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== जिन्दगी ==
जिन्दगी मुझको लगी, महबूब का ज्यों प्यार हो। 
जिन्दगी ऐसी खली, ज्यों नफरतों का हार हो।।

 रंगीनियत कुछ पल समेटे आ गयी जब सामने, 
हूरे-जन्नत जिन्दगी, उस पर किये सिंगार हो।
 
जब खुशी में हो गया, पागल बताऊँ क्या तुम्हें, 
जिन्दगी मीठी लगी खट्टी लगी ज्यों जार हो।
 
कष्ट का जब सिलसिला आया, चला, चलता रहा, 
जिन्दगी यो लग रही थी, खड्ग की ज्यों धार हो।
 
पल खुशी के हमने हँसते, काटे न मालूम ही पड़ा, 
जिन्दगी का अर्थ लगता था, गुले गुलजार हो।
 
जिल्लतों का समय, काटे से भी कटता है नहीं, 
जिन्दगी है बन गया अश्कों का लम्बा हार हो।
 
जहर का प्याला नहीं, अमृत की भी बूँदें नहीं, 
जिन्दगी के जाम में, अंगूर का ज्यों क्षार हो।

-देवेश शास्त्री

== आत्मदृष्टा बनेगे जब तभी होगा कल्याण ==
आत्मदृष्टा का तात्पर्य ? अरे भाई कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूढे बन माहि , ऐसे घट-घट राम हैं ...... यह रहस्य ही नहीं रहस्य का मूलाधार है। राम, रमन्ते योगिना यस्मिन सः रामः। जिसमें योगी रम जाएँ वही रम हैं, जब घट-घट राम हैं तो फिर आत्मतत्व में ही रम जाना, उसी का चिंतन करना, आत्म दर्शन का प्रथम सोपान है। आत्मदृष्टा धीरे-धीरे अनासक्त भाव का स्वामी हो जाता है। उसका अंतर्नाद सत्य होता है। आसक्ति दुखदाई है और विरक्ति सुखदाई , न्याय दर्शन के अनुसार मन की अनुकूलता ही सुख है जबकि प्रतिकूलता दुःख     अनासक्त भाव को इस तरह देखें - आसक्ति व विरक्ति दोनों से श्रेष्ठ है अनासक्ति, जिससे परमानंद की अनुभूति होती है। आत्मदृष्टा जब अंतर्मुखी हो जाता है परमात्मरूप ( videh) प्रतीत होता है , उसकी हर गतिविधि रहस्य प्रतीत होती है  ।

== हरतालिका-गणपति-सप्तर्षि त्रिवेणी में ‘दश-लाक्षणी’ धर्म का विज्ञानपरक रहस्य ==
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देवशयनी एकादशी से देवोत्थानी एकादशी तक चातुर्मास्य ‘‘आत्मशोधन का कालखंड’’ माना जाता है। सावन में काम (सेक्स) मर्दन शिवत्व की साधना, भाद्रपद के पूर्वार्द्ध में परमेश्वर के परिपूर्णावतार लीलापुरुषोत्तम का प्राकट्योत्सव, व अत्तरार्द्ध में शिवत्व के लिए पार्वती के तप व लक्ष्यवेध की प्रतीक हरतालिका तीज, विघ्नविनाशक गणपति की साधना पर्व गणेशचैथ तथा तपबल से सौरमंडल में रहकर अपनी वेब्स से सज्ज्योति देने वाले सप्तर्षियों की आराधना पर्व ऋषि पंचमी की त्रिवेणी में दशलाक्षणी धर्म का ‘‘आत्म-मंथनीय’’ दश धर्मकलशों से क्रमशः(contracted; show full)देता है। मारुत्यास्त्र रूपी ब्रह्मचर्य बल से कलंक को नष्ट किया जाता है तब मानवीयगिरि की दुर्गम चढ़ाई पर आगे बढ़ सकते हैं। मानवीयगिरि से तात्पर्य मानवीयता से है, जो अति दुर्गम है मानवीयगिरि का आरोहण में स्वार्थ और महत्वाकांक्षा रूपी असंख्य रासायनिक-फिसलन है, मानवीयगिरि पर आरोहित विजेता ‘‘मानव’’ होता है। जो निःश्रेयसवन पहंुचता है यानी श्रेयात्मक महत्वाकांक्षा से परे हो जाता है वह ब्रह्मनिष्ठ परमहंस ही ‘‘सत्य’’ का सामीप्य योग पाकर कल्पवृक्ष का सुख भोगता है और कामधेनु का पयपान करते हुए सारूप्य मोक्ष पाता है।




== सत्कर्मों का प्रताप ==
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(contracted; show full)
आखिर ऐसी क्यों? यदि सवा अरब की आबादी वाला भारतवर्ष दृढ़ संकल्पित हो जाये तो बापू के रामराज्य यानी ‘‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’’ की संकल्पना साकार हो जायेगी। 
‘‘रिश्वत लेना पाप है
पर देना अभिशाप।
लेना-देना बंद हो,
तभी मिटे संताप।।’’
जब हर कोई स्वार्थ और महत्वाकांक्षा त्यागकर सत्यनिष्ठा के संकल्प पर केंद्रित होगा। तो लूटमार करने वाले बाल्मीकि और अंगुलिमाल सरीखे कदाचारी लोग भी ‘‘महर्षि व भिक्षु’’ बन जायेंगे। आयें असीम ऊर्जास्पद संकल्पशक्ति जगायें




== कार्य ही पूजा है! ==
वर्क इज वर्शिप, भरतीय षड्दर्शन, प्रस्थानत्रय (गीता, वेदान्त, ब्रह्मसूत्र) आदि सभी धर्मग्रंथ कर्म सिद्धांत को प्रतिपादित करते हैं। इसी आधार पर कार्य को पूजा की संज्ञा दी गई है। कृ धातु में यत् प्रत्यय के साथ शब्द बना कार्य। कार्य से तात्पर्य है, करने योग्य। यथा पाठ्य-पढ़ने योग्य, पूज्य- पूजा के योग्य, दृश्य- देखने के योग्य। 
(contracted; show full)
सवाल उठता है कि क्या यह संभव है? हां, बशर्ते चक्रवात की तरह जो भाव-प्रवाह का तूफान उठ रहा वह शाट-सर्किट की भेंट न चढ़ेे और अपना सर्किल पूरा करते हुए सियासी-समुद्र में भयावह लहरें उठाने वाली ‘सुनामी’ बन जाये।
- देवेश शास्त्री

== हृदय परिवर्तन की अनोखी ‘ज्योति’ का प्रस्फुटन इटावा से ==

एलेन ओक्टेवियन ह्यूम और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस :-------------------- देवेश शास्त्री
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आज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थिति की तुलना यदि अपने मित्र दीपचन्द्र त्रिपाठी ‘निर्बल’ के इस दोहे के आधार पर बहुसंख्यक समुदाय के हालात से करें तो समुचित होगा- ‘‘सहमे सहमे से रहते हैं, हिन्दू हिन्दुस्तान में। ईश्वर जाने कैसे रहते होंगे पाकिस्तान में।।’’ हां, आज जहां एक ओर हिन्दू सहमा हुआ, वहीं दूसरी ओर वह कांग्रेस जिसे खड़ा होने में जितना समय लगा, उतना ही पतन में। जिसकी कभी तूती बोलती थी, आज लोकसभा में प्रतिपक्ष दल होने की भी हैसियत नहीं जुटा पा रही है, निसंदेह यह ‘कर्मगति’ है। उसी तरह तथाकथित हिन्दुत्व(contracted; show full)
पाप और पुण्य के क्रेडिट कार्ड से अपनी भौतिक संपदा के हस्तान्तरण की प्रक्रिया का ही प्रभाव है कि प्रारब्ध वश एक कुत्ता एसी में मेम की गोद में रहता कीमती बिस्किट व अन्य भोज्य खाता वहीं दूसरा भोजन की जुगाड़ में कदम कदम पर डंडे खाता। स्पष्ट है कि आज हम जो भी भौतिक संपदा सजो रहे हैं। वह पाप और पुण्य के क्रेडिट कार्ड के रूप में समेटकर ले जायेंगे। -- देवेश शास्त्री




== अहं भाव का आत्मरूप ही देवत्व ==

अहंकार है‘‘अंतश्चतुष्ट्य’’मन, चित्त, बुद्धि के मध्यस्थ का अवयव जो करता है अंतश्शत्रु का मुकाबला

रामायण काल में दो बलिष्ट पात्र हनुमान और रावण हैं, रावणं अहंकारी है- ‘मेरी इन बड़ी भुजाओं ने कैलाश पहाड़ उठाया है, दानव मय इंद्र कुबेर बरुण इन बाणों से थर्राया है।’ यानी सफलता का हर पक्ष अहं से सराबोर है। दूसरी ओर हनुमान जी प्रत्येक सफलता के पीछे ईश्वरीय कृपा को श्रेय देते हैं-‘लांधि सिंधु हाटक पुर जारा, निशिचर गन वधि विपिन उजारा, सो सब तब कृपालु प्रभुताई, नाथ न कछू मोर प्रभुत(contracted; show full)। आत्मतत्व में अहं का एकात्म ही अहंकार का मूलतत्व है। ‘‘सोऽहमस्मि’’ वह आत्मा ही मैं हूं। यानी वह परमात्मा मैं (जीवात्मा) हूं। सहज रूप में देही की प्रेरणा से देह जो कर रहा है, कह रहा है या विचार कर रहा है वह अहं (मैं) कर रहा हूं। यानी ईश्वर कर रहा है अर्थात् ईश्वरीय सत्ता से हो रहा है। ‘‘सोऽहमस्मि’’ जब तक मैं को शरीर तक सीमित माना गया। तब तक अहं रावण की तरह शक्ति को क्षीर्ण करने तत्व रहा। जब वही अहं आत्मतत्व में समाहित हुुआ तो हनुमानजी के लिए शक्ति संबर्द्धक हो गया और अहं ही देवत्व हो गया। -देवेश शास्त्री






== new वर्ण व्यवस्था ==
21वीं सदी में फिर नये स्तर से वर्ण व्यवस्था सामने आ रही है। वह भी कर्मानुसार है। विप्र स्वरूप क्रीमी लिअर वर्ग यानी बड़े राजनेता, प्रथम श्रेणी के प्रशासनिक अफसर, न्याय पालिका के उच्चस्तरीय जज व कुबेरात्मक उद्योगपति। एक हाई-फाई नेता, अफसर या जज अपनी संतान का संबंध क्रीमी लियर वर्ग में ही जायेगा वहां पुरानी वर्णव्यवस्था कोई मायने नहीं रखती। दूसरा वर्ण क्षत्रिय स्वरूप सुरक्षा वर्ग है, यहां सैन्य वर्ग आता है। वह थलसेना वायुसेना व नौसेना हो या फिर अर्द्धसैनिक वर्ग, पीएसी, पुलिस व गार्ड। इनमें भी जनरल, ब्रिगेडियर, कर्नल जवान आदि उपवर्ग है। वे भी पारस्परिक उपवर्ग में ही संबंध चाहेंगे। तीसरा वर्ण वैश्य स्वरूप मध्यम आय वाला वर्ग है- मध्यम वर्गीय नेता, प्रशासनिक कर्मचारी, लघु व मध्यम व्यवसाई, शिक्षक, वकील, चिकित्सक आदि। आमदनी पर क्रेंद्रित। चैथा वर्ण शूद्र स्वरूप होगा कृपाजीबी दरिद्र वर्ग। उक्त तीनों वर्णों की सेवा यानी चाकरी कर कृपापात्र बनकर जीने वाले।



== दरिद्रता ही ब्राह्मण की ‘‘वैभव संपदा’’ ==
‘‘जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद्द्विज उच्यते।’’ जन्म से सब एक हैं, किन्तु संस्कारों से दूसरा जन्म पाना ही द्विजाति वर्ग यानी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य होते है। समाज में, व्यवसाय-आधारित चार वर्ण होते हैं। ब्राह्मण (आध्यात्मिकता के लिए उत्तरदायी ), क्षत्रिय (धर्म रक्षक), वैश्य (व्यापारी व कृषक वर्ग) तथा शूद्र (शिल्पी, श्रमिक समाज)। व्यक्ति की विशेषता,आचरण एवं स्वभाव से उसकी जाति निर्धारित होती थी। विप्र, द्विज, द्विजोत्तम, भूसुर आदि नामों से ब्राह्मण जाना(contracted; show full)ूल कारण है गुरु-शिष्य परंपरा का टूटना। श्रद्धावाॅल्लभते ज्ञानम्। आज गुरु-शिष्य में भक्ति का अभाव गुरु का धर्म ‘‘शिष्य को लूटना, येन केन प्रकारेण धनार्जन है’’ क्योंकि धर्मभीरुता का लाभ उठाते हुए धनतृष्णा कालनेमि गुरुओं को गुरुता से पतित करता है। यही कारण है कि विद्या का लक्ष्य ‘मोक्ष’ न होकर धनार्जन है। ऐसे में श्रद्धा का अभाव स्वाभाविक है। अन्ततः अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचारादि कदाचार बढ़ा। व्यासत्व यानी गुरुत्व अर्थात् संपादकत्व का उत्थान परमावश्यक है।

== दोषी कौन ? ==
एक पौराणिक आख्यान --
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विधवा ब्राह्मणी का बच्चा सांप के काटने से मर गया     तत्काल लोगों ने सांप को पकर लिया    
सांप वोला - मैं दोषी नहीं हूँ , मैंने किसी की प्रेरणा से कटा।
प्रश्न - किसकी प्रेरणा से ?
जवाब- यम की।
तत्काल यम का आवाहन हुआ , वह बोला-मैं दोषी नहीं हूँ , मैंने किसी की प्रेरणा से सांप को प्रेरित किया। प्रश्न - किसकी प्रेरणा से ?
जवाब- काल की।
तत्काल काल का आवाहन हुआ , वह बोला-मैं दोषी नहीं हूँ , मैंने किसी की प्रेरणा से यम को प्रेरित किया। प्रश्न - किसकी प्रेरणा से ?जवाब- इस बच्चे के कर्मो की।  

== मदालसा आख्यान ==
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रानी मदालसा अपने पहले पुत्र को बचपन से ही वे संस्कार देने शुरू कर दिए जो वास्तविक विद्या है। आज हम जो विद्या ग्रहण करने पर जोर देते हैं या ले रहे है वह विद्या नहीं अविद्या है। सा विद्या या विमुक्तये, ये जीवन का लक्ष नहीं जो अपनाते हुए कदाचार कर रहे हैं    
मदालसा के उपदेश से बालक विरक्त होकर जंगल में चला गया। दूसरा पुत्र हुआ उसे भी मदालसा ने वास्तविक विद्या दी , वह भी चला गया। इस तरह क्रमशः ४ पुत्र सन्यासी हो गए। जब पांचवां गर्भ आया तो राजा ने कहा प्रिये ! अब होने वाली संतान को वह विद्या मत देना, हमें उत्तराधिकारी चाहिए।
पति के आदेश पर पांचवें पुत्र को मोह-लोभ , राग द्वेष के साथ राजयोग की शिक्षा दी। वह बड़ा हुआ आश्रम व्यवस्था के तहत राजा रानी ने पुत्र का राज्याभिषेक कर संन्यास आश्रम में जाने का विचार किया। रानी मदालसा ने पुत्र को एक अंगूठी दी और कहा कि इसमें उपदेश-पत्र रखा है। जीवन में जब भारी संकट आये कोई सहारा न दिखे तब अंगूठी से उपदेश-पत्र निकल कर पढ़ लेना। यह कहकर राजा रानी जंगल में चले गए।
मदालसा के पुत्र ने १००० वर्ष शासन किया प्रजा खुशहाल थी। काशी नरेश ने आक्रमण कर दिया भयंकर युद्ध में मदालसा का पुत्र हर गया वह बीवी -बचों को छोड़कर अपनी जान बचाते हुए भाग खडा हुआ। जंगल में बेहाल वह घास फूस खाकर समय काटने लगा। उसे याद आया माँ ने कहा था - जीवन में जब भारी संकट आये कोई सहारा न दिखे तब अंगूठी से उपदेश-पत्र निकल कर पढ़ लेना। उसने तत्काल उपदेश-पत्र निकाला , जिसमें १ श्लोक था , भावार्थ इस तरह है- संग (आसक्ति) सर्वथा त्याज्य है यदि संग त्यागना मुश्किल हो तो सतसंग करो, कामना सर्वथा त्याज्य है यदि संभव न हो तो मोक्ष की कामना करो। 
उक्त उपदेश ही हम सभी लोगों को विद्या- अविद्या का भेद बताता है।
उक्त मदालसा उपाख्यान को पढ़ें, गुनें यही आत्मतत्व का सार है।  

== संस्कार द्वारा ही व्यवस्था परिवर्तन संभव ==

भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के संकल्प को लेकर जो आन्दोलन शुरू हुआ था, वह स्वार्थ और महत्वाकांक्षा के चलते भ्रष्ट-सियासी सोच में उलझ गया है। सब चाहते है संसदीय जनतंत्र को सदाचारी होना चाहिए, किन्तु कैसे? इस प्रश्न के जवाब में संस्कारपरक कार्ययोजना की जरूरत है। जिसका प्रेरक है पौराणिक प्रह्लाद प्रसंग। जब हिरण्यकश्यप की कुशासनिक व्यवस्था परिवर्तन हो सकता है तो नित नये घोटालों देने वाली भ्रष्ट व्यवस्थ...ा परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता?
(contracted; show full)
कार्य योजना के तहत सभी जगह सत्यनिष्ठजनों की टीम बनाई जायेगी। जो निकटवर्ती शिक्षण संस्थाओं में जाकर सप्ताह में एक वार संयुक्त कक्षा लेकर सन्मार्ग दिखाते हुए भारत के भविष्य को स्वच्छ बनाने का प्रयास करेंगे। यह अभियान दीर्घकालिक ही नहीं निरंतर प्रक्रिया हो जायेगी, बिल्कुल पल्स पोलियो अभियान की तरह। पालियो के विषाणु मारे जा सकते हैं तो भ्रष्टाचार के क्यों नहीं? सदाचारी मानसिकता की भावी पीढ़ी शासन- प्रशासन में दाखिल होगी, तो व्यवस्था परिवर्तन का अहसास होने लगेगा।See More




== आरक्षण है बैशाखी? ==

प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर सियासत उग्र होती जा रही है। अनुसूचित जाति-जन जाति के लिए तरक्की में आरक्षण के प्रावधान संबंधी बिल के साथ ही ओबीसी आरक्षण की मांग और अल्पसंख्यकों के निमित्त सच्चर कमेटी व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों से जुड़े मुद्दे भी उठने लगे हैं। जातिवाद की उठती आग की ज्वाला में झुलते समाज में जातीय उन्माद सामने दिखाई देने लगा है।
‘‘आरक्षण’’ का प्रावधान अनुसू...चित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्ग के लोगों का स्तर ऊपर उठाने के लिए किया गया था। आजादी के 6 दशक बाद भी सामाजिक न्याय का रोना आखिर क्यों? क्योंकि आरक्षण बैशाखी का रूप ले चुका है अच्छी व स्वस्थ मानसिक व बौद्धिक क्षमता सम्पन्न होते हुए भी यह आरक्षण रूपी बैशाखी सामाजिक न्याय के नाम पर ‘अपंग’ बना रही है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो सामाजिक स्तर पर ‘गरीबी’ की तरह ‘पिछड़ेपन’ की सीमा भी बढ़ती जायेगी।
स्कूल में दाखिले में भी आरक्षण रूपी बैशाखी लगाई गई। शिक्षार्जन की दिशा में समानता का पहला मौका मिला, तो अब बैशाखी हट जानी चाहिए। नहीं, पढ़ने के बाद अंकोें की विसमता को पाटने में भी यही बैशाखी काम आती है। आरक्षण रूपी सरकारी नौकरी पाकर भी सामाजिक न्याय नहीं मिला तो तरक्की की सीढ़ियों के लिए भी बैशाखी का प्रयोग यह सिद्ध करता है, मानसिकता में घर कर चुका पिछड़ापन जीवन के अंतिम चरण तक बैशाखी की आवश्यकता तय कर रहा है। सोचने की बात है जब सरकारी नौकरी मिल गई जो सामाजिक, आर्थिक जीवन स्तर तो समान हो गया तो प्रमोशन में आरक्षण रूपी आरक्षण की क्यों पड़ी आवश्यकता? जिस तरह गरीबी हटाओ अभियान वर्षों से चल रहा है जिसने कितनों को मालामाल कर दिया और गरीबी बढ़ती चली गई, उसी तरह सामाजिक न्याय के नाम पर ‘‘अन्यायपरक सिद्धान्त’’ पिछड़ेपन की खाई गहरी करता जा रहा है।See More



== चर्पट पंजरिका ==

सुबह शाम दिन-रात बहु, आत जात ऋतु मास।
काल चक्र में आयु क्षय, तजी न फिर भी आस॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

आग घाम तन लाभ को, ठोड़ी घुटुवन चांप।
हाथ कटोरा वास वन, तजी ना आसा आप॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

जब लौं आप कमात हैं , तब लौं मिलता प्यार।
तन अशक्त जर्जर हुआ, मिलन लगी दुत्कार॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

गेरू भूरे बस्त्र या , घुटे बड़े बहु केश ।
बाबा उदर निमित्त ही धारें नाना वेश॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

करो न गंगा आचमन लाहो न गीता ज्ञान।
हरि चर्चा भाई नहीं कैसे हो कल्याण॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

खेल-कूद में बालपन , यौवन भोग-विलास।
ज़रा काल चिंता फसे, कटे नहीं भाव पाश॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

जनम मरण पुनि-पुनि मिले, कोख कैद हर बार।
भव सागर दुस्तर अधिक, करो मुरारी पार ॥ 
मंद-मति भज ले हरी का नाम।  

देह शिथिल शितकेश भे , गिरे दांत कर लट्ठ ।
फिर भी आसा ना तजि भूले जीवन तथ्य॥
मंद-मति भज ले हरी का नाम।

ढली उमर में वासना, सूखा जल तालाब।
ज्यों दरिद्रता में स्वजन, आत्मतत्व भव-चाव॥
(contracted; show full)ें यानी सत्संग करो इसी तरह कामनाएं अनर्थ का कारण हैं, जो कभी नहीं होनी चाहिए। कामना न त्याग सको तो सिर्फ मोक्ष की कामना करो।’’ अनासक्त और निष्काम व्यक्ति ही सत्यनिष्ठ है। आसक्ति और विरक्ति के मध्य की स्थिति अनासक्ति है। जो सहज है, दृऋषभदेव व विदेहराज जनक ही नहीं तमाम ऐसे अनासक्त राजा महाराजा हुए है। आज भी शासन, प्रशासन में नियोजित अनासक्त कर्तव्यनिष्ठ नेता व अफसर हैं जिन्हें यश की भी कामना नहीं है।

== बंधन का नाम है कृतज्ञता ==

हां! मैं कृतज्ञ हूं तो ईष्वर के प्रति, संसार के प्रति कृतघ्नता कायम रखूंगा।




- देवेश शास्त्री-

एक दिन बातों ही बातों में मेरे एक अजीज मित्र, नैतिकता का लवादा ओढ़कर अनैतिक क्रियाकलाप में लिप्त ‘व्यक्ति विशेष’ के आचरण पर चर्चा के दौरान बोले- ‘‘तुम तो कृतघ्न हो। उसने तुम्हारे आंदोलन में बढ़-चढ़कर मेहनत की, वही तुम्हाारे निशाने पर है। तुम्हें तो उसका कृतज्ञ होना चाहिए।’’ कृतज्ञता और कृतघ्नता के बीच गूंजने लगी पं रामप्रकाश शर्मा की पंक्तियां- ‘‘जाने कैसा मन अनय अनुगमन नहीं होता, दंभी अन्यायी के सम्मुख नमन नहीं होता। हंसवाहिनी का साधक हूं शायद इसीलिए इधर उलूकवाहिनी का आगमन नहीं होता।’’ म(contracted; show full)
ता प्रत्यय की व्यापकता समझने की जिज्ञासा ही समाधान है। '' गुण-दोष-वृत्ति-प्रवृत्ति, आचार,विचार, आहार आदि । " मानव अर्थात मनु की संतान यानि वर्णाश्रम व्यवस्था का पालन करने वाला आदि आदि , यदि हम मानव हैं तो मानवीय गुण-दोष-वृत्ति-प्रवृत्ति, आचार,विचार, आहार भी होंगे। यही तो मानवता है। पशु हैं तो पशुगत गुण-दोष-वृत्ति-प्रवृत्ति, आचार,विचार, आहार होंगे वही पशुता है
     हम अपने पुरखा (मनु) की वर्णाश्रम व्यवस्था को कोसते है फिर मनु वंशज होंने का दंभ क्यों पाले हैं?

== विकल्प ने किया संकल्प का सत्यानाश ==

दर्शन-शास्त्र के अनुसार संकल्प ही प्रमुख हैं जब कि विकल्प किसी भी प्राणी को उसके गंतव्य तक नहीं पंहुचा सकते     संकल्प से दृढ इच्छा शक्ति का प्रादुर्भाव होता हैं ओर प्राणी अपने संकल्प को पूरा करने के लिए जी जान लगा देता हैं जबकि विकल्प इच्छा-शक्ति को कमजोर कर हारे पै हरि नाम का दृष्टिकोण बनाकर विकल्पों को सामने रख लेता हैं ओर कभी भी गंतव्य तक पंहुचने की इच्छा-शक्ति जागृत नहीं कर पाता  ।

२१ वी शताब्दी के इस दौर में जब कि कंप्यूटर क्रान्ति का युग चल रहा हैं ऐसे में युवापीढ़ी को राष्ट्र उत्थान कि दिशा में संकल्प पूर्वक दृढ इच्छा-शक्ति के साथ आगे बदना चाहिए जबकि युवापीढ़ी अपने मनोबल को कमजोर करते हुए विकल्पों के आधार पर ऊपर बढ़ने की वजाय नीचे की ओर गिरती जा रही हैं ऐसे में भला राष्ट्रका उत्थान कैसे हो सकता हैं ? प्रत्येक अभिभावक अपनी संतान के उज्जवल भविष्य की कल्पना करते हुए उसकी अभिरुचि के अनुरूप शिक्षित करने का प्रयास करता हैं और उस दिशा में ऊँची से ऊँची डिग्री हासिल कराता हैं भले ही हाई मैरिट के लिए नक़ल माफियाओं के माध्यम से कितने ही पापड भी बेलता हैं , लेकिन उसके सारे ख्वाब तब चूर-चूर हो जाते हैं जब हाई एजुकशन प्राप्त करने के बाद भी उसका बेटा किसी inter कॉलेज में घंटा बजाने का काम करने लगता हैं और वह भी ५ लाख देने के बाद।
इन दिनों BTC की प्रक्रिया पूरे प्रदेश में चल रही है। मैरिट के आधार पर चयन हो रहा है, जिसमें ऐसे प्रतिभागी चयनित हो रहे हैं जो अपने कैरियर के अनुरूप डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक बनकर देश सेवा कर सकते थे मगर अब abc और १२३, अबस में ही सिमट कर क्या ख़ाक कर पायेंगे? बेरोजगारी के दौर की दुहाई देकर अपने से कमजोर वर्ग का हक़ मारना कहाँ का न्याय है? जब BTC की अर्हता स्नातक तो सिर्फ स्नातक को ही इस पद के अनुरूप अर्ह माना जाना चाहिए, कम या ज्यादा नहीं।  

== विलक्षण संत थे बाबा श्यामानंद ==
रामायण का अखंड पाठ हो, या भागवत अथवा सत्संग कीर्तन सभी जगह हाथ में खंजड़ी लिए तन्मय होकर नाचते हुए जो बाबा पहुच जाते थे। नुमायश पंडाल के अधिकांश कार्यक्रमों, साप्ताहिक सत्संग ‘मंगल मिलन’ व सुन्दरकांड के कार्यक्रम में जिनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। जब कोई कार्यक्रम नहीं तो सड़कों पर घूम-घूम कर नाचना, अथवा सीटी बजाकर डंडा खटकाते हुए घूमते रहना उनकी दिनचर्या थी। वे कौन थे? क्या थे? कोई नहीं जानता। ज्यादातर लोग उन्हें ‘‘पागल’’ कहते थे। क्या वे पागल थे? नहीं वे विलक्षण संत थे, इसी पुरुषोत्तम मास की पहली घड़ी में अपने अनुज बाबा कंबोदानंद से कहा ‘‘अब मैं चलता हूं।’’ छोटे भाई ने पूछा- ‘‘कहां जाओगे, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, कहीं गिर पड़ोगे।’’ उत्तर दिये बिना बाबा ब्रह्मलीन हो गये।  

इष्टसाध्य इष्टापथ में विलक्षण व्यक्तित्व समय समय पर प्रकट होते रहे हैं और कुछ न कुछ संदेश देकर चले जाते रहे हैं। इसी क्रम में 444 नौरंगाबाद इटावा में 28 फरवरी 1938 को बंशीलाल कोस्टा की धमपत्नी तिजा देवी के गर्भ से जिस शिशु का जन्म हुआ, उसका नाम श्याम लाल कोस्टा रखा गया। इसके लगभग 3 साल बाद कंबोदबाबू का जन्म हुआ। दोनों भाइयों में अगाध प्रेम यहां तक है कि बड़े भाई बाबा श्यामानंद के विरह में बाबा कंबोदानंद व्याकुल रहते हैं।
(contracted; show full)
ढपली बजाते हुए नाचते गाते हुए विलक्षण बाबा के छवि इटावा नगर में हर व्यक्ति की आंखें में बसी हुई है। वे बाबा 19 अगस्त 2012 को माामूली बुखरी आते ही चल बसे। उनकी अंतिम इच्छा थी आश्रम में ही समाधि बनाना। बाबा कंबोदानंद ने समाधि की तैयारी की तो मुहल्ले वालों ने पुलिस को बुला लिया और यमूना तट पर अंत्येष्टि करवा दी। अब उनके फूल (अस्थि कलश) आश्रम में ही समाधि रूप में स्थापित किये जायेंगे।
 

 



== शरीर है कंप्यूटर ==
२१ वीं सताब्दी कंप्यूटर क्रांति व सूचना प्रौद्योगिकी की चरम शताब्दी है, यदि दार्शनिक अंदाज में आध्यात्मिक रूप से परिभाषित करें तो भारतीय दर्शन आसानी से समझ में आ सकता है।
मानव एक कंप्यूटर है-
सगुणात्मक तत्व हार्डवेयर है, जिसके अंतर्गत हैं इन्द्रियां, त्वचा, रक्त, मज्जा, अस्थि आदि।
निर्गुनात्मक तत्व साफ्टवेयर है, जिसके अंतर्गत हैं मन, बुद्धि, आत्मा, अहंकार आदि।
शरीर में मस्तिष्क हार्डडिस्क है, और सारा दारोमदार इसी पर होता है     हार्ड डिस्क को नमी व डस्ट से बचाने को ac या air tite कक्ष की व्यवस्था की जाती है, ईश्वर ने मस्तिष्क की सुरक्षा के लिए सर पर बाल दिए, शास्त्रों ने और ठंडा रखने हेतु चंदन लेपन की व्यवस्था दी, फ़िर भी धूप और शीत से वचाव हेतु सर ढांके रखने की आवश्यकता महसूस की गयी     अधिक तापमान में सिस्टम हंग होने लगता है और उसी तरह दिमाग भी काम करना बंद कर देता है। कभी-कभी बात करते बक्त व्यक्ति भूल जाता है कि वह क्या कह रहा था? यही तो हंग होना है। 
जिस तरह हार्ड डिस्क अलग-अलग मैमोरी की होती है उसी तरह मस्तिष्क की भी क्षमता और गति भिन्न-भिन्न है, हार्ड डिस्क का फेल होना ही ब्रेन हेमरेज है। यदि इलाज से सुधर हो गया तो ठीक, वरना मृत्यु।
सगुणात्मक तत्व हार्डवेयर की सारी गतिविधि निर्गुनात्मक तत्व साफ्टवेयर पर निर्भर है, यानि सभी १० इन्द्रियां पूरी तरह मन के अनुसार चलतीं हैं     मन बुद्धि को प्रभावित करता है , आत्मा मुख्य रूप से कंप्यूटर की विंडो है।
कर्मेन्द्रियों-ज्ञानेन्द्रियों के प्रत्येक क्रिया कलाप व अनुभूति मस्तिष्क रूपी हार्ड डिस्क की मैमोरी में save रहती है यानि स्मृति पटल पर अंकित रहती है। 
वाइरस- जिस तरह से वाइरस कंप्यूटर को निष्क्रिय कर देता है, उसी तरह संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे वाइरस मानव-जीवन को बर्वाद कर देते हैं। वाइरस विभिन्न computers में प्रयोग की गई फ्लापी, सीडी, पेन ड्राइव या इंटरनेट से आता है, और दूषित मानसिकता वाले लोगों से मिलने-जुलने, कानाफूसी होने से दिमागी वाइरस आते हैं। वाइरस नष्ट करने को एंटी वाइरस स्कैन करना होता है उसी तरह सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी स्कैनिंग से संशय, भ्रम और गलतफहमी जैसे तनाव-वाइरस नष्ट होते हैं। समझदार लोग निरंतर करते रहते है सत्संग, धर्म-शास्त्रों के अध्ययन व चिंतन रूपी एंटी वाइरस करते रहते हैं, उनका मस्तिष्क तनावमुक्त रहता है।