्यं ब्रह्म जगन्मिथ्या’’ वेद वाक्य को अंगीकार कर बाबा-बंधु ईश्वर के प्रति समर्पित हो गये थे। दोनों भाई ‘‘सबै भूमि गोपाल की’’ सद्धारणा से पैत्रिक घर 444 नौरंगाबाद इटावा को आश्रम मानते हुए भगवद् भक्ति में तल्लीन हो गये। भजन गाते और तन्मय होकर नाचते रहना उनकी दिनचर्या हो गई। ‘‘समर्पण भक्ति’’ के प्रतीक बाबाबन्धु (श्यामानंद और कंबोदानन्द) न केवल इटावा में ही नाचते गाते रहे बल्कि समय समय पर ढपली लेकर मथुरा, वृन्दावन, हरिद्वार, ऋषीकेश और मायानगरी मुम्बई में घूमते फिरते रहे। राजधानी दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के कार्यालय में भी भजन गाकर नाचने वाले बााब बन्धुओं के भजन की तारीफ मोतीलाल बोरा, सज्जन कुमार आदि नेताओं ने की। आध्यात्मिक दृष्टि से जो परमहंस की गति शास्त्रों में बताई गई, वह बाबा श्यामानंद के रहन सहन में स्पष्ट दिखाई देती थी। श्रद्धा से कोई भी व्यतिक्त जो भी दे देता, वे प्रेम से खा लेते। अच्छी बुरी हर जगह पर सो जाते। लोग पागल कहने लगे। धन तो दूर भौतिक सुख की किसी वस्तु का संग्रह नहीं किया यानी पूर्ण बीतरागी। ढपली बजाते हुए नाचते गाते हुए विलक्षण बाबा के छवि इटावा नगर में हर व्यक्ति की आंखें में बसी हुई है। वे बाबा 19 अगस्त 2012 को माामूली बुखरी आते ही चल बसे। उनकी अंतिम इच्छा थी आश्रम में ही समाधि बनाना। बाबा कंबोदानंद ने समाधि की तैयारी की तो मुहल्ले वालों ने पुलिस को बुला लिया और यमूना तट पर अंत्येष्टि करवा दी। अब उनके फूल (अस्थि कलश) आश्रम में ही समाधि रूप में स्थापित किये जायेंगे। == शरीर है कंप्यूटर == २१ वीं सताब्दी कंप्यूटर क्रांति व सूचना प्रौद्योगिकी की चरम शताब्दी है, यदि दार्शनिक अंदाज में आध्यात्मिक रूप से परिभाषित करें तो भारतीय दर्शन आसानी से समझ में आ सकता है। मानव एक कंप्यूटर है- सगुणात्मक तत्व हार्डवेयर है, जिसके अंतर्गत हैं इन्द्रियां, त्वचा, रक्त, मज्जा, अस्थि आदि। निर्गुनात्मक तत्व साफ्टवेयर है, जिसके अंतर्गत हैं मन, बुद्धि, आत्मा, अहंकार आदि। (contracted; show full)रस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है। All content in the above text box is licensed under the Creative Commons Attribution-ShareAlike license Version 4 and was originally sourced from https://hi.wikibooks.org/w/index.php?diff=prev&oldid=9798.
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